रविवार, 24 अप्रैल 2011

उँगलियाँ बन के फिरता मैं बालों में हूँ.


ग़ज़ल

रात दिन अब तेरे, मैं ख़यालों में हूँ.
मैं जवाबों में हूँ, मैं सवालों में हूँ.

मुझको महसूस कर अय मेरे हमनशीं,
उँगलियाँ बन के फिरता मैं बालों में हूँ.

ज़िक्र महफिल में मेरा चले जो कभी,
सुर्खि़यां बन के मैं तेरे गालों में हूँ.

चाँद को चूमने की करे आरज़ू
मैं समन्दर की ऊँची उछालों में हूँ.

मुझको पीकर के देखे तो मालूम हो,
लुत्फ़ के आख़िरी मैं पियालों में हूँ


जानलेवा तड़प, जान लेवा कशिश,
मुब्तला जी की कैसी बवालों में हूँ ?

जिसको मंज़िल मिले ना कभी उम्रभर,
पाँव के ऐसे रिसते मैं छालों में हूँ.

ज़िन्दगी के बिना जी रहा किस तरह,
पूछिए मत कि कैसे कमालों में हूँ.

मौत ही आ के अब ले हवाला मेरा
राह तकता मैं उसके हवालों में हूँ.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.24-04-2011











2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्……………रोमानियत से भरी शानदार गज़ल्।

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  2. वंदनाजी कितने दिनों के बाद आप हमारे गरीबख़ाने में आयी हैं
    क्या कहूँ मेरे शबाब के ढलने के बाद आयें हैं. शुक्रिया मोहतरमा.

    आपका ब्लाग पढ़ता हूँ ग़ज़ब की कशिश है आपकी कलम में

    श्रंगार संयोग वियोग के मार्मिक चित्र आपकी रचनाओं में मिलते हैं.
    आपकी पृकृति के अनरूप ही आप रचनायें पसन्द करती हैं.
    ब्लाग पर जमाने के बाद आप आयी हैं कमबख्त किसी की नज़र न लग जाये.

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