रविवार, 22 फ़रवरी 2009

हाथ हथियार जब उठायेंगे.

ग़ज़ल
हाथ हथियार जब उठायेंगे.
भेड़िए बचके किधर जायेंगे.

मुँह जले हमको जो सतायेंगे.
वाट फिर सब की हम लगायेंगे.

तीर हम पर जो वे चलायेंगे.
दिन में तारे उन्हें दिखायेंगे.

अपना सारा हिसाब मांगेंगे,
ज़ुल्म को कैसे हम भुलायेंगे.

अपने पुरखों की आन रखने को,
रोटियां घास की भी खायेंगे.

घुप अँधेरों को हम भगाने को,
झोपड़ी अपनी हम जलायेंगे.

बात जब रोशनी की निकलेगी,
सब मेरी दास्तां सुनायेंगे.

तुम जो काटोगे उंगलियां मेरी,
हम ग़ज़ल फिर भी गुनगुनायेंगे.

उपरोक्त तस्वीर हमारी है गुजरात शिक्षा विभाग ने हमें अहमदाबाद से दूर ऐसे गांव में पटका है दोस्त कहते हैं हमारे वहां सारे रंग उड़ गये. हम कहते हैं हमारे मिज़ाज की रानाइयां अभी बाकी है जनाब. गांव ऐसा कि एक मात्र होटल में दोपहर जब पहुंचते हैं तो मालकिन कहती है साहब आज तो बाहर चली गयी थी. हम समझ जाते हैं कचौड़े पकौड़े खाओ.शिक्षा कमिश्नर के गुन गाओ. अफ़सोस खाने,पीने,रहने सोने, सुलाने का नहीं हमारा कंप्यूटर छुट गया. ब्लागिंग छुट गयी नेट के लुच्चे हमारी गालियां सुनने को अब तरस जाते होंगे.उनका दुख हम समझते हैं. वे ब्लाग सुन्दरियों को पटाने में लगे रहते हैं. हाय कित्ती अच्छी कविता लिखी है. भैंसों और सांपों के गुणगान होते है.चड्डी और धोती की जंग भी देखी, कोन्डोम के चमत्कार भी समझते हैं. हम तो आजकल रोटियों पर रिसर्च करते हैं.गोधरा जाना होता है तो सबसे पहले रोटियों पर आक्रमण.
कहने को बेटे के पास लेपटोप है होस्टल में रहता है बेटी के पास घर में कंप्यूटर नेट। शिक्षा कमिश्नर कचेहरी के मास्टर माइन्ड आंतकवादियों ने हमारी तरह राज्य के 300 सरकारी अध्यापकों के सिलेक्शन ग्रेड पांच साल से अटका रक्खे हैं. शिक्षा कमिश्नर श्रीमती जयन्ती रवी(I.A.S.) अगर वर्षों से रुके इंक्रीमेंट छोड़े तो एक लेपटोप खरीदें. पर मैडम को स्वर्णिम गुजरात से फुरसत नहीं मिलती. इधर हम सभी मास्टर मास्टरनी की ऐसी तैसी हो रही है. डॉ.सुभाष भदौरिया.














7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सरल भाषा में आपने दिल के उद्गार व्यक्त कि् हैं। बधाई।

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  2. मैडम हमारी भाषा की सरलता और उद्गार आपको पंसन्द आये.
    आप जैसै कद्रदान जब हमारी अंजुमन में आते हैं तो जी उठते है.
    बहुत सारे ब्लाग्स से जुड़ी हैं.खासकर दाल रोटी चावल के क्या कहने हम तो आजकल उसी पर रिसर्च कर रहे है.

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  3. तुम जो काटोगे उगंलियां मेरी, हम गजल फिर भी गुनगुनांएगें
    शानदार गजल का शानदार शेर। बधाई
    आपकी जंग देश के आवाम की जंग है। सब जगह एक जैसे ही हालात हैं भाई। एेसे में भागा भी नही जा सकता। जल्दी की कामयाबी की आशा एवं शुभकामनांआें के साथ।

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  4. अशोकजी अहमदाबाद जब से छुटा कंप्यूटर छुटा अब उंगलियां की बोर्ड को पहिचानने से झिझकती है.मैं जानता हूँ मेरा दर्द मेरा ही नहीं अवाम का है जो जो दानिशमंद है वे हुक्मरानों से मिल गये हमारी शुमार अहमकों में होती है सो बेवकूफी किये जा रहे हैं.खुद को ज़िन्दा रखने की कोशिश में ज़ख्नमों बदन छलनी है आप जैसे चाहने वाले जब अपनी मुहब्बत का मरहम रखते हैं तब फिर से जूझने की ताकत आजाती है. यूं ही खहर लेते रहिए दद्दा.

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  5. आपका ग़म जानकर अफ़सोस हुआ. हमारी दुआएं आप के साथ हैं डॉक्टर साहब.

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  6. बहुत देर की दर पे आँखें लगी थीं.
    दुआओं की सख्त ज़रूरत है हैदराबादी साहब. .आंतकवादी तो सिर्फ हमारे जिस्मों को ख़त्म करते हैं,पर गुजरात राज्य के शिक्षा विभाग के मास्टर माइन्ड आतंकवादी उनसे ज्यादा खतरनाक वे हमारे हकों को पांचसाल से अटकाये हुए हैं गुजरात हाईकोर्ट में हमारी दो दो पीटीशन रूल्ड हुई हैं जज महोदय ने 22-09-08 को शिक्षा विभाग को छ महीनों में निर्णय लेने को कहा है वे कहते है अभी देर है.
    और हमारे सब्र का पैमाना छलकने को है.उनके ज़ुल्म के शिकार सैकड़ो की तादाद में है ट्रांसफर के डर से सब चुप रहते हैं.ये ग़ज़ले नहीं सल्तनत के नाम अभी सिर्फ बयान है हुक्मरान समझे तो बेहतर है.

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  7. आपकी एक के बाद एक ग़ज़ल पढ़ गया हूँ
    अब उत्सुकता बनी रहेगी

    आपको पढ़ने की

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