बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

आओ मिस कॉल कर के ही देखें उसे.

ये ग़ज़ल उस समय की है जब गुजरात राज्य शिक्षा विभाग ने हमें २००३ में अहमदाबाद से 300किमी दूर जंगल में फेका था ख़ता मात्र इतनी थी कि अध्यापकीय सेनेट के चुनाव में हमने अपना फोर्म वापिस नहीं खेंचा था।फिर उन्होंने चार साल से रेग्यूलर इंक्रीमेंट सी.आर. का अड़बंगा लगा अटकाये हालमें प्रिंसीपल के प्रमोशन लिस्ट से नाम गायब गुजरात हाईकोर्ट में दो पीटीशन हमने दाखिल की हैं ले तारीख दे तारीख का खेल चल रहा है हमारे गुप्तचरों ने ख़बर दी वेकेशन में वे तुम्हें फिर जंगल या रेगिस्तान दिखाने वाले हैं सुधर जाओ यार पानी में रह कर मगर से बैर करते हो पर हम सुधरें ऐसे हैं कहाँ ? ये ग़जल उसी पसमंज़र की है आप लुत्फ़ उठायें भले हमारी ऐसी तैसी हो रही हो आमीन।
ग़ज़ल
वो न आया दुबारा शहर दोस्तो .
लग गई उसको किसकी नज़र दोस्तो.
आओ मिस काल करके ही पूछे उसे,
हो रही उसकी कैसे गुज़र दोस्तो
उसको पिंजड़े में रहना गवारा न था
कट गये इसमें ही उसके पर दोस्तो
ग़ैर तो ग़ैर उनका गिला क्या करें,
अपनों ने भी कहां की क़दर दोस्तो.
धूप में रह के जो छांव देता रहा,
मिल के काटा सभी ने शजर दोस्तो.
जान के क्यों सभी उसके प्यासे हुए.
पास था कोई उसके हुनर दोस्तो.
दुश्मनों की गली से तो बच जायेगा,
उसको खतरा है अपने ही घर दोस्तो .
ता.29-10-08 समय-11-25AM

12 टिप्‍पणियां:

  1. धूप में रह के जो छांव देता रहा,
    मिल के काटा सभी ने शजर दोस्तो
    दुश्मनों की गली से तो बच जायेगा,
    उसको खतरा है अपने ही घर दोस्तो

    हक़ीक़त है और बहुत तल्ख़ है !!

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  2. 1-फ़िरदौसजी ऐसी ग़ज़लें कहने के लिए क्या क्या सहा है मत पूछिये.आप दर्द की शिद्दत से वाकिफ़ हैं.
    2-अनूपजी शानदार कहने के लिए शुक्रिया.
    3- हैदराबादी साहब हक़ीक़तें तल्ख़ और जानलेवा होती हैं इसका इल्म हैं हमें शहदात पसंद हैं सो परवाह नहीं करते
    हो जाये जो होना है
    खो जाये जो खोना है.

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  4. सतीशजी दोगलों के हाथ में पावर है कितना हमें मालूम है ग़ालिब ने कहा है-
    बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता.
    रही दोगलों को सलाम की बात तो शूट करने की इच्छा होती है हरामियों को .
    बच्चे पढ़ रहे हैं खास कर लड़की इस लिए सह रहे हैं वैसे इन्हें मार कर इन्हें अमर नहीं करना चाहते कमबख्त बगर ब्रेक की गाड़ी हैं कही न कहीं टकराके मरेंगे ही.
    रही हुनर के कद्रदानों का बात तो शायद आप समझ गये होंगे कि दोगलों की ब्रिगेड हमें क्यों बदनाम कर जान की प्यासी बनी हुई है.इन कमबख्तों को क्या पता अदब और आदाब किस चिड़िया का नाम हैं ये हमारी रेन्ज में नहीं तब तक ही सलामत बाकी हमारा निशाना अचूक है सब जानते हैं सो कमज़र्फ दूर से ही रेंकते है पास नहीं आते.

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  5. सतीशजी दोगलों के हाथ में पावर है कितना हमें मालूम है ग़ालिब ने कहा है-
    बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता.
    रही दोगलों को सलाम की बात तो शूट करने की इच्छा होती है हरामियों को .
    बच्चे पढ़ रहे हैं खास कर लड़की इस लिए सह रहे हैं वैसे इन्हें मार कर इन्हें अमर नहीं करना चाहते कमबख्त बगर ब्रेक की गाड़ी हैं कही न कहीं टकराके मरेंगे ही.
    रही हुनर के कद्रदानों का बात तो शायद आप समझ गये होंगे कि दोगलों की ब्रिगेड हमें क्यों बदनाम कर जान की प्यासी बनी हुई है.इन कमबख्तों को क्या पता अदब और आदाब किस चिड़िया का नाम हैं ये हमारी रेन्ज में नहीं तब तक ही सलामत बाकी हमारा निशाना अचूक है सब जानते हैं सो कमज़र्फ दूर से ही रेंकते है पास नहीं आते.

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  6. अजनबी दोस्त तुम कौन हो ये मेरी जानने की आरज़ू भी नहीं. तुम्हारे ब्लाग पर तस्वीर ही बहुत कुछ कहती है.आप हमारे ब्लाग की मेरे हाथों से अब तक महक ना गयी ग़ज़ल देखो तुम्हारे सवालों के जबाब मौज़ूद हैं.
    रही प्यार की बात तो दिनकर ने उर्वशी में सच कहा है-
    किन्तु क्या कहें क्या प्यार
    ह्रदय की बहुत बड़ी उलझन है.
    जो अलभ्य जो दूर उसी को
    अधिक चाहता मन है.
    उर्वशी का मिलना और खोना दोनों का उत्सव मनाओ मेरे हम खयाल आमीन.

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  7. स्वयं ही अपनी ऎसी-तैसी न्यौतने वाले
    किसी तरह की ऎसी-तैसी की परवाह नहीं किया करते..

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  8. डॉ.अमर साहब ठीक कहा आपने हमारी फ़ितरत ही कुछ एसी है क्या करें साहब ज़हीर गाज़ीपुरी का शेर मुलाहज़ा फ़र्माये-
    सो सख्त जां कुछ ईज़ापसंद था इतना,
    लहू में तैरते ज़ख्मों को फूल कहता था.

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  9. पर आपके ही नही हमारे भी कट रहे,
    पर कटें भले, होसले बाकी रहें,
    हम गजल नही कह पायेंगे मगर
    कहने की हसरतें, बाकी रहें.
    आये थे यहां, मरहम मिलेगा
    पर कटों का साथ ही मिलता रहे.
    भदोरिया जी सतीश जी ने आपकी चर्चा की थी एक दर्द की कसक थी सोचा था ....... आप भी कुछ इसी प्रकार की पीडा झेल रहे हैं. सम्पर्क सूत्र दे सके तो अच्छा रहेगा.
    www.rashtrapremi.com

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