रविवार, 14 फ़रवरी 2016

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,


ग़ज़ल

नींद रातों की मेरी,रोज़ उड़ाने वाले.
खो गये जाने कहाँ, दिल को लुभाने वाले.

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,
याद आते हैं बहुत हमको भुलाने वाले.

रूठ ले,रूठ ले, फिर मान भी जा अपनों से,
कहीं उठ जायें न दुनियां से मनाने वाले

सर्द रातों की चुभन , उस पे तमन्ना उसकी,
तू कभी भूल से आ दिल को सुहाने वाले.


ये अलग बात कलम हाथ कर दिये सबने,
तेरी तस्वीर कहाँ भूले ? बनाने वाले.

डॉ. सुभाष भदौरिया  गुजरात ता.  14- 02-2016


1 टिप्पणी:

  1. जिस तरह आते हैं तुमहे न आने के बहाने, इस तरहा किसि रोज़ न आने के लिए आ

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