सोमवार, 17 जुलाई 2017

बरसात का मौसम है, ऐसे में चले आओ.


ग़ज़ल

कुछ मेरी सुनो दिल की, कुछ अपनी सुना जाओ.
बरसात का मौसम है, ऐसे में चले आओ.

फुरसत ही नहीं मिलती, मिलने की तुम्हें हमसे,
बातों से यूँ अपनी तुम , ऐसे तो न बहलाओ.

मैं तुझको पुकारे हूँ, आवाज़ लगा तू भी,
पहले भी बहुत तरसे, अब और न तरसाओ.

आकाश से अपने तुम, थोड़ा तो उतर देखो,
तुम अपनी बुलंदी पे, इतना तो न इतराओ.

हम एक ज़माने से, वाक़िफ़ हैं हर एक शै से,
दुल्हन की तरह हमसे ऐसे तो न शरमाओ.



डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 17-07-2017

शनिवार, 1 जुलाई 2017

अपनी मर्जी से कभी पी ही नहीं.

ग़ज़ल

अपनी मर्जी से कभी पी ही नहीं.
ज़िंदगी हमने कभी जी ही नहीं.

उसने उसकी भी दी सज़ा मुझको,
जो ख़ता मैंने कभी की ही नहीं.

बात उसने कही सदा अपनी,
बात मेरी कभी सुनी ही नहीं.

आँसुओं के तलाब सूख गये,
आँख में अब कोई नमी ही नहीं.

आग सीनें में जो लगी थी कभी,
आग फिर वो कभी बुझी ही नहीं.

एक तेरी कमी खली है मुझे,
और दूजी कोई कमी ही नहीं.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.01-07-2017 गुजरात





मंगलवार, 27 जून 2017

मुझको महसूस कर अय मेरे हमनशीं,


ग़ज़ल
रात दिन अब  तेरे मैं  ख़यालों  में हूँ.
मैं जवाबों में हूँ  मैं सवालों  में  हूँ.

मुझको महसूस कर अय मेरे हमनशीं,
उँगलियां बन  के फिरता मैं बालों में हूँ.

चांद को चूमने की करे  आर्ज़ू ,
मैं समन्दर की ऊँची  उछालों  में  हूँ.

जिसको मंज़िल मिले ना कभी उम्र भर,
पांव के ऐसे रिसते मैं छालों  में  हूँ.

मुझ से मत  पूछ तू ज़िंदगी का पता,
मुब्तिला आजकल किन बवालों में हूँ.
                    
               डॉ. सुभाष भदौरिया ता.27-06-2017 गुजरात


सोमवार, 26 जून 2017

बीच में अपने जो दूरियां हैं.


ग़ज़ल

बीच में अपने जो दूरियां हैं.
कुछ तो समझो ये मज्बूरियां हैं.

भीड़ में कोई ख़तरा नहीं हैं,
जान लेवा ये तन्हाइयां हैं.

शुहरतें  साथ  उनके हैं चलतीं,
साथ अपने तो रुस्वाइयां हैं.

ऐब ही देखती हैं मेरे वो,
उसने देखी कहां ख़ूबियां हैं.

हाल दिल का ये लिखती रहेंगी,
जब सलामत मेरी उंगलियां हैं.

थी बुलंदी पे पहले कभी ये,
आज उजड़ी जो ये झांकियां हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.26-06-2017 गुजरात

रविवार, 25 जून 2017

खा के ठोकर वो समझेगा शायद.

ग़ज़ल 
खा के ठोकर वो समझेगा शायद.
मुझको खोकर वो समझेगा शायद.

बात हँस कर के जो नहीं समझा,
बात रोकर वो समझेगा शायद.

दूरियों के पहाड़ इक बिस्तर,
साथ सोकर वो समझेगा शायद.

काग़ज़ी कश्ती पे रक्खे हैं यकीं,
सब डुबोकर वो समझेगा शायद.

दा़ग़ दामन के ना मिटने वाले,
हाथ धोकर वो समझेगा शायद.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.25-06-2017 गुजरात


शनिवार, 17 जून 2017

चूजों की हिफ़ाज़त का जिम्मा नागों को अगर दोगे लोगो.

ग़ज़ल
चूजों की हिफ़ाज़त का जिम्मा नागों को अगर दोगे लोगो.
सामान तबाही का अपने तुम ख़ुद ही कर लोगे लोगो.

रावण चहुँ ओर यहाँ पर हैं सीता का रूदन भी ज़ारी है,
तुम ही हो राम तुम्हीं लक्ष्मन, कब इन की ख़बर लोगे लोगो.

हाथों को धरे यूँ माथे पे तुम जंग को हारोगे कब तक,
जब ज़ुल्म से आँख मिलाओगे ,दावा है सँवर लोगे लोगो.

पश्चिम से  तो लपटें उट्ठे हैं, पूरब से भी  ख़तरा है तुमको,
सोये जो रहे ग़र ऐसे ही,पत्तों से बिखर लोगे लोगो.

देखे हो तमाशा साहिल पे, मौजों का इल्म नहीं तुमको,
पानी जो तुम्हारे सर से गया, तुम ही ख़ुद ही सुधर लोगे लोगो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 17-06-2017



सोमवार, 5 जून 2017

सेल्फी अपनी वो तो खिचाते रहे.

ग़ज़ल
सरहदों पे तो हम सर कटाते रहे.
सेल्फी अपनी वो तो खिचाते रहे.

कितने ख़ुदग़र्ज़ थे देशवासी मेरे,
चौकों छक्कों पे ताली बजाते रहे.

बात गन की ज़रूरी थी जिस वक्त में,
बात मन की वो अपनी सुनाते रहे.

आज भी अपने दुश्मन तो बेख़ौफ़ हैं ,
शाह आते रहे शाह जाते रहे.

कर्ज़ था मुल्क की हम पे मिट्टी का कुछ,
हम लहू दे के उसको चुकाते रहे.

दर बदर हो गये हम तो कुछ ग़म नहीं.
आईना आँधियों को दिखाते  रहे.

डॉ.सुभाष भदौरिया  गुजरात ता.05-06-2017



गुरुवार, 1 जून 2017

धूप में जल रहे हैं कदम दोस्तो.

ग़ज़ल
धूप में जल रहे हैं कदम दोस्तो.
साथ में सिर्फ अपने हैं ग़म दोस्तो.

साथ में आजकल वो कहां हैं मेरे ?
साथ खाई थी जिसने कसम दोस्तो.

वक़्त आया तो हमको पता ये चला,
हमको कितने थे झूटे भरम दोस्तो.

ग़ैर तो ग़ैर उनका गिला क्या करें,
अपनों के भी बहुत हैं करम दोस्तों.

याद फिर उसकी आयी बहुत देर तक,
आँख फिर हो गयी अपनी नम दोस्तों.

मोम के वो नहीं जो पिघल जायेंगे,
अपने पत्थर के हैं इक सनम दोस्तों.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.01-06-2017

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

बेवफ़ा कहके बुलाया तो बुरा मान गये.




ग़ज़ल

बेवफ़ा कहके बुलाया तो बुरा मान गये.
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गये.

कब तलक रहते अँधेरों में,  बताओ तुम ही,
हमने एक दीप जलाया,  तो बुरा मान गये.

तुम नहीं और सही , और नहीं , और सही.
फैसला हमने सुनाया तो बुरा मान गये.

चैन अपना वो चुरायें, तो कोई बात नहीं,
चैन हमने जो चुराया, तो बुरा मान गये.

दिल दुखाने का उन्हें शौक, बहुत था अब तक,
दिल को हमने जो दुखाया, तो बुरा मान गये.

वो घुमाते हैं बहुत सबको अपनी बातों में,
हमने जो उनको घुमाया तो बुरा मान गये.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 17-03-2017

जाने क्या ऐसी कशिश है तुझ गुलफ़ाम के साथ.

ग़ज़ल

जाने क्या ऐसी कशिश है तुझ गुलफ़ाम के साथ.
लोग लेते हैं मेरा नाम   तेरे नाम के साथ .


तुम कहीं और चले जाओ, अब दुनियां से मेरी,
ज़हर भी भेजना था, अपने इस पैग़ाम के साथ.


मुझको मरने का नहीं ग़म, ये ख़्वाहिश है मेरी,
क़त्ल हो जाऊँ तेरे हाथ से आराम के साथ .


मुझसे तन्हाइयों का नर्क कहां कटता है,
रोज़ आता हूँ नज़र एक नये ज़ाम के साथ.


ग़म जो दो चार गर, होते तो सुनाते तुमको,
सैकड़ों ग़म है सीने में ,इस बदनाम के साथ.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.17-03-2017