शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

जब से आयें हैं वो ज़िन्दगी में.

ग़ज़ल
जब से आयें हैं, वो ज़िन्दगी में.
दिल ये लगता नहीं अब किसी में.

मौत पानी की लिक्खी थी मेरी,
मैं तो डूबा हूँ गहरी नदी में.

दिल मचलता है यूँ ही नहीं ये,
बात कुछ तो है उस अजनबी में.

हमसे प्यासों से कोई ये पूछे,
उम्र कैसे कटी तिश्नगी में.

अय अँधरो तुम्हीं हाथ थामो,
मुझको धोखा हुआ रोशनी में.

खेल समझे थे, वे दिल लगी को,
जान दे बैठे हम, दिल लगी में.

ज़िन्दगी तुझको लाऊँ कहाँ से ?
देख आये हैं वो आख़िरी में.

जीते जी तो तवज्जो न दी थी.
अब वो रोते हैं क्यों चाँदनी में.

डॉ. सुभाष भदौरिया. ता.18-12-09

5 टिप्‍पणियां:

  1. मौत पानी की लिक्खी थी मेरी,
    मैं तो डूबा हूँ गहरी नदी में.

    दिल मचलता है यूँ ही नहीं ये,
    बात कुछ तो है उस अजनबी में. ये शेर बहुत पसंद आये बहुत अच्छी गज़ल है बधाई

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  2. "दिल मचलता है यूँ ही नहीं ये,
    बात कुछ तो है उस अजनबी में."

    मधुर प्रतीति ! सुन्दर रचना का आभार ।

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  3. अय अँधरो तुम्हीं हाथ थामो,
    मुझको धोखा हुआ रोशनी में.
    बहुत सुन्दर गज़ल.

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  4. 1-आदरणीया निर्मलाजी आपको हमारी ग़ज़ल का जो शेर पंसद आया उसको सुनकर हमारी श्रीमतीजी ने सवाल पूछा था कि ये गहरी नदी कौन है ? इच्छा तो हुई कहदें तुम तो पोखर भी नहीं हो पर वाक-संग्राम छिड़ने की वज़ह से चुप रह गये.आप काफी उम्र रशीदा और संज़ीदा पाठक हैं हमारे रम्ज़ो को समझते हुए कोई सवाल करते हुए हमें बधाई दे रही हैं.इसके लिए हम आपके ह्दयग्राही कृतज्ञ हैं.
    2-हिमाशुंजी आपका भी किसी अज़नबी को देखकर दिल मचलता है तभी ये शेर आपके मन को छू गया.आपको आगे भी हमारी ग़ज़लों के शेर मन को लुभाये ऐसी उम्मीद रखते हैं.
    3.वंदनाजी आप प्रतीकों को आसानी से समझलेती हैं. रोशनी के छलावे से आप परिचित हैं और अँधेरों की दरियादिली से भी वाकिफ़ तभी आपको उपरोक्त शेर पंसद आया. ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में एक ब्रह्मांड समोये रहता है.पाठक अपनी पंसद से उसमें विचरण करता है.
    इन दिनों आप दश्त से दर्द के दरिया के सफ़र पर हैं.आपको ये सफट रोचक लग रहा है.आपकी गहरी ये संवेदनशीलता का ही ये प्रमाण है.धन्यवाद.

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