गुरुवार, 10 नवंबर 2022

 

ग़ज़ल

पुल पे जाने से अब लोग डरने लगे.

मोरबी की व्यथा याद करने लगे.


ट्रेन भैसों से ज़ख्मी हुईं आजकल,

रंग वफ़ा के यहां भी उतरने लगे.


उनकी सौगात की आँधियां यूं चली,

सूखे पत्तों से हम तो बिखरने लगे.


जिनकी परवाज़ थी आसमानों तलक,

बैठ कर पर वे उनके कतरने लगे.


 इतना मत प्यार कर हम को ओ बेवफ़ा,

हम मुहब्बत में अब तेरी मरने लगे.

 

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 10/11/20222

 

 

शनिवार, 5 नवंबर 2022

टूटते, चीखते मोरबी हो गये.

 

ग़ज़ल

सबने सोचा था क्या, क्या सभी हो गये.

मौत की, एक गहरी नदी हो गये.

 

हमको झूले, झुलाये गये इस तरह,

टूटते, चीखते मोरबी हो गये.

 

घर को घर वाले ही नोंच खाते रहे,

मुफ़्त बदनाम तो बाहरी हो गये.

 

हम पे थोपे गये कैसे कैसे यहां,

सहते सहते जिन्हें हम सदी हो गये.

 

 

 

आँख में जो कभी अपनी बसते थे वे,

आँख की वे ही, अब किरकिरी हो गये.

 

 

गूंगे, बहरों की बस्ती में देखो जरा,

हम तो आवाज़ अब आखिरी हो गये.

 

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 11/05/2022

 

 

शनिवार, 22 जनवरी 2022

गर्दन पे अपने चाहे जितनी आरियां रहीं.

 

ग़ज़ल

गर्दन पे अपने चाहे जितनी आरियां रहीं.

अपने मिज़ाज में मगर ख़ुद्दारियां रहीं.


औरों से नाता जोड़ने में दिक्कतें बहुत,

अपनों से भी निभाने में लाचारियां रहीं.


मुहताज ना किसी के हुए ख़ैर मानिये,

यूं जिंदगी में बहुत सी बीमारियां रहीं.


कांटो के बीच हमने गुज़ारी तमाम उम्र,

ख़्वाबों में ख़ुश्बुओं की मगर क्यारियां रही.


बच्चे बढ़े हुए तो परिन्दों से उड़ गये,

मां बाप के नसीब में किलकारियां रहीं.


आँसू को अपने पोंछ लो क्यों रो रहे हो आप,

जीवन में यूं तो सबके ही दुश्वारियां रहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.22-01-2022

 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

सूखी नदी में नाव चलाकर के क्या करें.

 

ग़ज़ल

सूखी नदी में नाव चलाकर के क्या करें.

उस बेवफ़ा से दिल को लगाकर के क्या करें.


तालाब ये अश्कों के भी अब सूखने लगे,

हम रोज़ रोज़ अश्क बहाकर के क्या करें.


इल्ज़ाम सारे हमने तो तस्लीम कर लिये,

हम ख़ुद को पाक़ साफ़ बताकर के क्या करें.


आदत सी पड़ गयी है अँधेरों की जब हमें,

फिर दूसरी शम्अ जलाकर के क्या करें.


खाये हो गहरी चोट कहां पूछते हैं सब,

हम नाम अब सभी का गिनाकर के क्या करें.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.20-01-2022

 

 

शुक्रवार, 14 मई 2021

शमशान में सभी जन लाइन लगाये हैं अब.

                                                                        गज़ल

अच्छे दिनों ने कैसे ये दिन दिखाये हैं अब.

शमशान में सभी जन लाइन लगाये हैं अब.


ख़ुदने लगी हैं थोक में कबरें भी अब जनाब,

सांसों के टूटने का किस्सा सुनाये हैं अब .


हे गंगा-पुत्र गंगा की सुध जा के लीजिएगा.

बे-कफ़्न ही शवों को क्योंकर बहाये हैं अब.


शहरों से मौत बटते हुए गाँव आ गई लो ,

आयेगा किसका नंबर सब सर झुकाये हैं अब.


अब दोस्त क्या कि दुश्मन खाये हैं तरस हम पर,

हालात ऐसे  बोलो किसने बनाये हैं अब .


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 14-05-2021

बुधवार, 31 मार्च 2021

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.

                                                                         ग़जल

मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरूबा.

तेरे इश्क़ में, तेरी चाह में, मेरा दिल तो हो गया बावरा.


मेरे सारे पात हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया.

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.


तुझे ये गुमां कि मैं बहुत खुश, तुझे ये गिला कि भुला दिया,

तेरी जुस्तजू मुझे आज भी, तुझे क्या ख़बर तुझे क्या पता.


मेरे हाथ भी हैं क़लम हुए, मेरी काट ली है ज़ुबा मगर,

मेरा सर अभी भी तना हुआ, वो तो कह रहा है झुका झुका.


अभी रूप का  बड़ा शोर है, अभी झूठ का बड़ा ज़ोर है.

अभी आइना है बिका हुआ, अभी सच बहुत है डरा हुआ.


अभी पास हूँ तो कदर नहीं, कभी खो गया मैं जो भीड़ में,

मुझे खोजता रह जायगा, कहीं हो गया मैं जो लापता.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात.

मंगलवार, 9 मार्च 2021

 

                  ग़ज़ल

तेरे बारे में अब सोचता भी नहीं.

और ये भी है सच भूलता भी नहीं.


तेरी तस्वीर तो देखता हूँ मगर,

पहले की तरह अब चूमता भी नहीं.


रूठने और मनाने के मौसम गये,

सोचकर मैं यही रूठता भी नहीं.


काट लेता हूँ तन्हाइयों का नरक,

बेज़ह हर जगह घूमता भी नहीं.


शाम का भूला लौटेगा इक दिन सुब्ह,

बस इसी आश पर मैं मरा भी नहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 09-03-2021

 

बुधवार, 13 जनवरी 2021

शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

                                                                            ग़ज़ल

 शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

ज़ुल्म  की कोई हद तो मुकम्मिल करो,  जिस्म से बात अब जान तक आ गयी .

 

मर गये मिट गये जो वतन के लिए, जिनके पुरखों ने दी थी शहादत यहां,

उँगलियां वो उठाते है औलाद पर, आंच अब अपने ईमान तक आ गयी.

 

स्याह रातों  में हम रोशनी के लिए, झोपड़ी भी जला बैठे अपनी यहाँ,

गाँव से फिर शहर, फिर शहर से सड़क, जां ये अब अपनी शमसान तक आ गयी.

 

अपनी तोपों के मुँह खोल दो तुम यहां,  हमको चिनवाओ दीवार में ग़म नहीं.

हक़ की ख़ातिर लड़े आखिरी सांस तक, जंग चौतरफा ऐलान तक आ गयी.

 

कितने मग़रूर तुम, कितने मज़्बूर हम, बेटे सरहद पे और बाप सड़कों पे हैं,

बेटियां दे रही हैं सहारा हमें,उनकी मां भी मैदान तक आ गयी.

 

आग की आँख में हैं बराबर सुनो, झोपड़ी हो महल हो  या मेअराज हों,

चौकियों की सुरक्षा से होते हुए दास्ता अब तो सुल्तान तक आ गयी.

 

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात. तारीख 13/01/2021

 

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

पत्थर जो उछाले थे सबने, घर उससे बनाया है हमने.


 पत्थर जो उछाले थे सबनेघर  उससे  बनाया है हमने.

 कांटे जो बिछाये  राहों मेंघर उससे सजाया है हमने.

 फौलादी  जिसे तुम समझे हो, मग़रूर जिसे तुम माने हो,

 आये जो कभी आँसू अपनेहँसकर के छिपाया है हमने.

 तीरों से बदन छलनी है मगरवे अपने शिकस्ता तीर गिने,

 हर वार पे दुश्मन के आगे  कदमों को बढाया है  हमने.

 वो जंग हो चाहे गलियों में, वो जंग हो चाहे सरहद पे,

 इंसा का लहू इंसा का ही है, ये राज़ भी पाया है हमने.

 लपटों औ धुओं की बातें करइल्ज़ाम लगाते हो हर दम,

 कुंदन की तरह अग्नि में बहुतखुद को भी तपाया है हमने.

 तुम जात धर्म की बातें करउलझाओगे कब तक सबको,

 मिल जुल के बढेंगे सब आगेरस्ता भी दिखाया है हमने.


 आज देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द मोदी जी के 70 वां जन्म दिन  है. ये ग़ज़ल उनकी उम्दा शख्शियत के नाम है. मैं उनकी रूह तक शब्दों के माध्यम से पहुँचा हूँ ये वे ही बता सकते हैं. वे गुजरात से क्या गये कि गुजरात की रौनक चली गयी. या यों कहें कि फिर उसके बाद चिरागों में रौशनी ना रही. गुजरात में उनका वांचे गुजरात कार्यक्रम बहुत ही लोकप्रिय हुआ था. किसी भी कार्यक्रम में मेहमान का स्वागत पुस्तक से करना उन्होंने सिखाया था. वे बताया करते थे कि किसी व्यक्ति के साथ रिश्ते की बुनियाद पुस्तकें होनी चाहिए.वे कहते थे गुजरातियो पढ़ो तुम्हें मेरी निंदा भी पढ़नी है तो छूट पर पढ़ो ज़रूर. मुश्किल को अवसर बनाने की कला में उन्हें महारथ हासिल है मोदी है तो मुमकिन है का नारा भी उन्हीं का है वे कठिन से कठिन निर्णय लेने में हिचकिचाते नहीं. जहां तक मेरी समझ है वे शांति के पक्षधर है इसी लिए पाकिस्तान जा कर उन्होंने सबको चौंका दिया था. चीन के राष्ट्रपति को भी अहमदाबाद झूले पे झुलाने से गुरेज़ नहीं किया. पर आज वही चीन सीमा पर नो लेन्ड मेन (जहां एक दूसरे की पेट्रोल जाती है)  घुस कर आँखें तरेर रहा है . हालांकि हमने भी जैसे के साथ तैसा कर के कुछ चोटियों पर बढ़त ले ली है. चीन को ये बहुत ही अखर रहा है. मोदी जी को जो जानते हैं उन्हें पता है वे दोस्ती दुश्मनी बखूबी निभाना जानते हैं. चीन की किसी भी गुस्ताख़ी का जबाब देने के लिए वे मौके की तलाश में हैं दोनों सीमाओं पर वे निर्णायक करेंगे. उनकी डिफेंस टीम बहुत ही असर दार है.

 एक उनका आध्यात्मिक पक्ष बहुत ही मजबूत है. मोदीजी  नवरात्रि व्रत बिना चूक रहते हैं खानपान पर बहुत ही  नियंत्रण है. योग से भी खुद को जोड़े हुए हैं तभी इतनी उर्जा से भरे रहते हैं. किसी एंकर ने उनसे जब  उनके स्वास्थ्य राज पूछा कि आप क्या खाते हैं तो उन्होंने हँसकर बताया था कि  हजारों किलो गाँलियां  जो  मैं  रोज़ खाता हूँ वो कोई दूसरा नहीं खाता होगा.अच्छे वक्ता के साथ व्यंगकार भी हैं. वे भावुक भी है उनके रुँधे गले को भी लोगों ने देखा है.

गुजरात से उनके जाने का बाद जो शून्यावकाश है वो कैसे भरे गतिमान गुजरात का आज हाल किसी से छिपा नहीं लोग परिवर्तन की आहट सुन रहे हैं. आज उनके जन्म दिन पर मैं उनके  स्वस्थ,दीर्घायु, त्वरित निर्णयवान   यशस्वी ,कठोर शासक बने रहने की  देवीमां से प्रार्थना करता हूँ

 

મને સદભાગ્ય કે શબ્દો મળ્યા તારે નગર જાવા,

    ચરણ લઈ દોડવા બેસું તો વરસોના વરસ લાગે મનોજ ખંડેરિયા) 

 धानपुर से  दिल्ली बहुत दूर है.

प्रिंसीपल डॉ. सुभाष भदौरिया सरकारी आर्टस कोलेज धानपुर जिला दाहौद गुजरात ता.17-09-2020.

Prin.dhanpurarts@gmail.com

 

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

इन दिनों नींद गायब बता क्या करें.



ग़ज़ल

इन दिनों नींद गायब बता क्या करें.
रतजगों की कहो अब दवा क्या करें.

तेरी यादों का अब ये न उतरे नशा,
और अब दूसरा हम नशा क्या करें.

हम को ख़ुद का पता ही नहीं आजकल,
जानकर उसका अब हम पता क्या करें.

बद-दुआओं का है कुछ असर इस तरह,
काम आती नहीं अब दुआ क्या करें.

एक ख़ता की मिली है सज़ा उम्र भर,
दूसरी और अब हम ख़ता क्या करें.

मेरा क़ातिल वही, मेरा मुंसिफ़ वही,
हमको मंजूर हर फैसला क्या करें.

जब वफ़ा का जहां में चलन ही नहीं,
हो गये हम भी अब बेवफ़ा क्या करें.

ख़ुद न दे, और औरों को देने न दे,
पूजकर ऐसा अब हम ख़ुदा क्या करें.

आँधियां हैं बुझाने को मचली हुईं,
अब बुझा, अब बुझा, ये दिया क्या करें.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-07-2020