शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

पढ़े गुजरात-आगे बढ़े गुजरात.



पढ़े गुजरात -आगे बढ़े गुजरात.
ता.30-10-2010 गुजरात सरकार द्वारा गुजरात स्वर्णिम जयन्ती के अंतर्गत वांचे गुजरात हमारी सरकारी आर्टस कॉलेज शहेरा के 600 विद्यार्थियों ने धूम धाम से मनाया. गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्रमोदीजी के गुजरात में किये गये अन्य नवतर प्रयोगों की तरह ये राज्य में ये प्रयोग सबसे अनूठा है. राज्य की जनता को किये संबोधन में वे कहते भी हैं कि इक्कीसवी सदी ज्ञान की सदी है इसमें निरंतर गुजरात को पढ़ना होगा. वांचे गुजरात अभियान इसी तरह का है.अपने दिये गये व्याख्यानों में वे चुटकी लेते हुए कहते हैं भाई पढ़ो गुजरातियो पढ़ो, कुछ भी पढ़ो फिर वह मेरी निंदा ही क्यों न हो.
उनके विचार हैं ,बच्चे चोकलेट की जगह पुस्तक माँगे. शादी विवाह हों तो धन जमीन की जगह घर में पुस्तकें कितनी हैं ये देखा जाय, समारम्भों में अगर किसी का स्वागत किया जाय तो वह पुस्तक से हो.
इसका असर हमें खुद देखने को मिला दो कोलेजों सरकारी आर्टस कोलेज मेघरज, प्राइवेट आर्टस कोलेज मालवण नें हमें विद्वान के रूप में आमंत्रित किया तो हमारा स्वागत पुस्तक देकर किया गया हमें बहुत अच्छा लगा. पुष्पगुच्छ से स्वागत की परंपरा अब गुजरात के कोलेज एवं स्कूलों से टूट रही है. ये बधाई के पात्र हैं लोग अब इसका धीरे धीरे स्वागत करने लगे हैं.
ये वैचारिक क्रांति गुजरात को विश्व फलक पर नये आयाम बख़्शेगी. भौतिक धरातल पर गुजरात की विकास गाथा मात्र भारत ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम दर्ज कर ही चुकी है अब उसे मानसिक धरातल पर भी स्वर्ण हस्ताक्षर करने हैं.
दीपावली के पर्व के पूर्व किया गया गुजरात राज्य सरकार का ये प्रयोग स्तुत्य हैं मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूँ.
ता.30-10-2010 को समग्र राज्य में तमाम स्कूलों कोलेजो, गाँवों कस्बों शहरों में ये प्रयोग हो रहा है. हमारे गाँव शहरा में श्रीमती एस.जे. दवे स्कूल जहाँ कोलेज चलती है वहां हजारो बच्चों ने एकत्र हो कर खुलें में एक साथ अध्ययन किया देखा तो बहुत ही अच्छा लगा. वास्तव में इस योजना के पीछे मुख्यमंत्री मोदीजी ये चाहते हैं कि दिवाली वेकेशन में स्कूल कोलेज के छात्र- छात्रायें सिर्फ मटरगस्ती में न बर्बाद करें वे कोर्स के अतिरिक्त पढें.
महा पुरुषों की जीवनियाँ, साहित्य गीत ग़ज़ल जिसमें भी उनकी अभिरुचि हो यदि वे निरंतर पढ़ेंगे तो उनके संस्कार निर्मित होंगे.
वांचे गुजरात के कमज़ोर पहलू भी हैं,हमारे गुजरात का शिक्षा विभाग वांचे गुजरात अभियान में लगा तो है पर पिछले तीन साल से खुली हमारी सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा में लायब्रेरियन की जगह रिक्त हैं. यही हाल तमाम 2008 में खुली तमाम सरकारी आर्टस कोलेजों का है. ठीक इसी तरह 22 नवम्बर में गुजरात खेल महाकुंभ का आयोजन है पर हमारी तरह अन्य किसी भी नई सरकारी आर्टस कोलेज में स्पोर्टस टीचर नियुक्त नहीं किया गया. दिवाली के बाद होने वाले महाखेल कुंभ में अगर स्पोर्टस टीचर की नियुक्तियाँ हो जायें तो सोने में सुहागा हो सकता है. ठीक इसी तरह से तमाम सरकारी कोलेजों में लायब्रेरियन की भी भर्ती हो जाये तो क्या कहने. हमारे गुजरात राज्य के उच्च शिक्षा विभाग को कुंभकरण निद्रा से भला कौन जगाये. मुख्यमंत्री मोदीजी ही जगा सकते हैं अब कैसे ये हम नहीं बतायेंगे वे स्वयं ज्ञाता है.
हमारे कोलेज के छात्र छात्रायें गुजराती ,हिन्दी ग़ज़लों को भी पढ़े गुजरात कार्यक्रम में पढ़ रहे थे वे हमें बहुत पसन्द आयीं ये ग़ज़लें हम अपने पाठकों को नज़र कर रहे हैं.
गुजराती की मश्हूर ग़ज़ल जो यहाँ हम खुद अपने हाथों से लिख कर रख रहे हैं ताकि सनद रहे कि हम गुजराती से उतनी ही मुहब्बत करते हैं जितनी कि हमें हिन्दी और उर्दू ज़बा से है.

ગઝલ
દિવસો જુદાઈના જાય છે એ જશે જરૂર મિલન સુધી.
મારો હાથ ઝાલીને લઈ જશે મુજ શત્રુઓજ સ્વજન સુધી.

ન ધરા સુધી, ન ગગન સુધી નહિં ઉન્નતિ ન પતન સુધી,
ફકત આપણેં તો જવુ હતું બસ એકમેકના મન સુધી.

તમે રાજરાણી ન ચીર સમ, અમે રંક નારની ચૂઁદડી
તમે તન પે રહો ઘડી બે ઘડી અમે સાથ દઇએ કફન સુધી.

જો હૃદયની આગ વધી ગની તો ખુદ ઇશ્વરે જ કૃપા કરી,
કોઈ શ્વાસ બંધ કરી ગયું કે પવન ન જાય અગન સુધી.
(ગની દહીવાલા)
ये ग़ज़ल निम्न लिंक पर रफ़ी साहब की पुर्द आवाज़ में सुनी जा सकती है.
अगर ब्लाग की दुनियाँ में कोई गुजराती हो तो हमें सुनकर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत अवश्य करायें. कृपया इसे अवश्य सुनें

दिवसो जुदाई ना जाय छे ये जशे जरूर मिलन सुधी,
मारो हाथ झाली ने लइ जसे मुज शत्रोज स्वजन सुधी.

उपरोक्त ग़ज़ल गुजराती के मश्हूर मर्हूम ग़ज़लकार गनी दही वाला साहब की जिसे रफ़ी साहब ने अपनी पुर कशिश आवाज़ में गाया है.
उपरोक्त ग़ज़ल का हिन्दी में भावार्थ कहें तो कवि कहता है कि वियोग के दिन गुजर रहे हैं ये निश्चित मिलन तक पहुँचायेंगे. मेरे शत्रु खुद मेरा हाथ पकड़ कर मझे मेरे स्वजनों तक ले जायेंगे. न धरा तक न गगन तक न उन्नति न पतन तक हमें तो सिर्फ एक दूसरे के मन तक ही पहुँचना था. आप तो राजरानी के चीर समान हैं और हम रंक नार की चूँदड़ी जैसे हैं.यदि आप सिर्फ घड़ी दो घड़ी को ही साथ निभा दें तो हम कफ़न तक साथ निभाने को तैयार हैं. अंत के मक्ते के शेर में गनी दही वाला साहब फ़र्माते हैं हृदय की अग्नि बढ़ी तो ईश्वर ने खुद कृपा करी कोई श्वास आकर बंद कर गया कि पवन न जाये अगन सुधी. अंत में श्वासों का थम जाना ही राहते-ज़ा हुआ.
हम अपने पाठकों को बतायें कि भाव की दृष्टि से तो ये ग़ज़ल अपना रंग जमाती ही है इसका शिल्प भी उर्दू ग़ज़ल की कसौटी पर ख़रा है खास कर उर्दू के शायर जफ़र साहब की मश्हूर ग़ज़ल-----
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के के दिल का करार हूँ.



की बहर में तो है ही इसका दर्द भी कुछ कम नहीं.
वज़्न इस प्रकार है-
मुतफाइलुन- मुतफाइलुन- मुतफाइलुन- मुतफाइलुन- (बहरे कामिल मुसम्मन सालिम)
लल गालगा- लल गालगा- लल गालगा - लल गालगा-(गुजराती कवि इस तरह प्रयोग करते हैं.)
दिवसो जुदाई न जाय छे ये जसे ज़रूर मिलन सुधी.
एक दुश्यन्त कुमार की हिन्दी ग़ज़ल भी वांचे गुजरात कार्यक्रम में छात्र छात्राओं के हाथ देखी जो बड़ी ही क्रांतिकारी ग़ज़ल है आप खुद देख सकते हैं.

ग़ज़ल
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए.
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.

आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.

हर सड़क पर हर गली में,हर नगर हर,गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीँ भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.
( दुष्यन्त कुमार साये में धूप.)


अंत में वांचे गुजरात कार्यक्रम का स्लाइडशो हमने लगाया है जो हमारी सरकारी आर्टस कोलेज की अपनी शिनाख़्त देगा. हमारे चाहने वालों को इससे ज़रूर सकून मिलेगा. जब इस कोलेज में हम ने चार्ज लिया था तब कुछ भी नहीँ था पर आज कोलेज में हमने बेहतरीन प्रिंसीपल कक्ष, स्टाफ रूम, क्लास रूम के साथ सुरक्षा,अनुशासन एवं परीक्षा कार्य की दृष्टि से सिक्युरिटी सिस्टम लाइव केमरा क्लास रूम,स्टाफ रूम, कोलेज प्रांगण में कार्यरत है जिसमें 15 दिन की रिकोर्डिंग दर्ज रहती है छात्र छात्राओं स्टाफ की हर हरकत पर हमारी नज़र रहती है.

आप खुद स्लाइडशो को देख कर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हम गुजरात के सबसे पिछड़े गाँव में होने के बावज़ूद क्या इल्म रखते हैं. राज्य के अख़बारों में कल वांचे गुजरात की रिपोर्ट मिलेगी हमने आज ही इसको दर्ज़ कर दिया. वांचे गुजरात के बाद हमने खाये गुजरात कार्यक्रम से समाप्ति की.

प्रिंसीपल डॉ.सुभाष भदौरिया मोबा.97249 49570
सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा.

जिल्ला पंचमहाल गुजरात.
ता.30-10-2010 समय सांय 7.oo










4 टिप्‍पणियां:

  1. श्रीमान आचायॅश्री, `` वांचे गुजरात ’’ के दिन आपने सरकारी विनयन कॉलेज शहेरामें सभी छात्रोको ईस कायॅक्रम में सामिल करके हषॅ उल्लाससे उत्सव मनाया और त्वरित इस कायॅक्रममें सामिल छात्राएँ एवं अध्यापकोकी छबियाँ कॉम्प्युटरमें नेट की दुनियामें रख दी है, शायद गुजरातमें शहेरा एक ऐसी कॉलेज है जिसका रिपोटींग कोईभी कायॅक्रम के बाद तुरन्त आपके ब्लोगमें प्रकट हो जाता है । इस प्रकारकी टेक्नोलोजी का उपयोग करनेके लिए आपको बहुत धन्यवाद ।

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  2. Happy New year Sir,very well progress done by our college here.lets' hope it will continue in the same manner in future also.From;Mr.Malik

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  3. Mr.Malik you are lecture in English department my college but you are reading my Hindi blog and always made comments It is your heartily touch of our national language. So thank you very much and happy New Year same to you and your family.
    मलिक साहब अल्लाह का करम है कि हम लोग नाज़ुक हालात में भी अपनी कोलेज की तरक्की को अंज़ाम दे रहे हैं आगे भी हम मात्र गुजरात में ही नहीं हिन्दुस्तान में भी अपने होने का पता देते रहेंगे आमीन.

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  4. प्राध्यापक दिनेश माछी जी आप संस्कृत विभाग में हमारे कोलेज में हैं आप से हमारा अनुरोध है कि आप अपने संस्कृत भाषा के ज्ञान को अपने ब्लाग में परोसे. खास कर वेदों के संबधित जानकारी और उनका पठन पाठन आदि से भी अवगत करायें.आप इन के बारे में गंभीर जानकारी रखते हैं.
    यह मेरे लिए अपार हर्ष की बात है कि आप सभी कोलेज के साथी विषम परिस्थितियों में भी मेरे साथ जूझ रहे हैं.
    हमें सिर्फ ये देखना है कि
    ये रात हमारा पीछा कब तक करेगी कभी तो सवेरा होगा.
    हमारे शिक्षा विभाग के मोहन प्यारे कब जागेंगे.

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