गुरुवार, 29 जनवरी 2009

ग़मों को हम तो ख़ुशियों में ढाल देते हैं.


ता.25-01-09 हमारे शहेरा गांव में आये मुख्यमंत्री मोदीजी का स्वागत क्षेत्र के लोकप्रिय एम.एल.ए.श्री जेठाभाई भरवाड ने भरवाडी कोटी और पगड़ी पहिनाकर किया।ये तस्वीर हमें हमारे गांव के फोटो ग्राफर श्यामल और विवेक से हांसिल हुई है. पहाडों के अंदर से सुरंग के रूप में लगभग चार कि.मी. लंबी केनल का लोकार्पण करते हुए शहरा में एकत्र हुए आसपास के लाखों किशानों को मुख्यमंत्रीजी ने बताया कि इस केनाल के मार्ग से पानम डेम का पानी आसपास के इलाके को वर्दान रुप सिद्ध होगा. किशान तो खुशहाल होंगे साथ ही पानी का स्तर ऊपर आने से लोगों की पानी की समस्या भी हल होगी। ये ग़ज़ल उन्हीं की तस्वीर से संबंधित है इस तस्वीर पर क्लिक कर के साफ साफ देखे.
ग़ज़ल
गमों को हम तो खुशियों में ढाल देते हैं.
सख़्त पत्थर से भी पानी निकाल देते हैं.

वो अलग होंगे वचन देके जो मुकरते हैं,
ज़ुबां से कहते हैं हम जो भी पाल देते हैं.

कटे सरों को कहो फिक्र वो करें अपनी,
मेरी जो पगड़ी को अक्सर उछाल देते हैं.

लगे हैं अपने वो कुनबे की ताज़पोशी में,
सभी को हम तो वतन का ख़याल देते हैं.

बने जो काम, वो सारे बिगाड़ कर रख दें,
लगा के हाथ हम अपने संभाल देते हैं.

जड़ों को काट वतन की बनायें वो बंजर,
उगा के फ़स्लें हम अपना तो हाल देते हैं.

डॉ.सुभाष भदौरिया, शहेरा(गोधरा) के पास.
ता.29-01-09 समय.09-45PM.



















4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार गजल। हम तो इंतजार में थे कि कब उतरती है।इस बार ज्यादा ही देर हो गई।
    भैय्या जल्दी जल्दी गजल उतारा करो। अगली गजल का इंतजार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मधुपजी हमारा टांसफर इंचार्ज प्रिंसीपल के रूप में ऐसे गांव की इसी साल नई खुली कालेज में हुआ है जो स्कूल में चल रही है. हमारे पास न तो कंप्यूटर है न इंटरनेट कनेक्शन.इसलिए हम कुछ भी नहीं लिख पाते है.गुजरात राज्य में शिक्षा विभाग में एक मात्र हमी तो थे जो ज़िन्दा थे और लिखते थे.ये प्रमोशन नहीं सज़ा है फिर भी काट रहे हैं.
    आज राज्य कीशिक्षा कमिश्नरने मीटिंग बुलाई थी उसमें नई कालेज को सुविधाओं की ग्रांट देने का मामला था. देखे कब नसीब जागते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुभाष भाई हर पंक्ति धारदार,ज़ोरदार,तेज़ाबी सा प्रभाव लिये हुए....
    साधु...साधु...

    उत्तर देंहटाएं