शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

रूप शाकुन्तली,शील कामायनी,चित्रलेखा हो तुम,तुम ही हो उर्वशी.

ग़ज़ल
जिस्म की सरहदों से गुज़रते हुए,
रूह की सरहदों का सफ़र कीजिए.
दौड़कर वो मिले आ गले से गले,
पैदा जज़्बात में वो असर कीजिए.
रूप शाकुन्तली शील कामायनी,
चित्रलेखा हो तुम, तुम ही हो उर्वशी.
पुरुरवा की तरह मैं प्रतीक्षा में हूँ,
मुझपे भी इक इनायत नज़र कीजिए.
सब की किस्मत में होती नहीं चाँदनी,
आश फिर भी नहीं छोड़ता आदमी.
चाँदनी चाँद के संग चली भी गयी,
बेख़बर को ज़रा ये खबर कीजिए.
वादे तुम से किये और निबाहे कहीं,
दीप उसने वफ़ा के जलाये कहीं.
स्याह रातें मुकद्दर में आयीं तेरे,
हो सके जैसे भी बस ग़ुज़र कीजिए.
दफ़्न तुमने जमीं में किया था मगर,
पहली बारिश में हम देखो आये उभर.
फूल और फल भी आयेंगे हम पे कभी
ख़बर ये हर जगह मुश्तहर कीजिए।

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.१८-१०-०८ समय-१०-35AM

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन....बहुत दिनों बाद आप को अपने असली रंग में देखा है...बधाई...
    नीरज

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  2. मन को छू लेने वाली पंक्तियां हैं...बधाई...

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  3. नीरजजी,
    इतने दिनों किन गुलों की रानाइयों में गुम रहे ?आपको इस हकीकत का तो इल्म होगा ही-
    गुलशन की फ़कत फूलों से नहीं
    कांटों से भी जीनत होती है.
    हमारे सभी रंग असली हैं साहब एक बार दिमागो दिल पे चढ़ जायें तो उतरते नहीं.मुहब्बत बनाये रखिये.

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  4. फ़िरदौसजी कई भाषाई पंडितों ने ये अफ़वाह फैला रक्खी हैं के हम तल्ख़ और बदज़बान बेअदब हैं.हमने ब्लॉग जगत में गंदगी फैला रक्खी हैं हमारी दानिशमंद पाठकों से ग़ुज़ारिश है इस ग़जल की ख़ुश्बू को महसूस करेंऔर हमें बतायें कि उन अहमकों के नज़रिये में ही बेईमानी है जो गुटों में अहोरूपं अहो ध्वनि कह आत्म मुग्ध है.

    रंजनाजी आपको ग़ज़ल की पंक्तियां पंसद आयीं.
    हमारा सबकुछ सबको पंसद आयें इसकी कहाँ उम्मीद रखते हैं.कहीं कुछ ना पंसद आये तो आप बेहिचक कह सकती हैं.आते जाते रहिए.

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  5. संभवत:पहली बार आना हुआ .
    क्या अंदाज़ है जनाब!
    हम तो आपके क़ायल हुए.



    ज़रूर पढिये,इक अपील!
    मुसलमान जज्बाती होना छोडें
    http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/2008/10/blog-post_18.html

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  6. Shringar ke sath anya rason se bhi sarabor rachna. aisi rachna ek sukoon sa deti hai.

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  7. शहरोज़जी
    आपकी नवाज़िश के लिए तो ये पंक्तियां ही कही जा सकती हैं-
    हँस के बोला करो,बुलाया करो.
    आपका घर है आया जाया करो.
    आपके ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया दे दी है साहब.
    आपकी कलम हिन्दुस्तान को जोड़ने का काम करेगी आपके आलेख से ऐसा लगा है मुझे.आजकल बाकी लोग उसे तोड़ने में लगे हैं.कलमकार भी इस साज़िश में शामिल है.इनकी शिनाख़्त अब छिपी नहीं रफ़्ता रफ़्ता लोग इन्हें पहिचान ही लेंगे.
    आप एक बहुचर्चित पुस्तक कितने पाकिस्तान जो कमलेश्वरजी की है ज़रूर पढे.

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  8. श्रीकांतजी आप एक बहुत बड़ी शख़्शियत आपके ब्लॉग पर जा कर देखा.
    आप जैसे पाठक हमारी रचना पढ़ें और उन्हें सकून मिले इससे बड़ी हमारी और क्या खुशकिस्मती हो सकती है. आपकी हौसला अफ़्ज़ाई ने हमें आज मालामाल कर दिया.

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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