रविवार, 5 अक्तूबर 2014

रातों को जो तन्हा हम सड़को पे निकलते हैं.



ग़ज़ल
रातों को जो तन्हा हम सड़कों पे निकलते हैं.
जुगनू तेरी यादों के, फिर साथ में चलते हैं.


आयीं हो हवायें क्या छू कर के उन्हें बोलो,
अरमान मेरे दिल के जाने क्यों मचलते हैं.


इक बार चले आओ, मुद्दत से तरसते हैं,
दीवाने कहां तेरे फोटो से बहलते हैं.


हमने तुम्हें चाहा है हमने तुम्हें पूजा है,
वो लोग अलग होंगे जो मीत बदलते हैं.


मुश्किल हैं बहुत मुश्किल चाहत की ये राहें भी,
हम तेरी मुहब्बत में गिर गिर के सँभलते हैं.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात







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