रविवार, 31 मई 2015

तुम भूल कर कभी भी, न किसी से प्यार करना.

ग़ज़ल

तुम भूल कर कभी भी, न किसी से प्यार करना.
यूँ ही चुपके-चुपके रोना, यूँ ही इंतज़ार करना.


दिल भूलता नहीं है , मिलना वो बिछुड़ जाना,
इक बात के लिए वो बातें हजार करना.


कभी खुद ही रूठ जाना, कभी खुद ही मान जाना,
कभी पास आ लिपटना, कभी बेकरार करना.


मुझे मौत भी हँसी है तू जो साथ क्या कमी है,
मेरी मुश्किलों के साथी मेरा एतबार करना,

ये तो पहले भी हुआ है ये तो बाद में भी होगा,
दुनियां का दो दिलों को यूँ ही संगसार करना.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात.ता.३१-०५-२०१५








शनिवार, 2 मई 2015

गुजरात में हिन्दी पर छुरियां जो चलाते हैं.






ग़ज़ल
हिन्दी का कतल कर के त्यौहार मनाते हैं.
इस दौर के हाकिम अब आँखों ना सुहाते हैं.

संसद में तो हिन्दी के वे गीत तो गाते हैं.
गुजरात में हिन्दी पर छुरियां जो चलाते हैं.

कहने को वो हिन्दी की रोटी को जो खाते हैं,,
दड़बे में वो पेंशन की अब ख़ैर मनाते हैं.

मुज़रिम हैं सभी मुज़रिम देखें है तमाशा जो,
है राष्ट्र की जो भाषा उसको लतियाते हैं,

घर फूँक के हमने तो गाया है कबीरा को,
ज़ालिम  को सदा हम तो आईना दिखाते हैं,

होते हैं ज़ुलम जब जब  मज़्बूर व मुफ़लिस पर,
 भूकंप सुनामी सब ऐसे नहीं आते हैं.

गुजरात की ग्रांटिड कॉलेजों से हिन्दी गायब. वर्ष २०१५-२०१६ की राज्य की सभी अनुदानित कॉलेजों की भर्ती प्रक्रिया में 496 अध्यापकों की पदों की भर्ती में एक भी पद हिन्दी के अध्यापकों का रिक्त नहीं हैं, मोदीजी मुख्यमंत्री के १० वर्ष के स्वर्णिम काल में पहले कक्षा १० और कक्षा १२ से हिन्दी को हटाया गया तो फिर ये कॉलेजों में छात्र- छात्रायें कक्षा ९ के बाद कॉलेजों में हिन्दी क्यों पढ़े परिणाम स्वरूप जो होना था हो के रहा. खुद मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र की सरकारी कॉलेज में से हिन्दी गायब कर दी गयी थी. अब सब हिन्दी के पढे पीएच.डी. छात्र छात्रायें रो रहे हैं हमारा क्या होगा. गुरुओं ने हिन्दी पढ़ा के अपना तो घर भरा हमें अनाथ कर दिया. देखने वाली वात ये है कि गुजरात में महात्मा गांधी ने तो हिन्दी को महत्व दिया ही था उससे पूर्व कच्छ के महाराजा ने मध्यकाल में कच्छ में ब्रजभाषा की पाठशाला खोली थी. हमारी शिक्षा भी हिन्दी में पीएच.डी तक गुजरात में ही हुई. आज हिन्दी को गुजरात से क्यों गायब किया गया एक सवाल है. गुजरात में धडाधड अंग्रेजी की लेब खोली गयीं क्यों कंप्यूटर बिके फिर भी आप अध्यापकों में सबसे ज्यादा १२१ जगह खाली हैं अंग्रेजी के नेट स्लेट अध्यापक नहीं मिल रहे. देश के प्रधान मंत्री खुद संसद में हिन्दी में भाषण देते हैं. हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा है फिर उसकी गुजरात में हत्या क्यों हुई. हिन्दी के गुजरात में हुई हत्या पर सभी गुजरात के देश प्रेमी शोक मनायें. अब हिन्दी पढ़ने पढाने वालों को कहीं और आशियाना ढूँढना पड़ेगा. चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना. .उपरोक्त  ग़ज़ल इसी हादसे पर है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख- 02-05-2015



सोमवार, 13 अप्रैल 2015

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.

ग़ज़ल

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.
मानजा, मानजा, जगहँसाई न कर.

तोड़़ दे मेरे दिल को कोई ग़म नहीं,
दुश्मनों से तो यूँ दिल मिलाई न कर.

और भी दाग़ लग जायें दामन तेरे,
रात-दिन और ज़्यादा सफ़ाई न कर.

खेत खलिहान की कुछ ख़बर ले ज़रा,
आसमानों में अब यूँ उड़ाई न कर.

ख़ूँन सरहद पे  बहता ज़रा रोक अब,
और ज़ख़्मों की ज़्यादा खुदाई न कर.

फासले रख भले चाहने वालों से,
गैर के तू यहां आवा-जाई न कर.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.१३-०४-२०१५





शनिवार, 4 अप्रैल 2015

तेरी ख़ुश्बू को इसमें ढूंढ़ते हैं. मेरे साथी मोबाइल सूँघते हैं.

ग़ज़ल
तेरी ख़ुश्बू को इसमें ढूंढ़ते हैं.
मेरे साथी मोबाइल सूँघते हैं.

मैं डीलिट यूँ तो कर देता हूँ सब कुछ,
मगर आँसू कहां ये सूखते हैं ?

तुम्हीं कह दो कहूँ, क्या उनसे अब मैं,
तेरे बारे में अब सब पूछते हैं.

ज़रा सी बात पे रूठे हो तुम तो,
कहीं अपनों से ऐसे रूठते हैं.

गिरे हैं टूटकर शाखों से पत्ते,
चले आओ कि हम भी टूटते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.04-04-2015


सोमवार, 30 मार्च 2015

छोड़ जाने की बात करते हो. दिल दुखाने की बात करते हो.

ग़ज़ल
छोड़ जाने की बात करते हो.
दिल दुखाने की बात करते हो.

तुम कहानी हो क्या बताओ जो ?
भूल जाने की बात करते हो.

सीख लेना हमारे बिन जीना ,
आज़्माने की बात करते हो.

हम तो रोना भी भूल बैठे हैं,
मुस्कराने की बात करते हो.

अगले जन्मों में फिर मिलेंगे हम,
क्यों बनाने की बात करते हो.

दिल की राहों में बहुत जोख़म हैं ,
दिल लगाने की बात करते हो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.30-03-2015




सोमवार, 23 मार्च 2015

मैं पागल था मगर इतना नहीं था.

ग़ज़ल

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था.
मैं पागल था, मगर इतना नहीं था.

समन्दर से निकल आया मैं बचकर,
तेरी आँखों में जब डूबा नहीं था.

पुकारा ना मेरी खुद्दारियों ने,
तुझे अय दोस्त मैं भूला नहीं था.

मैं पहुँचा रूह तक माना ये तूने,
जहां पहले कोई पहुँचा नहीं था.

चला बाज़ार में मैं कुछ दिनों तक,
मैं सिक्का तो मगर खोटा नहीं था.

तलाशेंगे मुझे खो जाने पर ये,
जो कहते हैं कि मैं अच्छा नहीं था.

ये माना सांसें चलती थी ये मेरी,
मगर ये सच कि मैं ज़िन्दा नहीं था.

सभी ने देखा मुझको बाहरी ही,
किसी ने भीतरी देखा नहीं था.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.२३-०३-२०१५

बुधवार, 18 मार्च 2015

उदास हैं तो उदासी का कुछ सबब होगा.

ग़ज़ल

उदास हैं तो उदासी का कुछ सबब होगा.
तू ही बता दे कि दीदार तेरा कब होगा.

अभी उम्मीद की थोड़ी सी किरन बाकी है,
मरे जो प्यासे तो फिर देखना ग़जब होगा.

खुली रहेंगी मेरी आँखें बाद मरने के,
तेरी ही चाह, तेरा नाम ज़ेरेलब होगा.

गुनाह मैने तो अपने सभी क़बूल किये
सफ़ेदपोश कभी तू भी तो तलब होगा.

वो ताज़ो तख़्त को हँसकर के छोड़ने वाला,
ज़रूर आशिकी उसका यही मज़्हब होगा.

इसी ख़याल ने रक्खा है मालामाल मुझे,
कहीं पे देखना अपना भी कोई रब होगा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-03-2015




रविवार, 1 मार्च 2015

अच्छे दिनों ने बीते दिनों की याद दिला दी.


ग़ज़ल

अच्छे दिनों ने बीते दिनों की याद दिला दी.
ख़ासों को खुश किया है तो आमों को सज़ा दी.

पत्थर को पूजने का ये अंजाम हुआ है
अपना ख़याल ऱखने की हमको है  सलाह दी.

लौटाना अय खुदा तू सलामत मेरे घर पे,
मां-बाप ने घर निकले ये बेटी को दुआ दी..

छीनेगा अब जमीन भी मुफ़लिस की बची जो,
इस फिक्र ने गरीब की अब नींद उड़ा दी.

गंगा को साफ करने जो निकला था सरेआम,
उम्मीद की जो अर्थी थी गंगा में बहा दी.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात 01-03-2015




शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल्ली तो गयी अब की गुजरात संभालो अब.



ग़ज़ल

आईनों पे इस तरह कीचड़ ना उछालो अब.
दिल्ली तो गयी अब की, गुजरात सँभालो अब.

उड़ना ये हवाओं में, अब बंद करो साहब,
बाकी जो बची थोड़़ी, उसको ही बचालो अब.

अंबाणी, अदाणी की यारी ये डुबो देगी,
मज़्लूम व मुफ़्लिस की बेहतर है दुआ लो अब.

कोख़ो को यहां माँ की, इंडस्ट्री बतायें जो,
गुस्ताख़ ज़बानों को महफ़िल से निकालो अब.

डस लेंगे तुम्हें इक दिन कुछ होश करो अब भी,
आस्तीन के सांपों को यूँ घर में न पालो अब.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-02-2014

रविवार, 25 जनवरी 2015


ग़ज़ल

जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आन बान रखते हैं.

शब्द भेदी हैं हमको पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.

वैसे तो हम ज़मी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखते हैं.

दोस्तों पर तो जां छिड़कते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.

डूब जाओगे उलझने वालों,
समन्दरों सा उफान रखते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.25-01-2015