सोमवार, 27 अक्तूबर 2008

हर आँख में हैं आँसू हर दिल में बेकली है.

ग़ज़ल
हर आँख में हैं आँसू हर दिल में बेकली है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है .
थी तीरगी ही बेहतर अब छलती रोशनी है .
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.

लौटे न क्यों परिन्दे अब शाम हो रही है,
है डाल डाल सहमी हर पत्ती सोचती है.
रहबर ने रहजनों से अब कर ली दोस्ती है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.

चारों तरफ ही देखो अब धूल उठ रही है,
शाही सवारी उसकी लगता है आ रही है,
लेने में सांस सबको तकलीफ़ हो रही है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.

ऊपर से यूँ जो देखो तो रेत ही बची है.
भीतर हमारे अब भी इक नद्दी बह रही है.
भीतर हमारे देखें अब उनको क्या पड़ी है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.

ग़म रोज रोज अपने घर महमां बन के आयें
हम मेज़बान ऐसे हँसकर उन्हें बिठायें.
ख़ुशी भूलकर हमारा कहाँ हाल पूछती है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.

रोटी की महक माँ के ही साथ चल बसी है.
चौके में जब से बीबी और गैस आ गयी है.
बच्चे भी मतलबी हैं बीबी भी मतलबी है.
ये कैसी ज़िन्दगी है ये कैसी ज़िन्दगी है.
ता.28-10-08 समय-11-45

10 टिप्‍पणियां:

  1. दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    दीवाली आप के और आप के परिवार के लिए सर्वांग समृद्धि लाए!

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  2. दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं...

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  3. सभी मतलबी हैं तो काम कैसे चलेगा

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  4. दिनेशजी आप के ब्लॉग पर जाकर पता चला आप लॉ के क्षेत्र में अधिकारी व्यक्ति हैं. हमारे गुजरात उच्च न्यायालय में दो सर्विस मेटर हैं एक 4साल से रुके सिलेक्शन ग्रेड के रेग्यूलर इंक्रीमेंट का, दूसरे प्रिंसीपल के प्रमोशन का.सरकारी नौकरी में सी.आर.का मामला ग़जब का होता है पूरी साल धोने पर भी कमबख्त खुश नहीं रहते क्या करें.
    सी.आर. में लिख दिया जाता है स्वभाव खराब है. तुरंत गुस्सा करते हैं कोर्ट में एक साल से इस पर बहस चल रही है कि स्वभाव का इंक्रीमेंट से कितना लेना देना है.
    ले तारीख दे तारीख का खेल चल रहा है.इंक्रीमेंट छुड़वाने के लिए शुभकामनाओं की बहुत ज़रूरत है.बेटा गुजरात नेशनल लॉ युनिवर्सिटी के तीसरे वर्ष में है आपका ब्लॉग पता उसे दूँगा उसके दोनों मांमा एम.पी.में जज हैं सो साहब लॉ की तरफ दौड़ लिये.कोर्य कचहरी सब की लीला देखी है सो तल्खियाँ काफी आ गयीं हैं अपनी किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ. भाषा के आपके दिये सुझाव को ध्यान में रखने की कोशिश करूँगा पर मुश्किल है.

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  5. शोभाजी आपके ब्लॉग से पता चला आप देहरादून की हैं इतनी सुंदर भूमि और मौसम के क्या कहने. दो बार ट्रेकिगं केम्प में मेरा हेमकुंड पर्वत तक जाना हुआ है. पुररुरवा और उर्वशी का मिलन इसी गंधमादन पर्वत पर हुआ था दिनकर की उर्वशी एम.ए.की कक्षा में पढ़ाई ही नहीं इस प्रदेश के अलौकिक सौंदर्य के साक्षात दर्शन भी किये हैं.
    आपको रचना पसंद आयी आभारी हूँ.

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. फिरदौसजी आप एक बड़ी रचनाकार होने के बावज़ूद हिन्दू मुस्लिम में उलझ के रह गयी है.आप लोगों के पास तो तसल्ली देने के लिए ये सहारा तो है कि मुस्लिम होने के कारण तुम पर ज़ुल्म होते हैं.पर हम क्या करें गुजरात उच्च न्यायालय में सबसे पहले ट्रांसफर का केश मात्र युनिवर्सिटी में सेनेट का इलेक्शन लड़ने पर किया गया था. फिर उन्होंने सी.आर के बहाने चार साल से इंक्रीमेंट रोके फिर 18 फरवरी 08 में गुजरात उच्चन्यायालय में गुहार लगाई,फिर उन्होंने प्रिंसीपल के प्रमोशन लिस्ट में से नाम निकाला फिर सितम्बर08 में गुजरात उच्चन्यायालय में फरियाद की.अगर नवम्बर 08 में हम से जूनियर को प्रमोसन दिया तो फिर चौथा केश करना पड़ेगा.आप सोचती होंगी इतना पैसा कोर्ट में जाने के लिए कहां से आता होगा उधार भाई उधार जब फेवर में जजमेंट आयेगा तब चुकायेंगे.
    अगर हम मुस्लिम होते तो वे सिम्मी से जोड़ देते.
    हां हमारे पुरखे उत्तर प्रदेश के हैं और हम उर्दू जानते हैं अरूज़ पर हमारी पकड़ है खास कर बहरों पर उस्ताद मुस्लिम रहे मार्शल आर्ट हो या एकेडिमक.सो कुछ भी खेल कर सकते हैं.
    आप को क्या पता सिस्टम की मार से कोई बचा नहीं है चाहे मुस्लिम हों या हिन्दू.
    साहब बीबी और गुलाम ही सभी कौमों में मज़े कर रहे है.आपकी तल्खियां समझता हूँ सेना के अफ़्सरों को 10 साल से जानता हूँ ग्रीन वर्दी देख कर कोफ्त होती है बेईमानी भृष्टाचारी में वे पुलिस से बहुत आगे हैं.कुछ भी न कहने को बाध्य हूँ एन.सी.सी छोड़ने का मन बना लिया है.
    आप को सलाह देने की कुव्वत मझमें नहीं मैने तो अपना दर्द प्रस्तुत किया आप किसी जाति विशेष से न जुड़कर आम आदमी के पक्ष में खड़ीं हो तो आपका कद और भी बड़ा हो जायेगा आमीन.
    आप ने हमारे ब्लॉग पर दस्तक दी तो हमने आपकी दर्दगाह में अपना बयान पेश किया.फैसला आपके हाथ है.

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  8. डॉ.मिहिर साहब सभी मतलबी हैं फिर भी काम चल रहा है हमारा भी और आपका भी.डॉ.उर्मिलेष़श की पंक्तियाँ याद आ गयी-
    ये जो रिश्ते हैं रंगीन कपड़े हैं ये,
    धूप में रंग इनके उतर जायेंगे.
    आप छांव में रिश्ते के शोख रंगो पर मगन हैं धूप की शिद्दत इनसे रंगीनियां छीन लेती है जनाब.चिकित्सा के क्षेत्र में आपके ब्लॉग पर महत्वपूर्ण जानकारी हैं पर हमारी बीमारी शारीरिक नहीं मानसिक है सच के दौरे पड़ते हैं साहब उसी से हालत खराब रहती परिवारजन भी पिसते है. पर क्या मिज़ाज पाया है हमने भी.
    हमारे ही कुछ शेर हैं-
    तीर उसकी कमान पर अब भी.
    है परिन्दा उड़ान पर अब भी.
    सच को कहने की आरज़ू न गई,
    काट दी है ज़बान पर अब भी.
    हमारा दर्द ओढ़ा हुआ नही भोगा हुआ है साहब.

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  9. आपको तथा आपके परिवार को दीपोत्सव की ढ़ेरों शुभकामनाएं। सब जने सुखी, स्वस्थ, प्रसन्न रहें। यही मंगलकामना है।

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