बुधवार, 12 दिसंबर 2007

आग से खेलता है दीवाना.



ग़ज़ल

आग से खेलता है दीवाना .
कैसे बच पायेगा ये परवाना.

देख अब भी संभाल ले खुद को,
उम्र भर का करूँगी जुर्माना .

अपनी चाहत का दे सबूत मुझे,
मीठी बातों में यूँ न उलझाना.

जिस्म की वादियों में खोया है,
रूह को है कहाँ तू पहिचाना .

बेवफ़ाई का क्या गिला तेरी,
मीत होते कहाँ सभी दाना.

अब तो खुद को बचाना मुश्किल है,
रंग लाया है तेरा मुस्काना .

दिल तो क्या जाँ भी अब लुटाऊँ में,
मुझको आता नहीं मुकरजाना .

अब तो चारों तरफ लगे पहरे,
मुझकों ख़्वाबों में आ के मिल जाना.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.10-12-07 समय-12-10AM


2 टिप्‍पणियां:

  1. जिस्म की वादियों में खोया है,
    रूह को है कहाँ तू पहिचाना .
    फोटो जिस्म की लगाते हैं बात रूह पहचानने की करते हैं....बहुत नाइंसाफी है प्रभु.
    बेहतरीन ग़ज़ल. अब ये तकनिकी रूप से भी ठीक होगी. इसकी तकती कैसे की जाए और ये कौनसी बहर है ये भी तनिक बताया जाए तो मजा आ जाए.जैसे संगीत सुनते वक्त अगर राग का नाम भी मालूम हो तो आनंद दोगुना हो जाता है वैसे ही.
    मेरी बातों को आप अन्यथा मत ले लीजियेगा.
    नीरज

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  2. नीरजजी
    इस ग़ज़ल की प्रचलित बहर है-
    फाइलातुन मफाइलुन फेलुन
    बहरे ख़फीफ मुसद्दस मखबून महजूफ इसका नाम है-

    जैसे
    रात भी नींद भी कहानी भी.
    हाय क्या चीज है जवानी भी. फिराक गोरखपुरी.
    तू किसी रेल सी गुज़रती है,
    मैं किसी पुल सा थर थराता हूँ (दुष्यन्तकुमार)
    मीर उन नीमबाज आँखों में,
    सारी मस्ती शराब की सी है. (मीरतकीमीर)
    दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
    आखिर इस दर्द की दवा क्या है. (ग़ालिब)
    अब जिस्म और रूह की बात सो भइया मेरे इन ग़ज़लों में अपने आप से ही संवाद कर रहा हूँ.
    आप क्यों मेरा इम्तहान ले रहे हैं.
    गुरू शब्द के मानी बदल चुके हैं.
    व्यंग्य मेरी विधा है जब तक ग़ज़ल में हूँ तब तक ही सलामत वर्ना लोटते मुझे देर नहीं लगती.
    यार लोगों की हेंचू हेंचूं से मेरी भी जी मचलता है पर क्या करूँ सभी का दबाव है कि ग़जल ही लिखूँ.
    टिप्पणी में भी लोगों को नस्ल का पता चल जाता है.
    मेरी एक भी कल सीधी नहीं जानता हूँ.दूसरों की क्या कहूँ.आप की मुहब्बत बीमार न कर दे.

    आप मेरी किसी बात का बुरा न माने.चाहनेवाले नसीबों से मिलते हैं.आपके रहमोकरम का मश्कूर हूँ जनाब.

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