शनिवार, 31 जनवरी 2009

हाथ काटे हैं, ज़बा काटी है.


उपरोक्त तस्वीर हमारी और हमारे एन.सी.सी केडेटस की है. साथ में नेक टीम के चेरमेन प्रोफेसर शिवसुब्रमनियम भूतपूर्व कुलपति ,कोर्डीनेटर प्रोफेसर निसारअली कश्मीर,मेम्बर डॉ.अरुन एडसोल पूना.
हमारा इस्तेमाल करते हुए गुजरात आर्टस सायंस कोलेज ने 24-11-08 आयी नेक टीम को एन।सी.सी का गार्ड ऑफ आनर दिलवाकर,हिन्दी विभाग में हमारी पीएच.डी. एवं प्रजेन्टेशन को दिखा मामला जमा लिया और 272 मार्कस हांसिल कर ता.29-01-09 को बी ग्रेड प्राप्त कर लिया. इस लिंक पर 22 क्रमांक


http://naacindia.org/पर देखें.
पर इससे पूर्व ता.1-1-09 को राज्य की उच्चशिक्षा कमिश्नर ने हमें इंचार्ज प्रिंसीपल के रूप में अहमदाबाद शहर से 130 किमी.दूर शहेरा गांव में हवा में चल रही कोलेज में फेंक दिया साथ एन.सी.सी और हिन्दी विभाग को खतम कर दिया. किसी भी एन.सी.सी. अधिकारी एन.सी.सी. बिना की कोलेज में ट्रांसफर नहीं किया जाता .हिन्दी विभाग में हाल में तीन अध्यापकों की जगह मात्र एक अध्यापक ही है,तो दूसरी तरफ राज्य की सबसे पुरानी कोलज की एन.सी.सी ट्रेनिंग हमारे ट्रांसफर से बंद हो गयी. हि्न्दी पढ़ रहे विद्यार्थी मुंह ताकते रहे गये. जय जय गरवी गुजरात. अगर यू.जी.सी.नेक चेयरमेन को इस घपले का पता चले तो कोलेज का बी ग्रेड क्या सी.भी न मिले.
ख़ैर हमारी शहादत पे राज्य शिक्षा विभाग नें अपनी रोटियां सेंक लीं वर्ना राज्य की 148 साल पुरानी कोलेज को नेक की मान्यता लेने के लाले पड़ जाते.अफ़सोस की बात तो यह है कि कॉलेज के तमाम अध्यापकों की लाख कोशिशों के बावज़ूद राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा रेग्युलर प्रिंसीपल की वर्षों से नियुक्ति न किये जाने के कारण A,ग्रेड चला गया.सब को इस बात का दुख है तो दूसरी तरफ राज्य के शिक्षा विभाग के मास्टर माइंड आंतकवादी इस बात पर जश्न मना रहे हैं कि उन्होंने केप्टन और डॉ.भदौरियाजी को इस्तेमाल भी कर लिया वर्दी भी उतार ली कोर्ट मार्शल हो गया. नई कोलेज में एन.सी.सी न होने से 1 वर्ष में एन.सी.सी.का कमीशन भी ख़तम हो जायेगा.
जय स्वर्णिम गुजरात, बोलो सब लुच्चन की जय. आंतकवादी पैदा नहीं होते साहब इसी तरह बनाये जाते हैं. ये ग़ज़ल इन्हीं नामी गिरामीयों के नाम है आप भी ग़ज़ल का लुत्फ उठायें और वाह-वाह करें भले हमारी ऐसी तैसी हो रही है. आमीन
ग़ज़ल
हाथ काटे हैं ज़बा काटी है.
सर हमारा अभी तो बाकी है.

चाह जितने तू सितम कर ज़ालिम,
ग़म उठाने का दिल तो आदी है.

एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो,
तोप पर बैठी गुन-गुनाती है.

वार पर वार सह रहे हम तो,
तीर उसके तो, अपनी छाती है.

हमसे कहते थे सभी चुप रहना,
सच को कहने में जां ये जाती है.

दूर फेंका है शहर से उसने,
तेरी ख़ुश्बू अभी तो आती है.

तुम जो आओ तो कोई बात बने ,
सूनी-सूनी ये दिल की घाटी है.


घंटियां और अज़ान सु्ब्ह-सुब्ह,
गांव में मुझको अब जगाती है.

मेरी ग़ज़लों को अब तो पढ़ने को,
रूह लोगों की तरस जाती है.
डॉ. सुभाष भदौरिया,शहेरा. ता.31-01-09 समय.12-15



























2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया गज़ल है।बधाई स्वीकारें।

    एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो,
    तोप पर बैठी गुन-गुनाती है.

    वार पर वार सह रहे हम तो,
    तीर उसके तो, अपनी छाती है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. bhadauria sahab,

    agar kam pade khoon, hamara bhi lena,
    magar zalimo ke age na jhukna.

    aapke blog ki dhar kam na ho,

    jai hind,

    उत्तर देंहटाएं