रविवार, 14 जून 2009

लाला और लालाइन साथ में नहाये हैं.

ग़ज़ल
लोग अपना संडे भी इस तरह मनाये हैं.
लाला और लालाइन साथ में नहाये हैं.

अपनी सविता भाभी भी, क्या ग़ज़ब की भाभी हैं,
प्रेम का सिलेबस वो मुफ़्त में पढ़ाये हैं.

उनकी वे पड़ोसिन भी, कितनी दरिया दिल देखो,
इमरजंसी में अक्सर काम, उनके आये हैं.

प्यार से उन्हें जब भी, कनखियों से हम देखें,
जैसे भैंस भड़के है, वैसे भड़क जाये हैं.

मुर्गियाँ मुहल्ले की हो गयीं जवाँ जब से,
आते जाते,मुर्गों का चैन वो चुराये हैं.

बातें बहुत करते हैं लोग जो शराफ़त की,
मौका हाथ आते ही कैसे गुल खिलाये हैं.

हमसे ये न पूछो की, हाल क्या तुम्हारा है,
रोते हँसते कैसे भी उनको हम भुलाये हैं.

इस ग़ज़ल को आप
तुम तो ठहरे परदेशी साथ क्या निभाओगे. की तर्ज़ पर गा के आनंद ले सकते हैं.आमीन.



4 टिप्‍पणियां:

  1. bhai ye saath me nahaane wala program bada pasand aaya...
    ............savita bhaabhi bhi badi dayalu hain.. bhagwan sab ko aisee vyavastha pradaan kare..........

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  2. हमने गाना शुरु भी कर दिया । धन्यवाद ।

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