बुधवार, 29 अप्रैल 2009

मुंबई के वो मंज़र गये भूल तुम, प्लेटफार्म पे हम कैसे मारे गये.

मुंबई की जलती ताज़ होटल
ग़ज़ल

खूँन का ज़ाइका लग गया,जिनके मुँह
वे दरिन्दे दुबारा से फिर आयेंगे.
हुक्मरानों का कोई भरोसा नहीं,
वक्त पर देखना ये मुकर जायेंगे.

मुंबई के वो मंज़र गये भूल तुम,
प्लेटफारम पे हम कैसे मारे गये,
अस्पतालों में आकर वे लेंगे ख़बर,
पहले तो मिल के सब हम को मरवायेंगे.

बोट देने से पहले हमें भी ज़रा,
याद कर लेना ओ ! मेरे अहले वतन,
हादसा कल तुम्हारे न ये साथ हो,
रूह के ज़ख्म अपने भी भर जायेंगे.

लोग ज़िन्दा जलें या भले शूट हों,
नींद दिल्ली की उड़ती कहाँ है कभी ?
सोने वाले न जागे जो अब की दफ़ा,
देखना बाद में लोग पछतायेंगे.

हम भी लाइन में हैं हम भी वेंटिग में हैं,
हम को प्राइम मिनिस्टर बनाओ ज़रा,
मसखरे रोज़ करते तमाशा यहाँ,
सूखे पत्तों से सारे बिखर जायेंगे.

गुड्डा-गुड़िया का वे खेल समझे हैं सब,
जंग है रोशनी और अंधेरों की ये,
तुम मशालों को लोगो जलाओ ज़रा,
भेड़िए भाग कर फिर किधर जायेंगे.

उपरोक्त ग़ज़ल मुंबई में हुए पसमंज़र की है जो हम आज तक नहीं भूले.
आज गुजरात युनिवर्सिटी की हिन्दी विभाग की अध्यापिका डॉ.निशा रम्पाल ने अपने भाषा भवन के डायरेक्टर डॉ.वसन्त भट्ट से और मुझ से अपने पति का परिचय कराते हुए कहा ये मेरे पति हैं मुंबई हमले के वक्त अपनी ड्यूटी पर थे. इनकी ताज होटल के अन्य 18 साथी मारे गये. मेरी किस्मत सुभाष भाई ये बच गये मेरा उन दिनों बुरा हाल था.
निशाजी ने हमारा विस्तार से परिचय कराते कहा उन्हें बताया कि सुभाष भाई हमारे गुजरात कालेज अहमदाबाद में हिन्दी विभाग के हेड थे. साथ हंसते हुए ये भी कह दिया आजकल तो ये प्रिंसपल बन गये आजकल गोधरा के पास हैं. अहमदाबाद युनिवर्सिटी में परीक्षण कार्य में आये हुए हैं.इन्होंने ताज़ होटल पर हुए हमले पर काफी लिखा है.
मैंने उन साहब से कुछ जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि सोरी सर हमें कुछ भी न कहने के आदेश हैं पर उनसे बातों बातों में मीडिया की उस घिनौनी हरकत का पता चला जिस समय वे अपने चेनल पर लोगों को ताज़ा समाचार दिखा रहे थे दूसरी तरफ अंदर के आतंकवादी मोबाइल पर सरहद पार के आकाओं की कमान्ड पर होटल के लोकेशन को जानकर हमें हलाक कर रहे थे. मैंने कहा इतनी बड़ी ताज़ होटल आपके पास कोई अपनी सिक्योरिटी मतलब किसी के पास हथियार नहीं थे क्या. वे हँसते हुए बोले आप ने एक आंतकवादी को लगंड़ाते हुए देखा होगा उसे हमारी होटल के कुत्ते ने काट खाया बस वही हमारा असली सिक्युरिटी अफसर था. खैर अब बंदोबस्त तगड़े किये गये हैं. मुझे याद आया यही हाल गुजरात के अक्षरधाम मंदिर का था वहां भी मंदिर के व्यवस्थापक रिटार्ड बूढ़ों से काम चला पैसे बचा रहे थे और लोग मारे गये. आग लगे तब ही कुआ खोदने की हमारी पुरानी रिवायत जो है इस घटना ने ताज और मुंबई के ज़ख़्मों को फिर याद दिला दिया.
डॉ. सुभाष भदौरिया.ता.29-04-09 समय-10-00PM





















4 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद कड़वा सच है भाईसाहब लेकिन समझ में नहीं आता कि जनता बेहोश है या नशे मेम????

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  2. डॉ.रूपेशजी ब्लाग जगत में दो वर्ष से हूँ सबसे ज्यादा इज़्ज़त मेरे दिल में अगर है तो वह आपकी है.आप मानवीय मूल्यों की लड़ाई लड़ रहे हैं उन दिनों हिन्दु मुस्लिम सब मिलकर आप लोग घायलों को खून देनें में लगे हुए थे जानता हूँ.आपके ब्लाग आयुषवेद के माध्यम सर्वजन को जो मदद कर रहे हैं वह अतयंत सराहनीय है. उसका नियमित पाठक हूँ.एक मात्र आपसे और आपके साथी मित्रों मनीषा दीदी.मुनव्वर सुल्ताना से मुंबई मिलने की कई दिनों से इच्छा है ताज होटल के परिचित मित्र निमंत्रण दे गये हमने उनसे कहा कि हम तो दूर से ही देख पायेंगें हमारी औकात अंदर तक जाने की नहीं है फिलहाल मूल्यांकन कार्य में लगा हुआ हूँ. इस बार कैसे भी आपसे मिलना ज़रूर हैं

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  3. रचना बहुत अच्छी लगी।
    आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।आप मेरे ब्लाग
    पर आएं,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।

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  4. चतुर्वेदीजी आपके ब्लाग पर गया आपकी ग़ज़लों में मीटर बहर नहीं है.कथ्य का मैं दोष बर्दास्त भी कर लूँ शिल्प की टूटन जहां भी देखता हूँ फिर ग़ज़ल के नाम पर अगड़म सगड़म नहीं पढ़ा जाता.
    ग़ज़ल का झंडा लिए कई उस्ताद ताबीज़ बांटते फिर रहे हैं चेले ताबीज़ बाँध कर आतें ये ग़ज़ल गुरूजी ने तराशी है कबीर याद आ जाते हैं,
    जाका गुरु भी अंधड़ा चेला भी है अंध.
    अंधै अँधे ठेलिया दोनो कूप पड़ंत.
    ग़ज़ल के अँधे चेले और गुरू हमारे ब्लाग पर आयें तो हम उनको बतायें कि ग़ज़ल चीज़ क्या है. वही ग़ज़ल में टसुए बहाना और कंधों की तलाश करना ग़ज़ल अब इससे बहुत दूर जा चुकी है उन्हे कैसे बतायें. खैर आप तारीफ करने की जगह तल्ख़ बात कहते तो मज़ा आता मुझे मीठे की जगह नमकीन ज्यादा पसंद हैं.आमीन

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