शनिवार, 20 अगस्त 2011

तुम अपने सरों की फिक्र करो हम सर को कटाना जाने हैं.


ग़ज़ल
आयी जो वतन पर आँच कहीं, हम खुद को मिटाना जाने हैं.
तुम अपने सरों की फिक्र करो, हम सर को कटाना जाने हैं.

पुरखों का लहू अब भी हम में, तुम उसकी परीक्षा मत लेना,
सूली पे चढ़ाओगे गर तुम, फिर भी मुस्काना जाने हैं.

हाथों में पहनती हैं चूड़ी, बुज़दिल न समझ लेना हमको,
झाँसी की भी रानी हैं हममें, तलवार उठाना जाने हैं.

बापू के उसूलों को तुमने, ठोकर जो लगाई सुन लेना,
आज़ाद यहां घर घर में अभी सब अपना निशाना जाने हैं.

तुम आग लगाना जाने हो,तुम आग से खेले हो हरदम,
उस आग को अपने खूँ  से हम,हर सिम्त बुझाना जाने हैं.

उपरोक्त ग़ज़ल आदरणीय अन्नाजी और उनकी टीम को सादर समर्पित है. मैं अन्नाजी के इस बयान को तस्लीम करता हूँ कि आतंकवादियों से ज़्यादा  हमारे देश के लिए घातक ये भृष्टाचारी प्रशासक हैं. आतंकवादी जिस्म को हलाक करते हैं पर ये भृष्ट प्रशासक हमारे साथ साथ शहीदों की रूह को भी हलाक कर रहे हैं देश को तो डकार ही गये. पर अब इनका खात्मा ज़रूरी है.लोग  अपने अपने तरीकों से इनको शिकस्त दें आमीन.
डॉ.सुभाष भदौरिया.



4 टिप्‍पणियां:

  1. हाथों में पहनती हैं चूड़ी, बुज़दिल न समझ लेना हमको,
    झाँसी की भी रानी हैं हममें, तलवार उठाना जाने हैं.
    बापू के उसूलों को तुमने, ठोकर जो लगाई सुन लेना,
    आज़ाद यहां घर घर में अभी सब अपना निशाना जाने हैं.


    आस्था और विश्वास से ओतप्रोत ओजपूर्ण सुन्दर रचना ....

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  2. आदरणीय शरदजी आपके व्लाग पर जाना होता है कई रंग हैं आपके कहानियों के ब्लाग को भी पढ़ा. आपने बहुत ही गंभीर सोचने को मज़बूर करने वाली रचनाओं को अपने कहानी के ब्लाग पर स्थान दिया है.
    रही कविताओं के ब्लाग की बात उसके तो क्या कहने जितनी तस्वीरें दिलकश उतना ही संक्षेप में कहने का आपका अंदाज.बयान ज़ारी रखिये.

    आपने जो उपरोक्त शेर उद्धृत किये आने वाले समय के सूचक हैं. भृष्ट प्रशासन आसानी से मानने वाला नहीं उसके पैंतरे दिखायेगा ही अन्नाजी भूतपूर्व सैनिक हैं सब जानते ही हैं उनकी टीम के साथ लोगों को भी उनकी नित नई चाल को समझना होगा.
    हम तो बकौले ग़ालिब
    होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे.से आगे तमाशा देखने में ही नहीं शामिल होने में यक़ीन रखते हैं.
    आपका ब्लाग पर आना और हौसला अफ़्ज़ाई करना हमारी ग़ज़लगोई को और भी उरूज़ बख्शेगा.आमीन.

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  3. पुरखों का लहू अब भी हम में, तुम उसकी परीक्षा मत लेना,
    सूली पे चढ़ाओगे गर तुम, फिर भी मुस्काना जाने हैं.

    बहुत खूब ! बहुत ओजपूर्ण और प्रेरक अभिव्यक्ति..

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  4. शर्माजी पुरखों के लहू का इल्म अगर लोगों को हो गया तो इन दोगले भृष्ट प्रशासकों की खैर नहीं.हौसला अफ़्ज़ाई के लिए शुक्रिया श्रीमान.

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