बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

हो सके तो ज़रा मुस्करा दीजिये.

ग़ज़ल
चुप बहुत रह लिए कुछ सुना दीजिये.
हो सके तो ज़रा मुस्करा दीजिये.
थम न जायें कहीं आशिकी में कदम,
थोड़ा,थोड़ा सही हौसला दीजिये.
मर न जाये कहीं तेरी चाहत में,
अपने बीमार को कुछ दवा दीजिये.
कोई चिंगारी शोला न बन जाय ये ,
अपनी बातों से यूं न हवा दीजिये .
आइना आप भी देखिये तो ज़रा,
बाद में चाहे जो भी सज़ा दीजिये.
क़त्ल कर दो हमें कोई शिकवा नहीं,
अपनी नज़रों से यूँ न गिरा दीजिये.
उखड़े,उखड़े बहुत आप रहते हैं क्यों,
बात क्या है हमें तो बता दीजिये.
डॉ.सुभाष भदौरिया, ता.15-10-08 समय-07-35PM























7 टिप्‍पणियां:

  1. PRIYA SUBHASH JEE,

    IS BEECH AAPKE KHUD AUR ANYA BLOGON PE AATA JATA RAHA.AAPKEE TIPPANIYON SAHIT AAPKE SAROKARON KO SAMJHATA RAHA . AAPKEE SHAIREE ME AAP KA MAN JHALAKTA HAI AAPKE LEKHAN ME AAPKEE POOREE DRIDHTA.

    AAPKE BHEETAR EK AISA DESHBHAKT HAI JO BELAG LAPET APNEE BAAT KAHATA HAI.VAH BHEE SEENA THONK KAR.BINA LALLO CHAPPO SAAF SAAF.

    AISE BETE BHARATMATA KE PAS BAHUT HEE SHORT SUPPLY ME HAIN.LEKIN JAHAAN BHEE HAIN EFFECTIVE BANE RAHEN ITNA HEE BAHUT HAI.

    HO SAKTA HAI KI AAP KEE SHAILEE PE KUCH BHAUHEN UTHATEE HON PAR FIRKAPARAST TAAKTEN AUR CHADM MUKHAUTON SE AAP NIPAT BHEE KAISE SAKTE HAIN.

    SAMVAD ME SIRF SHUDDH LALITYA DHOONDNE VALE SHALEEN SAMBHRANT SHABDON KEE JUGALEE BHALE KAREN PAR AAPKE ANDAZ KE BINA IRADE KAISE BATAYE JAYEN ? LAMBEE BEMATALAB BAHAS SE ACHCHA HAI KI AAP KEE TARAH KAHA JAYE KI BAS BAHUT HO GAYA 'BAKVAS BAND AUR SUN LO SAAF SAAF '.

    AAPKEE SAFGOYEE AUR JAMINEE HAQUEEKAT KEE SACHCHAYEE AAPKO SIRF BHAVUK RASHTRAVADEE HEE NAHEEN BANAYE RAKHTEEN,EK VYAVAHARIK SAHEE DRISTI DETEEN HAIN JO APNE GENERALON KARNALON KEE KARTOOT KO BHEE NANGA KARTEE HAIN.HAJARON SALON KE SHOSHAN KEE JIMMEDAREE SE AAP APNE DHARM KO BHEE NAHEEN BAKSHTE.

    MAIN APNE AANAND UDGAR KAH RAHA HOON.HAAN HAR BEVAKOOF SE VIVAD KARNE SE BACHEN.AAPKEE OORJA VYARTH NAHEEN HO. USKEE BAHUT JAROORAT HAI.

    FIDAUS KE BLOG PAR(GOLEE MAR DO MUSALMANO KO.....) PAR APKEE SNEH BHAREE SADBHAVANA MILEE.MAINE USKE AAGE PEECHE KE LIKHE KO PADHA MAKSAD KO SAMAJHNE KEE KOSHISH KEE AUR FIR JIS NATEEJE PAR PAHUNCHA MAN BAHUT DUKHA. AUR ISEELIYE EK KADEE TIPPANEE KEE JO MEREE VAISE FITRAT NAHEEN HAI.NIVEDAN HAI US POST KO DEKH KUCH VAHEEN PE KAH DEN TAKI MUJHE SANTOSH HO KI MAINE KOYEE SIMOLANGHAN NAHEEN KIYA HAI.


    APNA KARM HEE AAPKA DHARM HAI.AAPKE TEVAR AUR ANDAZ APKE MAKSAD KO EK TEJYUKT SAUNDARYA DE RAHE HAIN.ISE BARKARAR RAKHEN.


    AAMEEN !!

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  3. राजसिंहजी आपके ब्लॉग पर जाकर बहुत अच्छा लगा आप ने दिनकर की जो पंक्तियां लिख रखी हैं वे बताती हैं कि आप की सोच की पुख्तगी इतनी क्यों हैं मैने उर्वशी को एम.ए.की कक्षा में पढ़ाया है अभी कुरुक्षेत्र पढा रहा हूँ.
    दिनकर के शब्दों में कहूँ तो-
    छीनता हो स्वत्व कोई और तू,
    त्याग तप से काम ले ये पाप है.
    छिन्न कर देना ज़रुरी है उसे
    बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है.
    भाषा का प्राध्यापक हूँ साहब कबीर को पढ़ाता हूँ तो कभी फक्कड़ी ज़बान भी आ ही जाती है.
    फ़िरदौसजी को मैने रम्ज़ो में अपने ब्लॉग पर ही कह दिया है आपकी प्रतिक्रिया का लिंक दे तो ज़रूर अपनी राय दूँगा.
    वैसे वे बहुत ही संज़ीदा रचनाकार हैं उनका आक्रोश ज़ाइज़ है अपने वतन से उन्हें भी उतनी ही मुहब्बत है जितना कि हम करते हैं.

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  4. सतीशजी हम आपसे उखड़े नहीं हैं
    आपकी अपील को पूरा सम्मान देते हुए अपनी राह चल रहे हैं.पोस्ट ही बता रही है कि आपका कितना असर हुआ है.हम अपनें पाठकों का पूरा आदर करते हैं.
    फ़िरदौसजी,
    क्यों हमें मौत के पैगाम दिये जाते हैं.
    तहरीर में बस अपनी ग़लतियों का इज़हार और रूठे हुओं को मनाने की कोशिश ही तो है कोई सचमुच मुस्करा दे तो लगेगा की ग़ज़ल सच में स तक पहुँच गयी आपने ज़हमत गवारा की मश्कूर हूँ साहिबा.

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  6. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूं। बहुत अच्छा लगा। यही नहीं सारी ही ग़ज़लें बहुत अच्छी हैं। आपकी भाषा की सहजता और सरलता का जवाब नहीं।'चूतिये देश क्या संभालेंगे' में धूमिल के तेवर नज़र आते हैं।

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