रविवार, 3 अगस्त 2008

बेटे से मेरे कहना माँ लौट नहीं पायी.

ये तस्वीर अहमदाबाद विस्फोट में मरने वाली उस बदनसीब गरीब नारी कि है जिसे अभी दुनियां में बहुत सारे काम करने बाकी थे. ये ग़ज़ल उसी बेज़बान के नाम है जो इस दुनियां में नहीं है. हाय नारी हाय नारी का राग आलापने वाले दस्ते अभी तक गुजरात में उतरे नहीं हैं और न तो उनके गिरोह ने ही इस बर्बरकांड पर अपनी चुप्पी तोड़ी है.
ब्लाग के टिप्पणी कर्ता वीरों को इस मुफ़िलस बूढ़ी में कोई शबाब भी नहीं नज़र आयेगा वे कहीं हुस्न की रानाइयों में गुम हैं. जो संज़ीदा हों वे अपनी शख्शियत से तआरुफ़ करायें.आमीन.
ग़ज़ल
बेटे से मेरे कहना माँ लौट नहीं पायी.
सब्ज़ी को गयी लेने,वापिस वो नहीं आयी.
बूढ़े से मेरे कहना, उसकी वो रखे चिन्ता,
बिटिया जो मेरे घर में अब तक है नहीं ब्याही.
बारूद हमारे जो आँगन में बिछाये है ,
वो अपना पड़ोसी है, वो अपना ही है भाई.
तुम नाम न लो उसका, मत बात करो उसकी,
होती है ज़माने में माँ-बाप की रुस्वाई.
हमने तो जिन्हें अपने, सीने से लगाया है,
वो लोग ही कातिल हैं, वो लोग ही हरजाई.
चिड़िया जो हवाओं में, बेखौफ़ जो उड़ती थी,
हैं शाख पे सहमी सी, है शाख पे घबराई.
पश्चिम की हवाओं का, उन पे है असर अबतक,
वो चैन से से सोते हैं, घायल है ये पुरवाई.
तुम सख़्त जो हाथों से अब काम लहीं लोगे,
खा जायेगी तुमको ये दिन-रात की नरमाई.
सुनकर के ग़ज़ल मेरी अब लोग ये बोले हैं,
है तल्ख़ ज़बां उसकी, पर बात में सच्चाई.
डॉ.सुभाष भदौरिया,.ता.04-08-08 समय-.8.20PM




















5 टिप्‍पणियां:

  1. सुभाष जी,आप की रचना उस तस्वीर को आँखों के सामने ला कर खड़ा कर देती हैं। पता नही इस त्रासदी से कभी मुक्ति मिलेगी भी या नही।आप की रचना बहुत मार्मिक है ...दिल को छू गई है...


    चिड़िया जो हवाओं में, बेखौफ़ जो उड़ती थी,
    हैं शाख पे सहमी सी, है शाख पे घबराई.
    पश्चिम की हवाओं का, उन पे है असर अबतक,
    वो चैन से सोते हैं, घायल है ये पुरवाई.

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  2. सुभाषजी

    सामयिक और यथार्थ चित्रण करती हुई कुशल रचना के लिये मेरा नमन स्वीकारें. आपके सटीक शब्द सीधे दिल को छूते हैं

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  3. सुभाषजी

    सामयिक और यथार्थ चित्रण करती हुई कुशल रचना के लिये मेरा नमन स्वीकारें. आपके सटीक शब्द सीधे दिल को छूते हैं

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  4. आपने मार्मिक लिखा है, भगवान उग्रवादियों को समझ दे।

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  5. आदरणीय राकेशजी,परमजीतजी,महाशक्तिजी,आप महानुभावों का हार्दिक रूप से आभारी हूँ.आपने रचना को शिद्दत से महसूस किया है जब कि हालात ऐसे हैं बकौले डॉ.उर्मिलेश-

    आज बस्ती में धुआँ जो उठरहा उठता रहे,
    आग किस के घर लगी पढ़ लेंगे कल अखबार में.
    अब तो अखबार ही नहीं नेट पर भी ये सुविधा उपलब्ध है जनाब.
    हम मर रहे हैं और नेट के ज्ञानी मल्हार गाने में लगे हैं.महाशक्तिजी उग्रवादियों के साथ साथ इन ढोगियों के लिए भी प्रार्थना कीजिये.

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