बुधवार, 20 मार्च 2013

परकटे तो पता ये चला, चीज होती क्या परवाज़ है.

परकटे तो पता ये चला.

चीज होती क्या परवाज़ है.











ग़ज़ल
 झूठ का हर तरफ राज है.
   सच पे गिरती यहां गाज है.

परकटे तो पता ये चला,
चीज होती क्या परवाज़ है.

अब ज़ुबा पे हैं ताले लगे,
गुम हुई मेरी आवाज़ है.

छीन लीं मेरी बेबाकियाँ,
सिर्फ़ कहने को ऐज़ाज़ है.

ज़ख़्म पर ज़ख़्म देता रहे,
खूब उसका ये अंदाज़ है.

उसकी तासीर पत्थर की है,
देखने में जो पुख़राज़ है.

मैं वफ़ा कर के खुश हूँ कहाँ ?
मेरा हाकिम भी नाराज़ है.

उपरोक्त  प्रथम तस्वीर में जो बेरहमी से पर काटे जा रहे हैं वो हमारे हैं काटने वाले स्पेशियल ड्यूटी कर रहे हैं उनका क्या दोष अपने पवित्र कर्तव्य को अज़ाम दे रहे हैं. दूसरी तस्वीर हमारी पहिले की है जब हम आकाश में उन्मुक्त उड़ान पर थे.
 बहैसियत प्रिंसीपल सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा. हाय जाने कहां गये वो दिन.

इन दिनों गुजरात की राजधानी गांधीनगर में हम संयुक्त उच्च शिक्षा निदेशक के रूप में कार्यरत हैं. दश्त और दरिया का सफ़र ख़त्म हुआ पर एक ऐसा सफ़र शुरू हुआ जिसका जीवन में न कभी सोचा था न समझा था. गुजरात उच्च न्यायालय का सफ़र जहाँ एफीडेविट (शपथनामा देना पड़ता है हुज़ूर ज़ालिम हाज़िर है. फरियादी की फरियाद बे बुनियाद है.
अदालत वैसे ही सरकार के नाम से चिड़ी रहती है फरियादी के वकील की रगड़ाई के सामने सरकारी वकील बहुत टिक नहीं पाते.फिर शुरू होता है तारीखों का सिल सिला. कोर्ट को देख कर ये पंक्तियां जहन में अक्सर गूँजती रहती हैं

इस अंजुमन में आपको आना है बार बार,
दीवारो-दर को गौर से पहिचान लीजिए.

क्या दिन थे पहले हिन्दी अध्यापक के नाते बी.ए.,एम.ए.में साहित्य समाज,कविता कहानी पढ़ाई लिखाईफिर प्रिंसीपली का प्रमोशन मिला तो कुछ ही दिनों में अहसास हो गया कि अगले जनम मोहि प्रिंसीपल न कीजो.

और अब जोयन डायरेक्टरी मिली तो समझ में आया कि यहाँ ज्यादा दिन रहे तो ब्लड प्रेसरसुगरहार्ट अटैकके साथ कारावास कुछ भी हो सकता है.

 उम्र के साथ शरीर के हिस्से पुरजे वैसी ही थकने लगे हैं दूसरी तरफ आजा फँसाजा का खेल. उच्च अदालत में सरकार के बड़े अफ्सर तो जाते नहीं हम जैसे टुटपुजियों को रगेड़ दिया जाता है जाओ. जब कि सही ग़लत निर्णय हम जैसे कहां करते है वो तो हाईकमान से हुआ करते हैं हम तो सादर नोट प्रस्तुत कर के ही जीवन गुजारते हैं.

हमने सोचा था कि गुजरात के उच्चशिक्षा विभाग की तस्वीर बदलेंगे. साथी सरकारी  अध्यापकों को भी शुरू शुरू में उम्मीद जगी थी कि हम उनके अधिकार समय पर दिलवायेंगे. खास कर सीनियर,सिलेक्शन ग्रेड.हमने कोशिश की पर कामियाब न हो सके. 


 बड़ा अजीब संजोग है दुनियां में कहीं ऐसा नहीं होगा. गुजरात के उच्चशिक्षा विभाग ने हमारा 2000 से सिलेक्शन ग्रेड अटका रखा है. शिक्षा सचिव अभी तक निर्णय नहीं ले पाये कि सही है या ग़लत सी.आर.के बहाने गरीब पर ज़ुल्म ज़ारी है. ज़ख़्मी सिपाही बोर्डर ज़्यादा देर नहीं लड़ सकते. हुक्मरान समझें तो बेहतर है.

डॉ.सुभाष भदौरिया.
संयुक्त शिक्षा निदेशक
उच्चशिक्षा कचेहरी गुजरात राज्य.




















1 टिप्पणी:

  1. मैं वफ़ा कर के खुश हूँ कहाँ ?
    मेरा हाकिम भी नाराज़ है
    bahut sunder gajal ka bahut sunder sher

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