रविवार, 25 अप्रैल 2010

साथ में सिर्फ अपने हैं ग़म दोस्तो.

ग़ज़ल
धूप में जल रहे हैं कदम दोस्तो.
साथ में सिर्फ अपने हैं ग़म दोस्तों.

याद फिर उसकी आयी हमें देर तक,
आँख फिर होगयी अपनी नम दोस्तो.

मोम के वे नहीं जो पिघल जायेंगे,
अपने पत्थर के हैं इक सनम दोस्तो.

साथ में आज कल वो कहाँ हैं मेरे,
साथ खाई थी जिसने कसम दोस्तो.

वक्त आया तो ये राज़ हम पे खुला,
कितने झूटे थे हमको भरम दोस्तो.

दुश्मनों से कोई अब गिला क्या करें,
अपनों के भी बहुत हैं करम दोस्तो.

हम ग़ज़ल को न भूले सुनो आज तक,
हाथ क्या सर भी होगा कलम दोस्तो.

लोग बैठे तमाशा रहे देखते ,
जूझने का कहाँ सब में दम दोस्तो.

एक हम थे जो तूफान से भिड़ गये,
हो रहे रोज़ हम पर सितम दोस्तो.

डॉ.सुभाष भदौरियाता.25-04-10.
इन दिनों वक्त की सख्त धूप एवं तन्हाइयों में सब कुछ छूट चुका अहमदाबाद
में परिवार,दोस्त और अब तो ग़ज़ल भी हाथ से जाती दिखाई दे रही है. कॉलेज में प्रिंसीपल का प्रमोशन भी मिला तो सज़ा के रूप में उस कालेज में जहाँ अभी जमीन मिलनी बाकी है. बेंच मेज सब खरीदनी हैं. सब कुछ शून्य से शुरू करना है. गुजरात सरकार में हम यतीम हैं कोई हमारा माँ बाप या धनी नहीं. जिनके हैं वे अहमदाबाद,गाँधीनगर राजकोट,जामनगर, जूनागढ. मौज़ कर रहे हैं.
हमें गाँधीनगर शिक्षा विभाग से आदेश मिलते हैं कोलेज का गोधरा जाकर इंजीनियर से नक्शा बनवाओ. अब हम जमीन मिले बिना नक्शा कैसे बनवायें. गोधरा कलेक्टर साहब को कितनी बार मिले.सरकारी कोलेज को जमीन दे दो साहब. तहसीलदार से भी दुखड़ा रोया उन्होंने कहा कॉलेज की फाइल गाँधीनगर में चल रही है. दो साल से सिर्फ चल ही तो रही है.
हमने अब गाँव शहेरा की जगह ता.01-5-10 से गोधरा रहना तय कर लिया. गोधरामें मकान मालिक ने 2500 रुपये एडवान्स माँगे तो इच्छा हुई की कह दें अभी सरकार ने ओनलाइन ग्रांट नहीं दी अभी मार्च की तनखाह नहीं हुई. पर मित्र ने बताया दे दो एडवान्स नहीं तो मकान हाथ से जायेगा. फिर नहीं मिलेगा ढ़ूढ़ते रहोगे.
पत्नी को जब इसकी इत्तला दी तो उन्होंनें कहा इतने मँहगे मकान में रहोगे. 2500 रुपये के नाम पर उनकी फोन पर आवाज़ मंद पड़ गयी. हमने कहा अरे भाई हम प्रिंसीपल हैं वो भी गुजरात सरकार में क्लास वन. लोग क्या कहेंगे.स्तर के हिसाब से रहना पड़ेगा. तुम कहो तो गोधरा रेल ट्रेक के किनारे रहलें पर गुजरात सरकार की बदनामी होगी.क्लास वन अफ्सर और ऐसी जगह वे चुप रहगयीं.
हमलोगों ने जैसे तैसे बोपल अहमदाबाद में मकान लिया था अभी किश्तें भी कहां पूरी हुईं थी की तबादले के साथ ये दिक्कतें शुरू हो गयीं.
एक साल से भोजन के तो ऐसे लाले पड़े कि भजिया पकोड़ी पर एक साल काटा पर जब अस्पताल में मित्रों ने भर्ती कराया तब हमें ब्रह्मज्ञान हुआ खुद अपने हाथ से एक टाइम बनाओ और शिक्षा विभाग के गुन गाओ.
हमें सब्जी तो बनाना आती थी एक साथी यहां के निवासी अध्यापक ने मक्के की रोटी बनाना सिखा दी. दो टिक्कड़ डालो और फुर्सत पाओ. गांव में कोई ढंग की होटल नहीं. एक बार चार पांच किलोमीटर दूर हाइवे पर साथी अध्यापक के कहने पर धाबे पे गये. भोजन तो किया. छाछ भी पी पापड़ भी चपेटा पर वापिस लौटते समय हम शहीद होते होते रहे गये. गोधरा नई फोर लाइन बन रही है रास्ते में रेती कंकर पर बाइक ऐसी फिसली की टांग टूटी तो नहीं पर घिसटी खूब. 10 दिन तक मरहम लगाया.
दोस्त कहते हैं कि तुम ब्लाग पर अब ग़ज़लें नहीं लिखते.अब समय मिले तो लिखें न. वो सब फुर्सत का खेल था. क्या जलवे थे हमारे अहमदाबाद में चाय की जरा भी देरी होने पर रुआब झाड़ना क्यों कितनी देरी है अभी पेपर तो पूरा पढ़ लिया. पत्नी चाय टेबल पर रखती और हम मन ही मन मुस्काते.
पर अब एक साल से सुब्ह उठकर झाड़ू पोछा से शुरुआत होती है. कामवाली की झंझट ठीक नहीं हम तीन लोग एक साथ रहते थे.सो अपना काम खुद करलेते. बेटी अहमदाबाद में और बेटा गाँधीनगर में पढ़ रहे हैं सो पत्नीजी उन्हें सँभालती हैं हम फकीरों का क्या.
पर सच कहते हैं यार इस प्रिंसीपल के प्रमोशन में हमारा बुढ़ापा बिगड़ गया है.
अब गोधरा रहेंगे. वहीं जाकर शहेरा नई कोलेज की जमीन, उसके नक्शे बनाने वाले सभी अधिकारियों के चरणों में लोटना है. दया करो कृपा निधान. कोलेज में 300 छात्र छात्राओं की संख्या हो गयी अगले वर्ष 500 होंगे. बड़ी मुश्किल से उन्हें सँभाल रक्खा है. नई जगह सरकारी कॉलेजें खोल तो दी गयी पर ध्यान कोई कहाँ देता है. सब कुछ प्रिंसीपल पर छोड़कर आला अफ्सर गाँधीनगर मौज़ करते हैं.
हमारी इस नई कालेज में नियुक्त सारे करार आधारित अध्यापक जा चुके हैं उन्हें अपने हाथों से ता.16-4-10 को शिक्षा विभाग के आदेश से मुक्त किया. अब सिर्फ एक क्लार्क और हम बाकी रह गये.
अभी मार्च 2010 की तनखाह किसी को नहीं मिली. गुजरात राज्य वित्त विभाग ने ता.29-03-10 को लिखित आदेश से रोक लगा दी. किसी को मार्च की तनखाह नये वर्ष की ओन लाइन ग्रांट देने के बाद ही की जाये. देखें आन लाइन ग्रांट कब मिलती है.. अप्रैल का महीना भी बीत रहा है.
ज़ल्द राज्य के कर्मचारियों को तनखाह न मिली तो वे ता.01—5-10 को गुजरात राज्य की स्वर्णिम स्थापना का गीत तो गाना दूर रहा कही भूखे प्यासे दम न तोड़दें. जानलेवा मँहगाई में लोगों का वैसे भी जीना मुश्किल है.
अहमदाबाद जैसे बड़े महानगरों के सरकारी कर्मचारी अधिकारियों को तो मार्च की तनखाह प्रमाण पत्र पर दे दी गयी पर हमारे पंचमहाल गोधरा दाहौद जैसे पिछड़े आदिवासी जिले में सब परेशान हैं रोज अखबार में रोना पीटना मचा हुआ है. एक तरफ गुजरात राज्य के आला अफ़्सर और मँत्री स्वर्णिम गुजरात के आयोजन में इतने डूबे हुए हैं कि किसी को होश नहीं के राज्य के कर्मचारी मार्च महीने की अभी तक तनखाह न मिलने पर बिलख रहे हैं उनका भी उपचार करें.
हम तो क्या कर सकते हैं मात्र सबको सन्मति दे भगवान के सिवा. जय जय गरवी गुजरात.जय जय करवी गुजरात.

5 टिप्‍पणियां:

  1. "मोम के वे नहीं जो पिघल जायेंगे,
    अपने पत्थर के हैं इक सनम दोस्तो"
    vaise to poori gazal hi achChi lagi bt ye line bahut hi sach hai or achchi bhi

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  2. वक्त आया तो ये राज़ हम पे खुला,
    कितने झूटे थे हमको भरम दोस्तो.
    बहुत सुन्दर गज़ल है सुभाष जी.

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  3. 1-विकासजी आपने अपने ब्लाग पर बहुत सुंदर तस्वीर खीची हैं.आप को हमारे शब्द चित्र पंसद आये आभारी हूँ श्रीमान.
    2- वंदनाजी इस प्रशासकीय में पढ़ना लिखना सब कुछ छुटता जा रहा है.आज आपके ब्लाग पर हल्की नज़र डाली आप बहुत प्रामाणिकता से संवेदना पूर्ण लिखती हैं खास कर पुरानी यादों के रेखा चित्र.
    आपका सतना रीवा,सीधी, ललितपुर सब जगह जाना हुआ है श्रीमतीजी के पिताश्री मध्यप्रदेश शासन में डिप्टी कलेक्टर रहे हैं. हमें उन्हें लेने और छोड़ने जाना पड़ता था. तब शुरूआती दिन थे. अब बे हमें छोड़ आयें इतनी ट्रेन्ड हो गयीं आजकल वे अपने मायके ग्वालियर में आराम फर्मा हैं और हम ग़ज़लों से ग़म गलत कर रहे हैं.
    मैं ग़ज़ल से अक्सर हट जाता जाता हूँ. सियासत इतनी हावी है आजकल कि उसे नज़र अदाज़ कर पाना मेरे लिए मुश्किल होता है.
    पर ग़ज़ल तो जैसै मेरी रूह में पोशीदा है उसका छुटना जान लेवा होगा.
    आप मुद्दत के बाद हमारी अंजुमन में आयीं और हमारी ग़ज़ल को सराहा आपकी ये इनायत हमारी ग़ज़लों को उरूज़ बख्शेगी.आमीन.

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  4. धूप में जल रहे हैं कदम दोस्तो.
    साथ में सिर्फ अपने हैं ग़म दोस्तों.


    -बड़ी परेशानियों के दौर से गुजर रहे हैं आप. जल्द राहत मिले, यही दुआ है. गज़ल पसंद आई.

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  5. बहुत देर की दर पे आँखें लगी थी-
    1-समीर साहब आप जब हम खानाख़राबों की ख़बर लेते हैं तब हम जी उठते हैं आप ब्लाग जगत में निहायत संज़ीदा एवं संवेदना से भरपूर रचनाकार हैं जागे सारी रात तो आपकी रचना ने हमें नागमती के विरह वर्णन की याद दिलाई थी.
    1- कीचड़ में कमलवत रहना कोई आप से सीखे.व्यंग्य लेखन में तो आप कमाल करते हैं पर कहीं अपनी आभिजात्य गरिमा नहीं छोड़ते कोई हमारे जैसा मूर्ख छुड़ाना चाहे तो भी.मैं इस प्रयास में असफल रहा आप जीते. आपने भाषा को लेकर हमेंशा मुझे अलग से मेल कर के समझाया. आज आपके ब्लाग को देखा तो भर गया.
    आप शराब की बात इन गर्मियों के दिन में कहकर क्यों हमें बहका रहे हैं साहब वैसे भी अकेलापन काटने को दौड़ता है और फिर ये अंगूर की बेटी क्या कहने.
    छुटती नहीं है काफ़िर ये मुँह की लगी हुई.
    यूँ तो हमारे गुजरात में कहने को शराबबंदी है पर सबसे ज्यादा मयकशी यहाँ ही होती है. नये पुलिसवालों को फिक्स 2500 रुपये हर महीने तनखाह में मिलते हैं बाकी वे इसी मार्ग से कमा लेते हैं और गाँधी बापू को धन्यवाद देते है.
    समीर साहब आप पहुँचे हुए रिन्द हैं.
    इस उर्दू के इस शेर को आप तुरंत समझेंगे-
    नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें.
    हमें एन.सी.सी. में केम्पों में फौजियों ने वो ट्रेनिग दी थी कि कोकटोल करना पड़ता था साहब तब कहीँ असर होता था.
    .
    जब से अहमदाबाद में एन.सी.सी. छुटी फौजियों की महफिलें भी छुट गयी. क्या बात थी साहब अहमदाबाद में एन.सी.सी. ग्रुप कमान्डर और आला अफ्सरों के बीच एक हाथ में जाम एक हाथ में माइक के साथ ग़ज़ल पढना.
    फिर हमारा अपने सी.ओ.साहब से कहना कहना सर मैँ घर कैसे जाऊँगा
    वो घर में घुसने नहीं देगी, सर पड़ोसी इक्ट्ठे होंगे वो कहते कौन में समझा नहीं मैं कहता सर मेरी बाइफ.सर बहुत स्ट्रिक है.
    वो कहते तुम केंप में रुक जाओ. घर जाओ ही मत.
    बस हम दूसरे दिन हम शरीफों की तरह पहुँचते आज बहुत काम था.सी.ओ. साहब ने रोक लिया.
    आप ने शराब पर पोस्ट लिख कर हमें विचलित कर दिया.
    एक जमाने के बाद आपका ब्लाग पर आना तपती दोपहर में शीतल छाँव का अहसास करा आ गये. खैरखबर लेते रहिओ श्रीमान.आमीन.

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