शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

उसने ख़त में मुझे बेवफ़ा लिख दिया.

ग़ज़ल

सोचे समझे बिना मुझको क्या लिख दिया.
उसने ख़त में मुझे बेवफ़ा लिख दिया.

ढूँढ़ लो कोई तुम मेरी जैसी कोई,
कितना दिलचस्प ये मश्वरा लिख दिया.

आग थी कोई मुझको जलाती रही,
उसने नाहक मुझे दिल जला लिख दिया.

दिल के हाथों में हम कितने मजबूर थे,
दिल के क़ातिल को ही दिलरुबा लिख दिया.

बुत परस्ती की ये इंतिहा देख लो,
हमने पत्थर को अपने ख़ुदा लिख दिया.

उसकी गुस्ताख़ियों को लगाया गले,
ज़हर का नाम हमने दवा लिख दिया.

मुझको पढ़ते अगर तो कोई बात थी,
बिन पढ़े ही मेरा तब्सिरा लिख दिया.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.14-10-2010

5 टिप्‍पणियां:

  1. उसकी गुस्ताख़ियों को लगाया गले,
    ज़हर का नाम हमने दवा लिख दिया.

    हुजुर बहुत दिनों बाद तशरीफ लाएं हैं...किन सोचों में गुम रहते हो...इतनी मुद्दत बाद मिले हो..."
    बेहतरीन गज़ल कही है आपने...हमेशा की तरह...{ऊपर लगे फोटो की तरह :-)}

    नीरज

    नीरज

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  2. नीरजजी ब्लाग से हमारी ग़ैरहाज़िरी का मत पूछिए अब लिखना कम ही हो पाता है प्रमोशन देने वालों ने ऐसी जगह पटका है कि जहाँ एक साधारण होटल भी नहीं सारा दिन कॉलेज प्रशासन में बीत जाता है फिर घर पर जाकर हाथ से टिक्कड़ और फिर थककर सो जाना फिर घर पर नेट की सुविधा कहाँ वो तो अहमदाबाद के साथ छूट गयी आज कॉलेज परीक्षा कार्य से अहमदाबाद आना हुआ और ग़ज़ल हो गयी.
    रही फोटो की बात सो ग़ज़ल के अशआर से मेल खाती लगाई बाकी हमें दूसरे कोई मालूमात नहीं.आपको ग़ज़ल पसन्द आयी उसके लिए मश्कूर हूँ जनाब. मुहब्बत बनाये रखिए.

    वंदनाजी आपका ब्लाग पर आना और ग़ज़ल की नवाज़िश करना अच्छा लगता है शुक्रिया.
    देखना है ये जुगनू कब तलक चमकते हैं.

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  3. It's Very nice and amazing sir.
    From : Mr. Malik M.G., Dahod

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  4. Thanks Mr.Malik sir.It is very glad to me that you are second lecturer in Englis Depart my college who made comment in my blog from Dahod Dist.from Gujarat state.
    अल्लाह का करम है जनाब ये इल्म और शऊर सब को नसीब नहीं होता.मैं ग़ज़ल कहता नहीं हूँ साहब वो तो नाज़िल होती है. आपकी नवाज़िश हमारी शायरी को और भी उरूज बख़्शेगी.

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