शुक्रवार, 7 मार्च 2008







बी.बी.सी.4 मार्च 2008 से उपलब्ध ये तस्वीरें पाकिस्तान की जेल में 35 साल रहे कश्मीरसिंह की है जिन्हें जासूसी के इल्ज़ाम में फांसी की सज़ा दी गयी थी.मानव अधिकार संगठनो की कोशिश से राष्ट्रपति मुशरर्फ ने फांसी की सज़ा मांफ कर रिहा कर दिया.तीसरी तस्वीर में बाघाबार्डर पर एक जमाने के बाद जब वे अपनी पत्नी से मिले तो दोनो कभी हंसते कभी रोते. कश्मीरसिंह को पाकिस्तान की जेल में इब्राहीम के नाम से जाना जाता था. वे क्या से क्या हो गये इसी अहसास को यहाँ बयां करने की कोशिश की गयी है.
ग़ज़ल
ग़म के चेहरे पे गहरे निशां हो गये.
अपने दुश्मन भी अब महरबां हो गये .

आप का हुस्न जाने कहाँ खो गया,
देखो हम भी तो बूढे मियां हो गये.

हम बहारों की मानिंद रुख़सत हुए,
आज लौटे तो देखो ख़िज़ां हो गये.

मौत ने हम को दस्तक कई बार दी,
आप ही मौत के दरमियां हो गये.

मेरी जाने ग़ज़ल तुम से मिल के लगा,
बाद मुद्दत के फिर से जवां हो गये.









































































2 टिप्‍पणियां:

  1. आज अचानक से आपका ब्लॉग मिला तो ऐसा लगा जैसे कोई मुराद मिल गई हो।
    आपका नाम 'देवी नांगरानी' के ब्लॉग 'चराग़े-दिल' पर देखा था लेकिन यह ख़याल
    नहीं था कि आपका अपना ब्लॉग भी था। आपकी ग़ज़लों के बारे में कुछ लिखना छोटे मुंह बड़ी बात साबित होगी। ख़ैर, अब तो हम आपकी ग़ज़लों का लुत्फ़ उठाते रहेंगे।

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