सोमवार, 14 अप्रैल 2014

पत्थर जो उछाले थे सबने, घर उससे बनाया है हमने.


ग़ज़ल
 पत्थर जो उछाले थे सबने, घर  उससे  बनाया है हमने.
 कांटे जो बिछाये  राहों में, घर उससे सजाया है हमने.

तीरों से बदन छलनी है मगरवे अपने शिकस्ता तीर गिने,
हर वार पे दुश्मन के आगे ,कदमों को बढाया है हमने.

 लपटों औ धुओं की बातें कर, इल्ज़ाम लगाते हो हर दम,
कुंदन की तरह अग्नि में बहुत,खुद को भी तपाया है हमने.

गुजरात की ख़ुश्बू फैले है, अब पार समन्दर के लोगो,
मेहनत से हमारी फ़स्लों को,बंजर में  उगाया है हमने.
तुम जात धर्म की बातें कर, उलझाओगे कब तक सबको,
मिल जुल के बढ़ेंगे सब आगे,रस्ता भी दिखाया है हमने.

वो जंग हो चाहे गलियों में,वो जंग हो चाहे सरहद पे,
इंसा का लहू इंसा का ही है,ये राज़ भी पाया है हमने.

फौलादी जिसे तुम समझे होमग़रूर जिसे तुम माने हो,
आये जो कभी आँसू अपने, हँसकर के छिपाया है हमने.

 उपरोक्त ग़ज़ल गुजरात के वज़ीरे आला की संज़ीदा तस्वीर से वाबस्ता है. 
अहले नज़र इसको समझेंगे.
डॉ. सुभाष भदौरिया

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मेरे हाथों से अब तक महक ना गयी, उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.

ग़ज़ल
मेरे हाथों से अब तक महक ना गयी , 
उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.
मेरी चाहत का जादू है अब तक जवां,
 हमने माना कि रिश्ते पुराने हुए.

ये कसक, ये तड़प. ये जलन ये धुआँ, 
उस मुहब्बत की ही बख़्शी सौगात है,
साज़ो-आवाज़ ये शेरो-शायरी, 
उनसे मिलने के कितने बहाने हुए.

वो मिले भी तो कब अब तुम्हीं देख लो, 
मेंहदी हाथों की बालों में जब आ गयी,
मेरी रातों को अब फिर से पर लग गये, 
मेरे तपते हुए दिन सुहाने हुए.

हाथ में हाथ फिर ले लिया आपने,
 पेड़ सूखा हरा कर दिया आपने,
ज़िन्दगी की सुलगती हुई धूप में,
 तेरी चाहत के फिर शामियाने हुए.

रूखी सूखी में हमने गुज़ारा किया, 
उनकी चौखट पे सर ना झुकाया कभी,
अब तो सौदागरों को ये अफ़्सोस है, 
उनके बेकार सारे ख़ज़ाने हुए.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.13-04-2014



सोमवार, 7 अप्रैल 2014

दिल भी भूतों का है डेरा अपना,

ग़ज़ल
 ज़ख्म अपने कभी भरते ही नहीं.
और वे हैं कि समझते ही नहीं.

दिल भी भूतों का है डेरा अपना,
जो भी आये वो ठहरते ही नहीं.

तेरी मरजी है बरस चाहे जिधर,
अब तो दीवाने तरसते ही नहीं.

तूने जिस दिन से शहर छोड़ा है,
तेरी गलियों से गुज़रते ही नहीं.

आयने हसरतों के टूट गये,
भूल कर हम तो सँवरते ही नहीं.

तुमने पहले जो संभाला होता
आज हम ऐसे उजड़ते ही नहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया.गुजरात ता.07-04-2014




बुधवार, 2 अप्रैल 2014

उनसे अब बात कहाँ होती है ?



ग़ज़ल
उनसे अब बात कहाँ होती है ?
अब मुलाक़ात कहाँ होती है ?

रोज़ आँसू कहाँ ये निकले हैं,
रोज़ बरसात कहाँ होती हैं ?

दिन तो कट जाये हैं ये कैसे भी,
खुशनुमा रात कहाँ होती है  ?

रोज़ गुलशन में कहाँ जाते हैं,
रोज़ अब घात कहाँ होती है  ?

इश्क होता है कहाँ  पूछे से ,
इश्क की  ज़ात कहाँ होती है  ?

मौत का साथ निभाना निश्चित,
ज़िन्दगी साथ कहाँ होती है ?

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.02-04-2014


शुक्रवार, 28 मार्च 2014

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.

ग़ज़ल
बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.
यूँ सरेआम तू  जग हँसाई न कर.

दोस्त राहों में काँटे बिछाने लगे,
लोग कहते थे ज़्यादा भलाई न कर.

दिल की राहों में ज़ोख़म बहुत हैं सुनो
और ज़्यादा तू अब दिल-लगाई न कर


ख़ूँन रिसने दे ज़ख़्मों से मेरे यूँ ही,
दूसरों की मगर यूँ दवाई न कर.

क़त्ल कर शौक़ से हक़ दिया ये तुझे.
सामने दुश्मनों के बुराई न कर.

साथ आ न मेरे मुझको कुछ ग़म नहीं,
साथ औरों के तो आवा-जाई न कर .

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.28-03-2014


शुक्रवार, 21 मार्च 2014

वो हवाओं में वार करता है

ग़ज़ल
वो हवाओं में वार करता है.
खूब ऊँचे शिकार करता है.

उसकी हसरत है क्या मैं जाने हूँ.
मुझसे कहता है प्यार करता है.

मेरी आँखों से पी बहक जाये,
होठ पर जां निसार करता है.

एक दो बार हो तो माफ़ करूँ,
ग़लतियां बार बार करता है.

जिस्म की वादियों में खोया है,
दिल के टुकड़े हजार करता है.

बेवफ़ाई हो अब हुनर जैसे,
सबसे वादे उधार करता है.

मेरी जैसी अगर हजारों हैं,
क्यों मेरा इंतज़ार करता है.

डॉ. सुभाष भदौरिया तारीख-21-03-2014





हाथ आती कहाँ तितलियां हैं ?





ग़ज़ल
बीच में अपने जो दूरियाँ हैं.
कुछ तो समझो ये मज़बूरियां है.

ऐब हम में हैं लाखों क़बूल,
ये न भूलो कि कुछ खूबियां हैं.

उम्र भर हम तो भागा किये हैं,
हाथ आती कहां तितलियां है.

भीड़ में कोई ख़तरा नहीं है,
जान लेवा ये तन्हाईयां हैं.

शुहरतें साथ उनके हैं चलतीं,
साथ अपने तो रुस्वाईयाँ हैं.

ज़ख़्म फिर से हरे हो उठे हैं,
जब भी बजती ये शहनाईयां हैं.

फिर समन्दर भी उछले बहुत है,
चाँद ले जब भी अँगड़ाईयां है.
डॉ. सुभाष भदौरिया तारीख-21-03-2014




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

हो सके तो ज़रा मुस्करा दीजिये.

ग़ज़ल
 अपनी नज़रों से यूं ना गिरा दीजिये.
दूसरी जी में आये सज़ा दीजिये.

छोड़िये, छोड़िये, सारे शिकवे-गिले,
हो सके तो ज़रा मुस्करा दीजिये.

थम ना जायें कहीं आशिकी में कदम,
थोड़ा थोड़ा सही हौसला दीजिये.

मर न जाये कहीं याद में तेरी ये,
अपने बीमार को कुछ दवा दीजिये.

फ़ैसला जो भी कीजे वो मंज़ूर है,
क्या ख़ता है हमारी बता दीजिये.

हम जो हकदार हैं तो लगाओ गले,
और जो दीवार हैं तो गिरा दीजिये.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.14-02-2013


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

काम आसां दुशासन का अब हो गया, वस्त्र खुद द्रौपदी अब उतारे यहां.


ग़ज़ल
काम आसां दुशासन का अब हो गया, 
वस्त्र खुद द्रौपदी अब उतारे यहां.
बेच डाली हया उसने खुद देखिये,
 कृष्ण को कोई अब ना पुकारे यहां.

तीर अर्जुन के अब सारे नाकाम हैं, 
भीष्म आचार्य भी अब सभी मौन हैं,
बात सारी बिगाड़ी है शुकनि ने जब,
 फिर युधिष्ठर भी कैसे संवारे यहां.

अब अँधेरों का ये दौर है दोस्तो,
रोशनी का गला घोंट देते हैं वे,
वो डिनर, लंच लेते बड़ी शान से,
 रूखी सूखी पे सब दिन गुज़ारे यहां.

धूम फिक्सम की है अब तो चारों तरफ,
 स्वर्णिम स्वर्णिम वो गायें ग़जब देखिये,
आँख और कान पर पट्टी बांधे हैं वो,
 सच को कह कह के अब हम तो हारे यहां.

उड़ रहा आसमां में उसे क्या पता,
 कितने खड्डे सड़क पर हुए आजकल,
देश तो खुद सुधर जायेगा देखना
 पहले खु़द को वो अपने सुधारे यहां.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.13-02-2014


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

प्रोब्लम, प्रोब्लम, प्रोब्लम.

ग़ज़ल
प्रोब्लम, प्रोब्लम, प्रोब्लम.
अब तो चारों तरफ प्रोब्लम.
 बेवफ़ा, बेवफ़ा, बेवफ़ा,
आज मयख़ाने आये हैं हम.
 तेरा ग़म, तेरा ग़म, तेरा ग़म,
जान ले ले ना अब तेरा ग़म.
 ली कसम, ली कसम, ली कसम,
भूलने की तुझे ली कसम.
 चश्मेनम, चश्मेनम चश्मेनम,
हो गयी आज फिर चश्मेनम.
 है करम, है करम, है करम,
दूसरों पे है उनका करम.
 हैं सनम, हैं सनम, हैं सनम,
अपने पत्थर के हैं इक सनम.

डॉ. सुभाष भदौरिया.ता.06-02-2014