शुक्रवार, 23 मई 2008

रोज़ डसती है ज़िन्दगी हमको.

ग़ज़ल
रोज डसती है ज़िन्दगी हमको.
खा गयी उसकी दुश्मनी हमको.

हम किनारों पे बहुत अच्छे थे,
साथ ले डूबी इक नदी हमको.

सब ने पत्थर समझ के ठुकराया,
काश मिलता वो जौहरी हमको.

वार करते हैं सिर्फ अपने ही,
आसरा देंगे बाहरी हमको.

प्यास ऐसी कि क्या कहें तुमसे,
ले गयी दूर तशनगी हमको.

ख़ुदकशी हसरतों ने करली है
ज़िन्दा रक्खे है दोस्ती हमको.

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.23-05-08 समय-10-55-AM.







2 टिप्‍पणियां:

  1. ख़ुदकशी हसरतों ने करली है
    ज़िन्दा रक्खे है दोस्ती हमको.


    बेहतरीन

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  2. सब ने पत्थर समझ के ठुकराया,
    काश मिलता वो जौहरी हमको.
    सुभाष जी
    बहुत खूब....वाह...वा.
    नीरज

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