सोमवार, 1 दिसंबर 2008

साले सब के सब हरामी.

हुंकार गीत.
करते कुर्षी की गुलामी,जग में करें बड़ी बदनामी.
साले सब के सब हरामी, साले सब के सब हरामी.
निशदिन लोगों को मरवायें, चैकों को ये फिर बँटवायें,
फोटो अपने खड़े खिचावें, लोभी और लालची, कामी.
साले सब के सब हरामी, साले सब के सब हरामी (1)
रो-रो लोग बहुत बिलखावें, पशु पक्षी सब अश्रु बहावें.
हिजड़े फिर भी न शर्मावें, आतंकी को देत सलामी.
साले सब के सब हरामी, साले सब के सब हरामी, (2)
आतंकी दामाद बनावें, हँस हँस उनकी सेज बिछावें,
ख़ुद भी खड़े-खड़े मरवायें, इनकी नीयत में है खामी,
साले सब के सब हरामी ,साले सब के सब हरामी.(3)
सागर की लहरें अब खौलें, सारा सच अपने मुँह बोलें,
झूटे फिर भी नाटक खेलें, आने को है नया सुनामी.
साले सब के सब हरामी, साले सबके सब हरामी.(4)
आतंकी को बाद में मारे, पहले लुच्चों को संहारे,
बूढ़े-बच्चे सभी विचारें, ये ही डाकू हैं ईनामी.
साले सब के सब हरामी,साले सब के सब हरामी. (5)
उपरोक्त तस्वीर मुंबई के लोगो के आक्रोश की है ये रचना उसी पस मंजर की है. ता.01-12-08 समय-10-45PM




4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा गीत हैं। संसद पर हमले के समय लोगो को यह अफसोस रहा कि कम से कम 100..150 एम पी तो मरने ही चाहिए थे। अब तो नेताआें के प्रति जनता मे आेर भ्ाी ज्यादा गुस्सा है!बढिया गीत के लिए बधाई

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  2. pahli baar aapki bhasha se bhi sahmati ho rahi hai..
    dil me aakrosh bhara hua hai..
    bahut badhiya kavita..

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  3. आपका गुस्सा जायज है।

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  4. नमन है आप को सुभाष जी...इन हरामियों का किया क्या जाए...क्यूँ नहीं उड़ा दे सरे आम सब को गोलियों से?
    नीरज

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