मंगलवार, 28 जून 2016

सब्जी भी हई गायब खाली मेरी थाली है.



ग़ज़ल
इस दौर के हाक़िम की हर चाल निराली है.
सब्जी भी हई गायब खाली मेरी थाली है.

हमने तो कटोरी में डुबकी को लगा देखा,
है दाल बहुत मंहगी और जेब भी खाली है.

लोगों की लुगाई ने घर ऐसे संभाला  है,
शक्कर न मिली गुड की फिर चाय बनाली है.

इन अच्छे दिनों से तो बेहतर थे पुराने दिन,
मँहगाई ने लोगों की अब नींद चुराली है .


इस योग से तो साहब ये पेट नहीं भरते,
हम जैसे गरीबों का दिल अब भी सवाली है.


अब सर को पकड़ कर के रोते हो बहुत लोगो,
जब नीम हकीमों से तुम ने ही दवा ली है.  

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.28-06-2016






शनिवार, 25 जून 2016

मेघ फिर काले-काले ये छाने लगे.

ग़ज़ल
मेघ फिर काले-काले ये छाने लगे.
और भी आप अब याद आने लगे.

अपने दिल से निकालो न अब इस तरह,
आते आते यहाँ तक ज़माने लगे.

दर्द-ए-दिल की दवा थे समझते जिन्हें,
आजकल वे ही दिल को दुखाने लगे.

ख़ूबियों की मेरे कुछ कदर ही नहीं,
ऐब ही बस  मेरे वे गिनाने लगे.

पूछते हैं जुदाई का अब सब सबब,
क्या करें हम तो नज़रे चुराने लगे.

तुझसे बिछुड़े अगर हम तो मर जायेंगे,
जैसे तैसे तो थे हम ठिकाने लगे.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.25-06-2016



शुक्रवार, 3 जून 2016

उनसे अब बात कहां होती है ?

ग़ज़ल
उनसे अब बात कहां होती है ?
अब मुलाकात कहां होती है ?

रोज़ आँसू कहां निकलते हैं  ?
रोज़ बरसात कहां होती है ?

दिन तो कट जाय है किसी तरह,
अब हंसी रात कहां होती है  ?

भूल जायें तुम्हें ! ना मुमकिन .
ऐसी आदात कहां होती है   ?

इश्क में जां  लुटानी पड़ती है,
सब की औकात कहां होती है  ?

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.03/06/2016



सोमवार, 30 मई 2016

कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.

गज़ल
कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा.

बदरियां तो समन्दर  पे बरसा करीं ,
खेत मेरा मगर अब भी सूखा पड़ा.

जब से बिछुड़ा, दुबारा मिला ही नहीं,
हर जगह उसको ढूढे है दिल बावरा.

तेरी गलियों से गुज़रा तो ऐसा लगा,
बिन पिये ही मुझे हो गया फिर नशा.

आखिरी सांस तक लब पे वो ही रहे,
चाहे गर्दन पे रख दे जमाना छुरा.

जिसकी मर्जी हो उसकी इबादत करे,
मेरा महबूब ही है मेरा अब ख़ुदा .

डॉ. सुभाष भदौरिया ता. ३०-०५-२०१६




शुक्रवार, 13 मई 2016

हम वो नहीं जो धूप की गर्मी से पिघल जायें.


ग़ज़ल
हम वो नहीं जो धूप की गर्मी से पिघल जायें.
फेंकोगे जो सहरा में तो सहरा में भी खिल जायें.

थोड़े से लड़खड़ाये  क्या सोचा कि गिरेंगे,
हम रिन्द हैं वो पी के जो कुछ और सँभल जायें.

सुहबत का असर तेरी ये अब गुल ना खिलाये,
तेरे ही साथ साथ कहीं हम ना बदल जायें.

इस ख़ौफ़ से आँखों नें मेरी कर लिया पर्दा,
आँसू ना कहीं आँख से मेरी ये निकल जायें.

फिर ढूँढ़ते फिरोगे हमें दूर दूर तक ,
दुनियां से तेरी दूर कहीं हम ना निकल जायें.

          डॉ. सुभाष भदौरिया. ता. 13-05-2016




सोमवार, 2 मई 2016

जीना तुम्हारे बिन भी तो तुमने सिखा दिया.


ग़ज़ल
जीना तुम्हारे बिन भी तो तुमने सिखा दिया.
तुमने कहा था हमको भुला दो,  भुला दिया.

अब क्या कहें अख़ीरी में,किस किस का नाम लें
आया करीब दिल के जो उसने दग़ा दिया.


इक बूँद थी तो तुम को कोई, पूछता न था,
मुझमें गिरीं तो तुमको समन्दर बना दिया.


हम दर बदर भटक रहे हैं तुमको क्या पड़ी,
तुमने तो खैर अपना नया घर बसा दिया.

होटों से मुस्कराते रहे महफिलों में हम,
आये जो अश्क आँख में उनको छुपा दिया.


   सब झूट कह के आपकी आँखों में बस गये,
सच हमने क्या कहा कि मेरा घर जला दिया.

डॉ.सुभाष भदौरिया.ता.02-05-2016






बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अपनी मर्ज़ी से कभी पी ही नहीं.


ग़ज़ल

अपनी मर्ज़ी से कभी पी ही नहीं.
ज़िन्दगी हमने कभी जी ही नहीं.

उसने उसकी भी दी सज़ा मुझको,
जो ख़ता मैंने कभी की ही नहीं.

बात अपनी कही सदा उसने,
बात मेरी मगर सुनी ही नहीं.

आँसुओं के तलाब सूख गये,
आँख में अब कोई नमी ही नहीं.

एक तेरी कमी खली है मुझे,
और दूजी कोई कमी ही नहीं.



डॉ. सुभाष भदौरिया. ता.२७-०४-२०१६

मंगलवार, 29 मार्च 2016

छाँव की फिर लगी याद आने.

ग़ज़ल
आँख सूरज लगा है दिखाने.
छाँव की फिर लगी याद आने.
हम तलबगार तेरे अभी भी,
तू चली आ किसी भी बहाने.
आँख तरसे है अब मुद्दतों से ,
तुझको देखे हुए हैं जमाने.
जुस्तजू एक तेरी ही थी बस,
हमने चाहे कहां थे ख़जाने ?
ज़िन्दगी क्या है अब पूछिये मत,
सांस के चल रहे कारखाने.
कोई गुज़री हुई याद आयी,
रोते रोते लगे मुस्कराने.
डॉ. सुभाष भदौरिया ता.29-03-2016




बुधवार, 9 मार्च 2016

अब कटेगी ज़बां अब कटेगा ये सर,



 ग़ज़ल          
तेल मँहगा हुआ दाल मँहगी हुई.
झोपड़ी की व्यथा और गहरी हुई.

उड़ रहा आसमाँ में उसे क्या पता ?
ज़िन्दगी हम ग़रीबों की ठहरी हुई .

अब कटेगी ज़बां अब कटेगा ये सर,
रात अब और ज़्यादा अँधेरी हुई .

देश द्रोही को खाने के लाले पड़े,
देश प्रेमी की फुल अब तिजोरी हुई.

एक एक पे सौ सौ ने हमले किये,
ये भी साहब कोई क्या दिलेरी हुई.

जंग अब ये  अमीरी गरीबी की है,
जंग  अब  ये कहाँ तेरी मेरी हुई.

मौज़ूदा हालात के नाम डॉ. सुभाष भदौरिया .





रविवार, 14 फ़रवरी 2016

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,


ग़ज़ल

नींद रातों की मेरी,रोज़ उड़ाने वाले.
खो गये जाने कहाँ, दिल को लुभाने वाले.

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,
याद आते हैं बहुत हमको भुलाने वाले.

रूठ ले,रूठ ले, फिर मान भी जा अपनों से,
कहीं उठ जायें न दुनियां से मनाने वाले

सर्द रातों की चुभन , उस पे तमन्ना उसकी,
तू कभी भूल से आ दिल को सुहाने वाले.


ये अलग बात कलम हाथ कर दिये सबने,
तेरी तस्वीर कहाँ भूले ? बनाने वाले.

डॉ. सुभाष भदौरिया  गुजरात ता.  14- 02-2016