शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

आओ मिसकाल कर के ही पूछे उसे.


आओ मिस काल कर के ही पूछे उसे.

ग़ज़ल

वो न आया दुबारा शहर दोस्तो.
लग गई उसको किसकी नज़र दोस्तो.

आओ मिस काल करे के ही पूछे उसे,
हो रही उसकी कैसे गुज़र दोस्तो.

धूप में रहके जो छांव  देता रहा,
मिल के काटा सभी ने शज़र दोस्तो.

उसको पिंजड़े में रहना गवारा न था,
कट गये इसमें ही उसके पर दोस्तो.

गैर तो गैर उनका गिला क्या करें,
अपनो ने भी कहां की कदर दोस्तो.

शाख पर फिर से आयेगा बन फूल वो,
शाख से जो गया है बिखर दोस्तों.

उपरोक्त ग़ज़ल अपने उन चाहने वाले तमाम दोस्तों के नाम है जो हमारी कमी को दूर रह के शिद्दत के साथ महसूस करे रहे हैं. रोजी रोटी की तलाश इंसान को दश्त,दरिया, रेगज़ारों तक ले जाती है. वैसे भी सरकारी मुलाज़िमों का कोई अपना घर तो होता नहीं वे ख़ानाबदोशों की तरह होते हैं. हुक्मरानों के हुक्म की तामील करना उनकी मज़बूरी होती है. वे ताउम्र दरबदर भटकते रहते हैं बशर्ते कि वे ज़िन्दा हों हमारी तरह.

मुर्दे ताउम्र महानगरों के गुंबदों में  कबूतरों की तरह गुटरगूं- गुटरगूं किया करते हैं उनके ट्रांसफर नहीं होते. गरुड़ पर्वतों की फटी दरारों में बसते हैं उनकी उड़ान सारे आकाश में होती है और विषधर भुजंग उनका भोजन होते हैं.
तालाबों में बगुले एक पैर से तपस्या करते हैं और मौका मिलते ही चुपचाप मछली निगलते हैं और स्वर्णिम स्वर्णिम गाते हैं.

 डॉ. सुभाष भदौरिया.

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