शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

पीठ पीछे वो वार करता है.


ग़ज़लपीठ पीछे वो वार करता है.
रोज ताज़ा शिकार करता है.

उसकी हसरत है क्या मैं जाने हूँ,
मुझसे कहता है प्यार करता है.

मेरी जैसी अगर हजारों हैं,
क्यों मेरा इंतजार करता है.

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है,
मुझको ही गिरफ़्तार करता है.

मैं तो मझधार में उसे नापू,
डर के हर दम किनार करता है.

ऐक दो बार माफ कर दूँ मैं,
ग़लतियाँ बार बार करता है.

कितनी जाने हैं पास में उसके,
जान सब पर निसार करता है.
डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.22-02-08समय-8-50pm.





















1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्छी गजल है। मैं तो मुरीद हो गया आपका। हां, 'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ़ है' यह पंक्ति पहले भी कहीं पढ़ी हुई लग रही है।
    ये दो पंक्तियां खास पसंद आईं....
    उसकी हसरत है क्या मैं जाने हूँ,
    मुझसे कहता है प्यार करता है.

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