सोमवार, 2 मई 2016

जीना तुम्हारे बिन भी तो तुमने सिखा दिया.


ग़ज़ल
जीना तुम्हारे बिन भी तो तुमने सिखा दिया.
तुमने कहा था हमको भुला दो,  भुला दिया.

अब क्या कहें अख़ीरी में,किस किस का नाम लें
आया करीब दिल के जो उसने दग़ा दिया.


इक बूँद थी तो तुम को कोई, पूछता न था,
मुझमें गिरीं तो तुमको समन्दर बना दिया.


हम दर बदर भटक रहे हैं तुमको क्या पड़ी,
तुमने तो खैर अपना नया घर बसा दिया.

होटों से मुस्कराते रहे महफिलों में हम,
आये जो अश्क आँख में उनको छुपा दिया.


   सब झूट कह के आपकी आँखों में बस गये,
सच हमने क्या कहा कि मेरा घर जला दिया.

डॉ.सुभाष भदौरिया.ता.02-05-2016






बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अपनी मर्ज़ी से कभी पी ही नहीं.


ग़ज़ल

अपनी मर्ज़ी से कभी पी ही नहीं.
ज़िन्दगी हमने कभी जी ही नहीं.

उसने उसकी भी दी सज़ा मुझको,
जो ख़ता मैंने कभी की ही नहीं.

बात अपनी कही सदा उसने,
बात मेरी मगर सुनी ही नहीं.

आँसुओं के तलाब सूख गये,
आँख में अब कोई नमी ही नहीं.

एक तेरी कमी खली है मुझे,
और दूजी कोई कमी ही नहीं.



डॉ. सुभाष भदौरिया. ता.२७-०४-२०१६

मंगलवार, 29 मार्च 2016

छाँव की फिर लगी याद आने.

ग़ज़ल
आँख सूरज लगा है दिखाने.
छाँव की फिर लगी याद आने.
हम तलबगार तेरे अभी भी,
तू चली आ किसी भी बहाने.
आँख तरसे है अब मुद्दतों से ,
तुझको देखे हुए हैं जमाने.
जुस्तजू एक तेरी ही थी बस,
हमने चाहे कहां थे ख़जाने ?
ज़िन्दगी क्या है अब पूछिये मत,
सांस के चल रहे कारखाने.
कोई गुज़री हुई याद आयी,
रोते रोते लगे मुस्कराने.
डॉ. सुभाष भदौरिया ता.29-03-2016




बुधवार, 9 मार्च 2016

अब कटेगी ज़बां अब कटेगा ये सर,



 ग़ज़ल          
तेल मँहगा हुआ दाल मँहगी हुई.
झोपड़ी की व्यथा और गहरी हुई.

उड़ रहा आसमाँ में उसे क्या पता ?
ज़िन्दगी हम ग़रीबों की ठहरी हुई .

अब कटेगी ज़बां अब कटेगा ये सर,
रात अब और ज़्यादा अँधेरी हुई .

देश द्रोही को खाने के लाले पड़े,
देश प्रेमी की फुल अब तिजोरी हुई.

एक एक पे सौ सौ ने हमले किये,
ये भी साहब कोई क्या दिलेरी हुई.

जंग अब ये  अमीरी गरीबी की है,
जंग  अब  ये कहाँ तेरी मेरी हुई.

मौज़ूदा हालात के नाम डॉ. सुभाष भदौरिया .





रविवार, 14 फ़रवरी 2016

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,


ग़ज़ल

नींद रातों की मेरी,रोज़ उड़ाने वाले.
खो गये जाने कहाँ, दिल को लुभाने वाले.

कोई ई-मेल कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,
याद आते हैं बहुत हमको भुलाने वाले.

रूठ ले,रूठ ले, फिर मान भी जा अपनों से,
कहीं उठ जायें न दुनियां से मनाने वाले

सर्द रातों की चुभन , उस पे तमन्ना उसकी,
तू कभी भूल से आ दिल को सुहाने वाले.


ये अलग बात कलम हाथ कर दिये सबने,
तेरी तस्वीर कहाँ भूले ? बनाने वाले.

डॉ. सुभाष भदौरिया  गुजरात ता.  14- 02-2016


शनिवार, 23 जनवरी 2016

शर्म दिल्ली को आये भला किस तरह,

ग़ज़ल
शौक़ से आप ले लो ये गर्दन मेरी.
सर पर अर्जुन बिठाओ तुम्हें क्या पड़ी.
एकलव्यों से मत द्रोण से पूछिये .
चाल उसने फँसाने की क्या क्या चली.
रौशनी कुछ तो हो इन अँधेरों में अब,
मैंने खुद ही जला ली मेरी झोपड़ी .
चोट बाहर की होती तो सह लेते हम,
जान ले लेती है चोट ये भीतरी .
शर्म दिल्ली को आये भला किस तरह,
जिसने कुर्षी की ख़ातिर हया बेच दी.
चैन मर कर भी मुझको मिलेगा कहाँ,
रात दिन रोयेगी मेरी माँ बावरी.
डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.23-01-2016

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

तुझसे बिछुड़े अगर तो हम मर जायेंगे.


ग़ज़ल

तुझसे बिछुड़े अगर हम तो मर जायेंगे.
ग़म की सारी हदों से गुज़र जायेंगे.

कैद से अपनी आज़ाद मत कर हमें,
परकटे ये परिन्दे किधर  जायेंगे .

आईना बन के तुम सामने आ गये,
देख कर अक्स  अपना संवर जायेंगे.

और भी अपनी बेताबियां बढ़ गयीं,
सबने सोचा था इक दिन सुधर जायेंगे.

आँधियों से कहो अपनी हद में रहें,
दूसरे होंगे उनसे जो डर जायेंगे.

मोतियों की जिन्हें चाह होगी वही,
वो समन्दर में गहरे उतर जायेंगे.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 22-01-2016


बुधवार, 23 दिसंबर 2015

दर्द सीने में फिर से उठा है.

   
ग़ज़ल

ये न पूछो कि फिर क्या हुआ है.
दर्द सीने में फिर से उठा है.

कोई कांटा हो तो हम निकालें,
फूल अपने कलेजे चुभा है.

हर जगह ये तुझे ढूंढ़ता है ,
मेरा दिल भी हुआ बावरा है.

जी लिया मैं बहुत दिन तेरे बिन,
मौत का ही बस इक आसरा है.

उसकी तस्वीर ही अब दिखादो,
मरते दम बस यही इल्तिजा है.

जिसकी मर्ज़ी हो उसको वो पूजे,
अपना महबूब ही बस ख़ुदा है.


तीर तलवार से  ना कटा जो,
सर मुहब्बत से वो कट गया है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 23-12-2015

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.


ग़ज़ल

मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरुबा .
तेरे इश्क में, तेरी चाह में, मेरे दिल तो हो गया बावरा.

मेरे सारे पात हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया,
तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.

तुझे ये गुमां की मैं बहुत खुश, तुझे ये गिला कि भुला दिया,
तेरी है तलब मुझे आज भी, तुझे क्या ख़बर तुझे क्या पता.

अभी झूट का बड़ा शोर है, अभी झूट का बड़ा  ज़ोर है.
अभी आईना है निशान पे, अभी सच बहुत है डरा डरा.

मेरे हाथ भी हैं क़लम हुए, मेरी काट दी है ज़बां मगर,
मेरा सर अभी भी तना हुआ, वो तो कह रहा है झुका झुका.

अभी ज़िन्दा हूँ तो कदर नहीं, मुझे ढूंढता रह जायेगा,
कभी खो गया जो मैं भीड़ में, कभी हो गया जो मैं लापता.
  
आज अपने जन्म दिन पर चाहने वालों के नाम  
डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.05-12-2015



शनिवार, 7 नवंबर 2015


ग़ज़ल
गर्दन भी उतारी जाती है, और हाथ कटाये जाते हैं.
ख़ामोश रहें कुछ न बोलें, गूंगे भी बनाये जाते हैं.

बेचे हैं वतन को कौन यहां ? हिम्मत हो  ज़रा तो सच बोलो.
इल्ज़ाम मुसल्मां पर ही क्यों हर वक्त लगाये जाते हैं.

वो कौन जला है गलियों में ? वो कौन मरा है सड़कों पे ?
हम जैसे दिवाने जाने क्योंअश्कों को बहाये जाते हैं.

हम ईद पे जाते थे , मिलने  होली वो मनाने आते थे,
अब खूँन बहा इक दूजे का, त्यौहार मनाये जाते हैं.

ख़ामोश वो रहकर करता है क़ातिल की रहनुमाई अक्सर,
 आईना दिखाये जो उनको  गद्दार बताये जाते हैं.

फिर नंद तो क्या उसके वंशज मिट जाते है इतिहासों से ,
चाणक्य  के वंशज पर जब जब हथियार उठाये जाते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 06-11-2015