रविवार, 9 सितंबर 2018

दिल तवाइफ़ का कोठा था अपना कोई.


ग़ज़ल

उम्र-भर वो मेरा दिल दुखाते रहे.
हम ग़मों को गले से लगाते रहे.

दिल तवाइफ़ का कोठा था अपना कोई,
लोग आते रहे लोग जाते रहे.

ये अलग बात उसने सुना ही नहीं,
दर्दे-दिल तो बहुत हम सुनाते रहे.


यूँ अकेले में रोये बहुत फूटकर,
महफ़िलों में मगर मुस्काते रहे.


आग थी कोई हमको जलाती रही,
आग से आग हम भी बुझाते रहे.


ज़िंदगी क्या थी ये पूछिये मत हमें,
लाश कांधों पे अपनी उठाते रहे.


जिन के दिल मंदिर और मस्ज़िद हों उनके लिए ये ग़जल नहीं हैं उन्हें अगर नागवार गुज़रे तो वे यहाँ से शौक़ से तशरीफ़ ले जा सकते हैं. 
 साथ ही उपरोक्त तस्वीर देश के विभाजन पर बनी बेहद दर्दनाक फिल्म बेगमज़ान की है. इस विभाजन में इंसान कहलाने वाले लोग ही तबाह नहीं हुए वो खाकसार तवाइफ़ भी हुईं जिनका शुमार इंसानों में नहीं किया जाता.

 देश के  हुए भारत-पाकिस्तान का दर्द मेरा उस समय और बढ़ गया था जब   कॉलेज के छात्रों के प्रवास में गुजरात की समुद्री सीमा पर सटे कोटेसर  जाना हुआ था. 

सीमा सुरक्षा दल की चौकी के बोर्ड पर पढ़ा आगे जाना माना है. पता चला वहां से करांची  का मात्र आधे घंटे का सफ़र था. आगे का देश जो कभी हम सब का था वो पाकिस्तान हो गया था. न वो आ सकते ना हम जा सकते.


हमारे सियासतदानों का कितने पाकिस्तान बनाने का खेल अभी भी ज़ारी है इसमें कुछ इज़ाफ़ा भी हुआ है. अब तो इन सियासत दानों ने अपने सिंहासन बचाने के चक्कर में ख़ुद को ही सर्वोच्च समझ लिया है. हमें आपस में लड़ा आग लगाने वाले ये भूल जाते हैं- आग की आँख में बराबर है फूस का घर भी राजधानी भी. 

दीवार पर दीवार उठाने वाली किसी भी तामील के हक़ में मैं नहीं हूँ. मैं सेतु बनने और बनाने में विश्वास रखता हूँ और उस पर ही अमल करता हूँ. आप को अपने हक़ हैं जो भी करें, गुज़ारिश सिर्फ़ इतनी है लोक हित में आँखें खुली रखें.

डॉ.सुभाष भदौरिया तारीख- 09-09-2018


शनिवार, 4 अगस्त 2018

हम गले जो लगे आप घबरा गये, दूसरों को लगाओ तो कुछ भी नहीं.


ग़ज़ल

हम गले जो लगे आप घबरा गये,
दूसरों को लगाओ तो कुछ भी नहीं. 
बात गन की ज़रूरी हो जिस वक्त में,
 बात मन की सुनाओ तो कुछ भी नहीं.

आँख हमने जो मारी तो हँगामा क्यों,
खेल है सब सियासत को तुम जान लो,
खेल हम जो दिखायें तो तकलीफ़ क्यों
खेल तुम जो दिखाओ तो कुछ भी नहीं.

अब तो संसद में हैं हम मदारी सभी
एक पर एक हैं सारे भारी सभी, 
आँख हम जो नचायें तो हैरान हो,
देश को तुम नचाओ तो कुछ भी नहीं.

बाँट लें बाँट ले मिल के सारा सभी छाँट लें, 
छांट ले मिल के प्यारा सभी,
हम जो खायें तो ये शोर बर्पा है क्यों,
 माल तुम जो ये खाओ तो कुछ भी नहीं.


हिन्दू मर जायें सारे हमें क्या पड़ी, 
और मुस्लमां का तुम लो बना कोरमां, 
आग हम जो लगायें तो इल्ज़ाम क्यों
 आग तुम जो लगाओ तो कुछ भी नहीं.

ऐब पर मेरे हरदम ना सोचा करो,
आईना आप भी साब देखा करो, 
दाग़ दामन पे मेरे गिनाओ बहुत, 
दाग़ अपने छिपाओ तो कुछ भी नहीं. 

कोई मस्ला भले हल न हो हम से पर,
और मस्ले बढायें चलो मिल के हम, 
बांसुरी हम बजायें तो आफत बहुत 
गाल तुम जो बजाओ तो कुछ भी नहीं.

हैं ये मुर्दों का अब देश प्यारा बहुत 
हमने मिल कर के है इसको मारा बहुत, 
चूना हम जो लगायें तो बदनाम हों
 चूना तुम जो लगाओ तो कुछ भी नहीं. 

मछलियों की तरह फाँसते हैं इन्हें
लोग फिर भी नहीं हैं जाँचते हैं हमें,
जाल में हम फंसायें तो भड़काओ तुम 
जाल में तुम फँसाओ तो कुछ भी नहीं. 

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख- 04-08-2018

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018


ग़ज़ल

किसने किसने साथ है छोड़ा मत पूछो.
नीबू जैसा हमें निचोड़ा मत पूछो.

जिसको देख के जीते थे हम बरसों से,
उसने भी अब मुख को मोड़ा मत पूछो.

जिस्म का फोड़ा होता तो सह लेते हम,
जान ही लेगा रूह का फोड़ा मत पूछो.

जो भी आया, खेला खाया खूब यहाँ,
कैसा अपना दिल है निगोड़ा मत पूछो.

कुछ तकलीफें थी उसमें, कुछ मुझ में भी,
दोनों  में ही ऐब था थोड़ा थोड़ा मत पूछो.

    खेत में जिसने मिल कर लूटा मुनियां को,
मंत्री जी का है वो मोड़ा मत पूछो.

जिससे हमको बहुत उम्मीदें थीं लोगो,
वो भी निकला काग भगोड़ा मत पूछो.

चिड़िया का घर तोड़ के तुमने फेंक दिया,
तिनका तिनका उसने जोड़ा मत पूछो.


गधे का खा रहे दूध जलेबी अब देखो,
घास खा रहा बूढ़ा घोड़ा मत पूछो.



गले लगाकर आँख दबाये महफिल में,
वो भी निकला हाय छिछोड़ा मत पूछो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.03-8-2018




गुरुवार, 14 जून 2018

फिटनिश ही दिखानी है सरहद पे दिखाओ अब.


ग़ज़ल

हर रोज़ न सरहद पे बेमौत मराओ अब.
फिटनिश ही दिखानी है सरहद पे दिखाओ अब.

कश्मीर गया कब का जम्मू भी है जाने को,
आँखों पे पड़ा पर्दा बेहतर है हटाओ अब.

इस योग से दुश्मन तो समझेगा भला कैसे,
तुम पार्थ अगर हो तो गाँडीव उठाओ अब.

रूहों को शहीदों की तकलीफ़ पहुँचती है,
मुँहतोड़़ जबाबों का गाना तो न गाओ अब.

छीने जो कोई बेटा, सिंदूर उजाड़े जो,
शैतां को ज़रूरी है अब पाठ पढ़ाओ अब.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-06-20

शनिवार, 2 जून 2018

याद आया तो बहुत देर रुलाया उसने.

ग़ज़ल

याद आया तो बहुत देर रुलाया उसने.
कितनी आसानी से हमको है भुलाया उसने.

इससे ज़्यादा कोई  क्या हमसे मुहब्बत करता,
मैं जो भूखा रहा इक कौर ना खाया उसने.

हाथ से उसके जो छटका था हुए टुकडे़ कई,
कांच का वर्तन था भूले से गिराया उसने.

आँसू बनकर के जो छलका मैं कभी आँखों से,
अपनी सखियों को गिरा तिनका बताया उसने्.

और होता तो कोई दिल पे ने लेते अपने,
दुख तो इस बात का दिल मेरा दुखाया उसने.



डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.02-06-2018

बुधवार, 30 मई 2018

चिंता हगने के करते हैं वो हर घड़ी, पहले खाने का उपचार कुछ तो करें.

ग़ज़ल
चिंता हगने की करते हैं वो हर घड़ी,
पहले खाने का उपचार कुछ तो करें.
भूख से मर रहे हैं यहां आज हम, 
हो सके सच का इक़रार कुछ तो करें.

आसमां में उड़े हम को कुछ ग़म नहीं, 
बात कुछ तो जमी की ज़रूरी है अब,
हम निराधार है आज भी देख लो,
 हो सके तो वो आधार कुछ तो करें.

 गीत महलों के गायें बहुत आपने, 
झोपड़ी की व्यथा भी समझ लीजिए,
सब लुटा दे अमीरों को साहब मगर,
मेरे हक़ में भी सरकार कुछ तो करें.

जान होटों पे अब आ गई जान लो, 
गिन लो सारी पसलियां हमारी सुनो,
खूँन चूंसा सभी ने हमारा यहाँ, 
हम हैं बरसों से बीमार कुछ तो करें.

झूट चांदी की थाली परोसे हैं वे,
 और सच से किनारा वो करने लगे
 कितना ख़ामोश मंजर है चारों तरफ,
 हैं ये तूफां के आसार कुछ तो करें.

 डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.30-05-2018








गुरुवार, 17 मई 2018

अस्लिहे हाथ जो लिए फिरते,

ग़ज़ल
मेरे लफ़्ज़ों में जान दे मौला.
सबको ऊँची उड़ान दे मौला.

अस्लिहे हाथ जो लिए फिरते,
हाथ उनके क़ुरान दे मौला.

भाईचारा ख़ुलूस बख़्श हमें,
नेकियों का जहान दे मौला.

घुप अँधेरों का क़हर ज़ारी है,
ऱौशनी का निशान दे मौला.

क़ाफ़िला राह बहुत भटके है,
कोई फिर से इमाम दे मौला.

रमज़ान के पावन मास और अपने पहले रोज़े पर  ये ग़ज़ल  अमन के नाम है.
मैं हमेशा नवरात्रि में 9 दिन के व्रत रखता हूँ. बहुत आसानी समय कट जाता है. पर रोज़ा में सुब्ह सहरी के निश्चित वक्त तकरीबन सुबह 4 बजे के करीब सब कुछ बंद हो जाता है. रात्रि तय कर लिया था कि इस बार ख़ास कर प्यास की शिद्दत को फिर से महसूस करना है सो  आज सुब्ह पहले रो़ज़े का आगाज़ किया. पानी के बिना रहना और सारे अपने काम करना. प्यास तो लगती है पर एक बार तय कर लो तो फिर शक्ति अपने आप मिल जाती है. आज ऐसा ही हुआ. आज कोलेज में रोज़ा खोला नमाज़ आती नहीं रोज़े खोलने के पहले सिक्युरिटी गार्ड मक्सूद ने पहले वज़ु करना सिखाया फिर नमाज़ और जैसी अज़ान हई तो उसने खोल दो रोज़ा सर. ये तस्वीर उसी की हैं मैनें एन.सी.सी. में फौजियों से तमाम ट्रेनिंग ली है कोई बाकी नहीं. बिना पानी के रहना रोज़ा से सीखा है.
कोलेज में अभी स्टाफ और विद्यार्थीओं का वेकेशन चल रहा है प्रिंसीपल को वेकेशन कहां.
रोज़ा खान-पान के साथ अन्य बुराईयों पर फ़तह पाने तथा मज़्लूम मुफ़लिस गरीब लोगों की इमदाद करने का ट्रेनिंग पीरियड है जो साल भर काम आता है. प्रधान मंत्रीश्री नरेन्द्र मोदीजी ने इस बार मन की बात पर रोज़े का ज़िक्र किया और सब  को मुबारकाबाद भी दी. वे हमेशा नवरात्रि के व्रत रखते हैं मात्र नीबू पानी पर एक दिन रोज़ा रख के देखें कि सुब्ह 4 बजे से शाम 7.30 बजे तक गर्मी के दिनों में पानी के बिना रहना कितना कठिन हैं.  एक और रमज़ान के महीने में हुकूमते हिन्दने सेना को आपरेशन आलआउ्ट पर रोक लगा दी है साथ ही सामने से हमला होने परे पूरे इख्तियार भी दिये हैं. 

दुश्मनी का सफ़र इक कदम दो कदम,
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जायेंगे.
सालों बीत गये न तुम थके न हम थके. कम से कम रोज़े के दिनों में तो अस्लाहों को ख़ामोश रहने दें. आमीन.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख.17-05-2018


बुधवार, 16 मई 2018

मैंने भी सुना है लोगों से हाथों में रची तेरे मेंहदी,




ग़ज़ल

तन्हा तो बहुत पहले भी थे पर इस बार की तन्हाई तौबा.
डूबेंगे यकीन लगता है तेरे प्यार  की गहराई तौबा.

मैंने भी सुना है लोगों से हाथों में रची तेरे मेंहदी,
अब जान ही लेकर जायेगी, गलियों की ये शहनाई तौबा.

पूछो न क़यामत होती है उस दौर का मंजर क्या कहिए,
हाथों को उठाकर लेते हैं जिस वक्त वो अंगड़ाई तौबा.

मैं राह तकूँ जिसकी हरदम वो भी तो सुनें दिल की बतियाँ,
अँखियाँ भर आयीं फिर अपनी भूला है वो हरजाई तौबा.

मैं जाऊं जहां उससे पहले पहुँचे हैं मेरे अब अफ़साने,
उंगली को पकड़कर ले जाये तेरे इश्क़ की रुस्वाई तौबा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-05-2018


सोमवार, 7 मई 2018

गुजरात में गुरू जी तगाड़े उठाये हैं.



ग़ज़ल

अच्छे दिनों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं.
गुजरात में गुरू जी तगाड़े उठाये हैं.

एक काम यही बाकी था किस्मत में हमारी,
हगते हुए लोगों के भी फोटू खिचाये हैं.

तुमको हलाल करने में आता तो लुत्फ़ है,
पंछी हैं हम थोड़े थोड़े फड़फड़ाये हैं.

खेतों में नहीं गंदगी सचिवालयों में है,
मिल कर के सभी देश को चूना लगाये हैं.

पढ़ लिख के क्या करोगे हुनर सीख लो उनसे,
अब साथ चाय के वो पकोड़े बनाये है.

तालाब की जो ग्रांट थी वो तो डकार ली,
अब मुफ्त में मज्बूरों से खड्डे खुदाये हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 06-05-2018




शुक्रवार, 4 मई 2018

गमों को हम तो खुशियों में ढाल देते हैं.

ग़ज़ल
गमों को हम तो खुशियों में ढाल देते हैं.
सख़्त पत्थर से भी पानी निकाल देते हैं.
जड़ों को काट वतन की बनायें वो बंजर,
उगा दरख़्त हम सहरा का हाल देते हैं.
बने जो काम, वो सारे बिगाड़ कर रख दें,
लगा के हाथ हम अपने संभाल देते हैं.

वो अलग होंगे वचन देके जो मुकरते हैं,
ज़ुबां से कहते हैं हम जो भी पाल देते हैं.

वो अपने सर की मनायें ये ख़ैर कह दो अब
मेरी जो पगड़ी को अक्सर उछाल देते हैं.

रखे हैं मुल्क को गिरवी  वो अब तो किस्तों में
सभी को हम तो वतन का ख़याल देते हैं.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.04-05-2018