गुरुवार, 3 जुलाई 2008

दूध सांपों को वो पिलाते हैं.

ग़ज़ल
दूध सांपों को वो पिलाते है.
बेंचकर मुल्क मुस्कराते हैं.

हम वचन दे के, प्राण दें अपने,
दोगले कह के मुकर जाते हैं.

इन लुटेरों की तो हिम्मत देखो,
ख़ुद को मालिक ! वो अब बताते हैं.

सिर्फ़ कश्मीर ही नहीं अब तो ,
पूरा हिन्दोस्तां वो चाहते हैं.

राम के वाण , और सुदर्शन के,
चमत्कारों को भूल जाते हैं.

भोले बाबा अगर बिगड़ जाये,
फिर तो तांडव भी वो दिखाते हैं.

खून अपनी नशों में खौले है,
और वो जश्न को मनाते हैं.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.03-07-08 समय.8.45AM.









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