शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल्ली तो गयी अब की गुजरात संभालो अब.



ग़ज़ल

आईनों पे इस तरह कीचड़ ना उछालो अब.
दिल्ली तो गयी अब की, गुजरात सँभालो अब.

उड़ना ये हवाओं में, अब बंद करो साहब,
बाकी जो बची थोड़़ी, उसको ही बचालो अब.

अंबाणी, अदाणी की यारी ये डुबो देगी,
मज़्लूम व मुफ़्लिस की बेहतर है दुआ लो अब.

कोख़ो को यहां माँ की, इंडस्ट्री बतायें जो,
गुस्ताख़ ज़बानों को महफ़िल से निकालो अब.

डस लेंगे तुम्हें इक दिन कुछ होश करो अब भी,
आस्तीन के सांपों को यूँ घर में न पालो अब.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-02-2014

रविवार, 25 जनवरी 2015


ग़ज़ल

जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आन बान रखते हैं.

शब्द भेदी हैं हमको पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.

वैसे तो हम ज़मी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखते हैं.

दोस्तों पर तो जां छिड़कते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.

डूब जाओगे उलझने वालों,
समन्दरों सा उफान रखते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.25-01-2015



सोमवार, 5 जनवरी 2015

सर हमारा तो अभी बाकी है.


ग़ज़ल

हाथ काटे हैं ज़बां काटी है.
सर हमारा तो अभी बाकी है.

दूऱ फेका है शहर से उसने,
तेरी ख़ुश्बू अभी तो आती है.

चाहे जितने तू सितम कर ज़ालिम,
ग़म उठाने का दिल तो आदी है.

एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो,
तोप पर बैठी गुन गुनाती है.

तुम जो आओ तो कोई  बात बने,
सूनी- सूनी ये दिल की घाटी है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 05-01-2015


बुधवार, 31 दिसंबर 2014

सोच कर तेरे बारे में हम क्या करें.



ग़ज़ल

सोच कर तेरे बारे में हम क्या करें.
बीती बातों का अब छोड़़ो ग़म क्या करें.

रोज़ होता नहीं दिल का किस्सा बयां,
रोज़ आँखों को हम अपने नम क्या करें.

मोम के वो नहीं जो पिघल जायेंगे,
अपने पत्थर के हैं इक सनम क्या करें.

साथ तूफां में तो सब निभाते नहीं,
सब में होता नहीं हैं ये दम क्या करें.

झूट की तो नवाज़िश हुई हर तरफ,
सच के हिस्सें में आये ज़ख़्म क्या करें.

जी में आता है सब शूट कर दें यहां,
हाथ में है मगर ये कलम क्या करें.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.31-12-2014


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

जाम अश्कों के हमने पिये किस तरह.


ग़ज़ल

जाम अश्कों के हमने पिये किस तरह.
होंट चुपचाप फिर भी सिये किस तरह.

जन्मदिन पर बधाई तो  देते हैं सब,
ये भी सोचो कि अब तक जिये किस तरह.

ज़ख़्म दो चार होते तो सह लेते हम,
ज़ख़्म पर ज़ख़्म सबने दिये किस तरह.

आँच आने न दी उस मुहब्बत को पर,
सारे इल्ज़ाम हमने लिये किस तरह.

एक ही अपने सीने में दिल था मगर,
लाख टुकड़े सभी ने किये किस तरह.


आज अपने जन्म दिन पर ये ग़ज़ल चाहने वालों की नज़र है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात.  ता. 05-12-2014






शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

वादा करके वो ज़ालिम मुकर जायेगा.


ग़ज़ल

वादा करके वो ज़ालिम मुकर जायेगा.
राह तक तक के हर दिन गुज़र जायेगा.


शीशा-ए-दिल से यूं दिल्लगी तू न कर,
हाथ से गर गिरा तो बिखर जायेगा.


और भी  उसकी गुस्ताख़ियां बढ़ गयीं,
हमने सोचा था इक दिन सुधर जायेगा.


तू भी पछतायेगा देख मेरी तरह,
ये नशा इश्क़ का जब उतर जायेगा.


घाव ताज़ा है तकलीफ़ देगा ही ये,
सब्र कर रफ़्ता ऱफ़्ता ये भर जायेगा.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.28-11-2014


शनिवार, 1 नवंबर 2014

दिल का ये ज़ख़्म है गहरा नहीं भरने वाला.


ग़ज़ल

दिल का ये ज़ख़्म है गहरा नहीं भरने वाला.
 तेरा शैदाई ये ज़ल्दी नहीं मरने  वाला.


मैं जहां भी गया यादें भी तेरी साथ रहीं,
ये नशा अब न मुहब्बत का उतरने वाला.


पास आये तो वो मौजों की रवानी समझे,
 दूर ही दूर समन्दर से गुज़रने वाला .


तू परेशान बहुत है तू परेशान न हो,
वो संग दिल है नहीं मोम पिघलने वाला.


है अभी वक्त तू , दो चार ही बातें कर ले,
ये मुसाफ़िर  नहीं ज़्यादा है ठहरने वाला.


आँधियां ले गयी किस ओर उड़ाकर उसको,
शान से बैठा था शाखों पे बिखरने वाला.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 01-11-2014

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

दूर ले जाये हमको बहा के कहीं,





ग़ज़ल

हमने चाही वो हमको ख़ुशी ना मिली.

दुश्मनी तो मिली वो दोस्ती ना मिली.


दूर ले जाये हमको बहा के कहीं,

तेज़ रफ़्तार की वो नदी ना मिली.


यूँ अँधेरे मिले बेतहाशा हमें,

पर लिपटकर कभी रौशनी ना मिली.


उम्र भर होंट पर हम सजायें जिसे,

पुरसुकूं दिल की वो बांसुरी ना मिली.


कोई आँसू बहाये हमारे लिए ?

आँख में वो किसी के नमी ना मिली.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.३०-१०-२०१४




बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

इक बार तुम्हें देखा जिसने सब होश गवा बैठे अपने.



ग़ज़ल

होटों का तबस्सुम समझे हैं आँखों की ज़बा भी जाने हैं.
लाखों में तुम्हें अय जाने-ग़ज़ल हम दूर से ही पहिचाने हैं.


इक बार तुम्हें देखा जिसने सब होश गवा बैठे अपने,
मस्जिद से नमाज़ी भी गुम हैं सूने-सूने बुतख़ाने हैं.


होटों का तुम्हारे, सीरीपन, गालों पे दहकते अंगारे,
आँखों का तुम्हारे क्या कहना चलते फिरते मयखाने हैं.


फूलों से तुम्हारी क्या तुलना कलियां भी लगें फीकी फीकी.
हम भी तुम्हारे शैदाई हम भी तो तेरे दीवाने हैं.  


ये आग जलाती है हमको मालूम यहां पर है सबको,
जलने को मगर बेताब सभी हर सिम्त यहां परवाने हैं.

डॉ.सुभाष भदौरिया 






रविवार, 5 अक्तूबर 2014

रातों को जो तन्हा हम सड़को पे निकलते हैं.



ग़ज़ल
रातों को जो तन्हा हम सड़कों पे निकलते हैं.
जुगनू तेरी यादों के, फिर साथ में चलते हैं.


आयीं हो हवायें क्या छू कर के उन्हें बोलो,
अरमान मेरे दिल के जाने क्यों मचलते हैं.


इक बार चले आओ, मुद्दत से तरसते हैं,
दीवाने कहां तेरे फोटो से बहलते हैं.


हमने तुम्हें चाहा है हमने तुम्हें पूजा है,
वो लोग अलग होंगे जो मीत बदलते हैं.


मुश्किल हैं बहुत मुश्किल चाहत की ये राहें भी,
हम तेरी मुहब्बत में गिर गिर के सँभलते हैं.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात