बुधवार, 20 फ़रवरी 2008

चार दिन की खुशियों ने उम्रभर रुलाया है.

ग़ज़ल
चार दिन की खुशियों ने उम्र भर रुलाया है.
इक हसीन चेहरे ने बहुत दिल दुखाया है.

मेरे पास आने को अब वो गिड़-गिड़ाये है,
मेरा दूर जाना भी खूब रंग लाया है .

दिल उछाल मारे है, होंट भी रखें हसरत,
देख कर हमें चुपके कौन मुस्कराया है.

उनकी सुर्ख आँखों का, राज़ हम से मत पूछो,
मुद्दतों से जागे थे रात भर जगाया है.












2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी20/02/2008, 11:28:00 pm

    आज क्या दारु नहीं मिली जो बिना गाली के लिख गये.कहीं से भीख माँग कर पी लेते, शाइर साहब.

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  2. लुत्फ़ेमय तुझे क्या कहूँ जाहिद
    हाय कमबख्त कभी तूने पी ही नहीं.
    अपनी शिनाख्त छिपानेवाले कमजर्फ़ ना तो तुझे मय का इल्म है न गालियों का.
    मंजर लहूलुहान हो,तेरे जैसे नकाबपोश पर्दें में रहकर बार करें. तो गालियाँ नहीं बध करने की इच्छा होती है.बात करना है तो रचना की कर.
    और वो तमीज़ तुझमें या तेरी बिरादरी में नहीं हैं
    शिल्प,खयाल जज़्बात अरूज पर रौशनी डाल .
    शिखंडी तुम्हारी बिरादरी ही ऐसी है.वही कमर मटका मटका के तालियाँ बजा.
    भीख की तुझे ज़रूरत होगी.हमारी मय हमारे अंदर है जो हमें पता है.हम उसकी तलाश बाहर नहीं करते.

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