बुधवार, 6 फ़रवरी 2008

आइना देख ज़रा तू भी तो,भी तो सारी मेरी ही ख़ता कैसे कहूँ.

ग़ज़ल
तेरी फ़ितरत में वफ़ा ही कम है, तुझको मैं जानेवफ़ा कैसे कहूँ.
तेरे गालों पे कैसे फिसलूँ मैं ,तेरी ज़ुल्फों को घटा कैसै कहूँ.

कुछ हवाओं का असर रहता है, कोई साया तेरे सर रहता है,
आइना देख जरा तू भी तो, सारी मेरी ही ख़ता कैसे कहूँ.

जिस्म तो जिस्म को खखोले हैं, दिल में अब भी मेरे फफोले हैं,
एक दोज़ख से कम नहीं है तू, मुझको आता है मज़ा कैसे कहूँ.

ज़िंदगी अपनी ज़हर है अब तो, एक बेहूदा सफ़र है अब तो,
काल की कोठरी समझ लो तुम, उसमें आती है हवा कैसे कहूँ.

बच्चे मचले हैं मनाऊँ कैसे, चाँद तारे भला लाऊँ कैसे,
मुफ़लिसी साथ नहीं छोड़े है,मुझसे ख़ुशियाँ हैं ख़फ़ा कैसे कहूँ.

खोयी बहना की याद आती है, माँ की ममता बहुत रलाती है,
रात को उठ के बैठ जाता हूँ, मौत देती है सदा कैसे कहूँ.

मुझपे अपनों ने सितम ढाये हैं, ग़ैर तो ग़ैर हैं पराये हैं,
उम्र रोते ही कटी है अपनी, कोई अपना था ख़ुदा कैसे कहूँ.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.06-02-08 समय-09-45PM











2 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िंदगी अपनी ज़हर है अब तो, एक बेहूदा सफ़र है अब तो,
    काल की कोठरी समझ लो तुम, उसमें आती है हवा कैसे कहूँ.
    भाई वाह...वा....
    सुभाष जी
    बहुत दिनों के बाद नज़र आयें है लेकिन ये उदासी तो आप की फितरत नहीं हुआ करती थी...अपने रंग में आयीये फ़िर से और दिखाईये अपने वोही तेवर जिसके लिए आप जाने जाते हैं...
    नीरज

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  2. बेनामी08/02/2008, 12:19:00 pm

    badiya.
    bahut shuru mein kabhi aapko pada tha - yahoo par.
    aap achha likhte hain. bahut variety aur khoobsoorati hai.
    aapka likhe auron tak pahunche.

    "purana tevar" (ya yoon kahe, beech me kuch din ka tevar) shayad gusse aur narajgi ka tever tha - na hi vaapis aaye to acchaa, kyonki us se saare pathak door ho jaate the, aur phir aap likhte hi nahin the - matlab ki, aapka, aur aapke chahne valon ka, dono ka hi nuksaan...

    ummeed hai sehat jaldi acchi ho rahi hogi..

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