मंगलवार, 22 जुलाई 2014

आप कहते हो कि भूल जाओ मुझे.

ग़ज़ल
आप कहते हो कि भूल जाओ मुझे.
आप जैसा कोई तो बताओ मुझे.

अपनी पलको में रहने दो कुछ देर तक,
आँसुओं में यूँ ही ना बहाओ मुझे.

यूँ सताने को दुनियां बहुत ये पड़ी,
आप तो इस तरह ना सताओ मुझे.

मेरे दिल की सुनो क्या गुज़रती है अब,
अपने दिल की भी आओ सुनाओ मुझे.

मैं बुझा सा पड़ा हूँ तुम्हें क्या पता,
अपने होटों से आओ जलाओ मुझे.

पहले मुझको बढ़ाया गुणाकार में,
अब लगातार यूँ न घटाओ मुझे.

गर जो हक़दार हूँ तो लगाओ गले
और जो दीवार हूँ तो गिराओ मुझे.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.22-07-2014


गुरुवार, 17 जुलाई 2014

अच्छे दिनों ने अपना क्या हाल कर दिया है .



ग़ज़ल

अच्छे दिनों ने अपना क्या हाल कर दिया है.
धोती को फाड़ उसने रूमाल कर दिया है.

जीना भी बहुत मुश्किल, मरना भी बहुत मुश्किल,
कंगलों को और उसने कंगाल कर दिया है.

 आलू व प्याज को भी मुहंताज़ हो गये हम,
सेठों को और उसने खुशहाल कर दिया है.

गालों में रंगते हैं उसके गुलाब जैसीं,
गालों को पर हमारे पाताल कर दिया है.

इक जाल से जो निकले दूजे में फंस गये फिर
बाज़ीगरी ने उसके कम्माल कर दिया है.

संसद से हो सड़क तक रफ़्तार अब बुलट सी,
लाचार झोपड़ों को बेहाल कर दिया है.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.17-7-2014




सोमवार, 30 जून 2014

हाथ उनके क़ुरान दे मौला.


ग़ज़ल
मेरे लफ़्ज़ों में जान दे मौला.
सबको ऊँची उड़ान दे मौला.

अस्लिहे हाथ जो लिए फिरते,
हाथ उनके क़ुरान दे मौला.

भाईचारा ख़ुलूस बख़्श हमें,
नेकियों का जहान दे मौला.

घुप अँधेरों का क़हर ज़ारी है,
ऱौशनी का निशान दे मौला.

क़ाफ़िला राह बहुत भटके है,
कोई फिर से इमाम दे मौला.

रमज़ान के पावन मास और अपने पहले रोज़े पर ये ग़ज़ल नाज़िल हुई है.
मेरी पोस्टिंग इन दिनो गुजरात के शहेरा नाम के छोटे से कस्बे में हैं.सुब्ह की अज़ान से अक्सर आँख खुल जाती है.आज सुब्ह मस्ज़िद से हो रहे एलान सहरी के वक्त में पन्द्रह मिनिट बाकी है से नींद खुली और तय किया कि आज से हम भी रोज़ा रखें कोलेज में ज़्यादा तरह मुस्लिम विद्यार्थी है वे सभी रोज़े रखते है. रोज़ा खान-पान के साथ अन्य बुराईयों पर फ़तह पाने तथा मज़्लूम मुफ़लिस गरीब लोगों की इमदाद करने का ट्रेनिंग पीरियड है जो साल भर काम आता है.
 सरकारी नौकरी में ट्रांसफर आदि के कारण यूँ भी अक्सर परिवार साथ न होने के कारण आधे दिन का खानपान का रोज़ा तो साल भर रोज़ाना होता ही है. अच्छा कुछ भी सीखने के मेरी फितरत सो रोज़ा के ट्रेनिग आज से शुरु. और ख़ास बात कहते हैं कि इस्लाम में तमाम पवित्र किताबें इसी मास नाज़िल हुईं थी क़ुरान भी. इस ग़ज़ल का मतला तो  दो वर्ष पहले हो गया था पर आज रो़जे के शुरुआत के विचार से इसे मुकम्मल कर सका हूँ ये भी अल्लाह का करम हैं. ये ग़ज़ल अम्न और इंसानियत के नाम है. ईमान वाले इसे समझेंगे आमीन.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख.30-06-2014

रविवार, 29 जून 2014

अब देंखें सफ़र अपना, ये जा के कहां अटके.




ग़ज़ल
अब देंखें सफ़र अपना, ये जा के कहां अटके.
सहरा में बहुत झुलसे, जंगल में बहुत भटके.

आँधी से कहो जाकर, तूफां को बताओ ये,
देखें हैं बलाओं के, हमने तो बहुत झटके.

आँखों में तो बसने की, किस्मत ही कहां अपनी,
आँखों में मगर सब की, दिन रात बहुत खटके.

तू अपनी अदाओं पें, इतरा न बहुत ज़ालिम,
दूकान लगा अपनी, तू और कहीं हटके .

आया जो कभी हद में, नीबू सा निचोड़ेंगे ,
मुश्किल है बुहत मुश्किल, दुश्मन वो मेरा छटके.


कट जाये जो सर अपना, धड़ जूझे है मैदा में.
है मौत की क्या हिम्मत, बाजू में मेरी फटके.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.09-06-2014




सोमवार, 2 जून 2014

और जीने की अब तू दुआयें न दे.



ग़ज़ल
आख़िरी वक़्त अब तू  सदायें न दे.
और जीने की अब तू दुआयें न दे.

ख़ूँन बहने दे ज़ख़्मों से मेरे यूँ ही,
रोकने की उसे अब दवायें न दे.

सांस रुकने लगी, तो तुझे क्या पड़ी,
अपने होटों से अब तू हवायें न दे.

ज़िन्दगी भी बला से कहां कोई कम,
इस तरह खूब सूरत बलायें न दे.

बेवफ़ाई हुनर अब हुई आजकल,
मेरे हिस्से में अब तू वफ़ायें न दे.

शौक़ से जान ले ले भले तू मेरी,
रोज़़ हिस्से में मेरी सज़ायें न दे.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात.ता.०२-०६-२०१४

बुधवार, 7 मई 2014

कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.




ग़ज़ल
 कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा.

बदरियां तो समन्दर  पे बरसा करीं,
खेत मेरा मगर अब भी सूखा पड़ा.

गुम हुआ जब से फिर वो मिला ही नहीं,
हर जगह उसको ढूँढ़े है दिल बावरा.

ज़िन्दगी की सुलगती हुई धूप में,
तेरी यादों का ही एक है आसरा.

आँधियाँ ग़म की चलती रहीं उम्र भर,
जूझता मैं रहा उनसे तन्हा खड़ा.

दिल पे छुरियां चलाते रहे लोग सब,
मैं ग़ज़ल को मगर गुनगुनाता रहा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.07-05-2014







सोमवार, 14 अप्रैल 2014

पत्थर जो उछाले थे सबने, घर उससे बनाया है हमने.


ग़ज़ल
 पत्थर जो उछाले थे सबने, घर  उससे  बनाया है हमने.
 कांटे जो बिछाये  राहों में, घर उससे सजाया है हमने.

तीरों से बदन छलनी है मगरवे अपने शिकस्ता तीर गिने,
हर वार पे दुश्मन के आगे ,कदमों को बढाया है हमने.

 लपटों औ धुओं की बातें कर, इल्ज़ाम लगाते हो हर दम,
कुंदन की तरह अग्नि में बहुत,खुद को भी तपाया है हमने.

गुजरात की ख़ुश्बू फैले है, अब पार समन्दर के लोगो,
मेहनत से हमारी फ़स्लों को,बंजर में  उगाया है हमने.
तुम जात धर्म की बातें कर, उलझाओगे कब तक सबको,
मिल जुल के बढ़ेंगे सब आगे,रस्ता भी दिखाया है हमने.

वो जंग हो चाहे गलियों में,वो जंग हो चाहे सरहद पे,
इंसा का लहू इंसा का ही है,ये राज़ भी पाया है हमने.

फौलादी जिसे तुम समझे होमग़रूर जिसे तुम माने हो,
आये जो कभी आँसू अपने, हँसकर के छिपाया है हमने.

 उपरोक्त ग़ज़ल गुजरात के वज़ीरे आला की संज़ीदा तस्वीर से वाबस्ता है. 
अहले नज़र इसको समझेंगे.
डॉ. सुभाष भदौरिया

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मेरे हाथों से अब तक महक ना गयी, उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.

ग़ज़ल
मेरे हाथों से अब तक महक ना गयी , 
उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.
मेरी चाहत का जादू है अब तक जवां,
 हमने माना कि रिश्ते पुराने हुए.

ये कसक, ये तड़प. ये जलन ये धुआँ, 
उस मुहब्बत की ही बख़्शी सौगात है,
साज़ो-आवाज़ ये शेरो-शायरी, 
उनसे मिलने के कितने बहाने हुए.

वो मिले भी तो कब अब तुम्हीं देख लो, 
मेंहदी हाथों की बालों में जब आ गयी,
मेरी रातों को अब फिर से पर लग गये, 
मेरे तपते हुए दिन सुहाने हुए.

हाथ में हाथ फिर ले लिया आपने,
 पेड़ सूखा हरा कर दिया आपने,
ज़िन्दगी की सुलगती हुई धूप में,
 तेरी चाहत के फिर शामियाने हुए.

रूखी सूखी में हमने गुज़ारा किया, 
उनकी चौखट पे सर ना झुकाया कभी,
अब तो सौदागरों को ये अफ़्सोस है, 
उनके बेकार सारे ख़ज़ाने हुए.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.13-04-2014



सोमवार, 7 अप्रैल 2014

दिल भी भूतों का है डेरा अपना,

ग़ज़ल
 ज़ख्म अपने कभी भरते ही नहीं.
और वे हैं कि समझते ही नहीं.

दिल भी भूतों का है डेरा अपना,
जो भी आये वो ठहरते ही नहीं.

तेरी मरजी है बरस चाहे जिधर,
अब तो दीवाने तरसते ही नहीं.

तूने जिस दिन से शहर छोड़ा है,
तेरी गलियों से गुज़रते ही नहीं.

आयने हसरतों के टूट गये,
भूल कर हम तो सँवरते ही नहीं.

तुमने पहले जो संभाला होता
आज हम ऐसे उजड़ते ही नहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया.गुजरात ता.07-04-2014




बुधवार, 2 अप्रैल 2014

उनसे अब बात कहाँ होती है ?



ग़ज़ल
उनसे अब बात कहाँ होती है ?
अब मुलाक़ात कहाँ होती है ?

रोज़ आँसू कहाँ ये निकले हैं,
रोज़ बरसात कहाँ होती हैं ?

दिन तो कट जाये हैं ये कैसे भी,
खुशनुमा रात कहाँ होती है  ?

रोज़ गुलशन में कहाँ जाते हैं,
रोज़ अब घात कहाँ होती है  ?

इश्क होता है कहाँ  पूछे से ,
इश्क की  ज़ात कहाँ होती है  ?

मौत का साथ निभाना निश्चित,
ज़िन्दगी साथ कहाँ होती है ?

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.02-04-2014