शनिवार, 23 जनवरी 2016

शर्म दिल्ली को आये भला किस तरह,

ग़ज़ल
शौक़ से आप ले लो ये गर्दन मेरी.
सर पर अर्जुन बिठाओ तुम्हें क्या पड़ी.
एकलव्यों से मत द्रोण से पूछिये .
चाल उसने फँसाने की क्या क्या चली.
रौशनी कुछ तो हो इन अँधेरों में अब,
मैंने खुद ही जला ली मेरी झोपड़ी .
चोट बाहर की होती तो सह लेते हम,
जान ले लेती है चोट ये भीतरी .
शर्म दिल्ली को आये भला किस तरह,
जिसने कुर्षी की ख़ातिर हया बेच दी.
चैन मर कर भी मुझको मिलेगा कहाँ,
रात दिन रोयेगी मेरी माँ बावरी.
डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.23-01-2016

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

तुझसे बिछुड़े अगर तो हम मर जायेंगे.


ग़ज़ल

तुझसे बिछुड़े अगर हम तो मर जायेंगे.
ग़म की सारी हदों से गुज़र जायेंगे.

कैद से अपनी आज़ाद मत कर हमें,
परकटे ये परिन्दे किधर  जायेंगे .

आईना बन के तुम सामने आ गये,
देख कर अक्स  अपना संवर जायेंगे.

और भी अपनी बेताबियां बढ़ गयीं,
सबने सोचा था इक दिन सुधर जायेंगे.

आँधियों से कहो अपनी हद में रहें,
दूसरे होंगे उनसे जो डर जायेंगे.

मोतियों की जिन्हें चाह होगी वही,
वो समन्दर में गहरे उतर जायेंगे.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 22-01-2016


बुधवार, 23 दिसंबर 2015

दर्द सीने में फिर से उठा है.

   
ग़ज़ल

ये न पूछो कि फिर क्या हुआ है.
दर्द सीने में फिर से उठा है.

कोई कांटा हो तो हम निकालें,
फूल अपने कलेजे चुभा है.

हर जगह ये तुझे ढूंढ़ता है ,
मेरा दिल भी हुआ बावरा है.

जी लिया मैं बहुत दिन तेरे बिन,
मौत का ही बस इक आसरा है.

उसकी तस्वीर ही अब दिखादो,
मरते दम बस यही इल्तिजा है.

जिसकी मर्ज़ी हो उसको वो पूजे,
अपना महबूब ही बस ख़ुदा है.


तीर तलवार से  ना कटा जो,
सर मुहब्बत से वो कट गया है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 23-12-2015

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.


ग़ज़ल

मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरुबा .
तेरे इश्क में, तेरी चाह में, मेरे दिल तो हो गया बावरा.

मेरे सारे पात हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया,
तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.

तुझे ये गुमां की मैं बहुत खुश, तुझे ये गिला कि भुला दिया,
तेरी है तलब मुझे आज भी, तुझे क्या ख़बर तुझे क्या पता.

अभी झूट का बड़ा शोर है, अभी झूट का बड़ा  ज़ोर है.
अभी आईना है निशान पे, अभी सच बहुत है डरा डरा.

मेरे हाथ भी हैं क़लम हुए, मेरी काट दी है ज़बां मगर,
मेरा सर अभी भी तना हुआ, वो तो कह रहा है झुका झुका.

अभी ज़िन्दा हूँ तो कदर नहीं, मुझे ढूंढता रह जायेगा,
कभी खो गया जो मैं भीड़ में, कभी हो गया जो मैं लापता.
  
आज अपने जन्म दिन पर चाहने वालों के नाम  
डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.05-12-2015



शनिवार, 7 नवंबर 2015


ग़ज़ल
गर्दन भी उतारी जाती है, और हाथ कटाये जाते हैं.
ख़ामोश रहें कुछ न बोलें, गूंगे भी बनाये जाते हैं.

बेचे हैं वतन को कौन यहां ? हिम्मत हो  ज़रा तो सच बोलो.
इल्ज़ाम मुसल्मां पर ही क्यों हर वक्त लगाये जाते हैं.

वो कौन जला है गलियों में ? वो कौन मरा है सड़कों पे ?
हम जैसे दिवाने जाने क्योंअश्कों को बहाये जाते हैं.

हम ईद पे जाते थे , मिलने  होली वो मनाने आते थे,
अब खूँन बहा इक दूजे का, त्यौहार मनाये जाते हैं.

ख़ामोश वो रहकर करता है क़ातिल की रहनुमाई अक्सर,
 आईना दिखाये जो उनको  गद्दार बताये जाते हैं.

फिर नंद तो क्या उसके वंशज मिट जाते है इतिहासों से ,
चाणक्य  के वंशज पर जब जब हथियार उठाये जाते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 06-11-2015





मंगलवार, 15 सितंबर 2015

बेटा विकास अब तुम घर लौट के आ जाओ.



ग़ज़ल
बेटा विकास अब तुम घर लौट के आ जाओ.
पापा का और चाचा का दिल ना यूँ दुखाओ. (बेटा विकास.
अम्मा तुम्हारी तरसे हैं दाल प्याज को अब,
चूना ना सभी मिलकर अब देश को लगाओ.( बेटा विकास

मौसी ने कर दिया है शिक्षा का गर्क बेड़ा,
गुरुओं को फिक्स वेतन ऐसे तो न दिलवाओ.(बेटा विकास 

फूफा तुम्हारे बोर्डर की कुछ तो ख़बर लें अब,
हर रोज़ जवानों को इस तरह ना मरवाओ.(बेटा विकास 

बातों की जलेबी हैं  वो  काला धन कहाँ है ?
मामा शकुनि से हम को इस तरह ना तलवाओ.(बेटा विकास  

हक मांगने निकले थे अपना जो हुकूमत से,
सरदार के वंशज को घर घुस के ना पिटवाओ.(बेटा   

पहले भी जला था ये, अब फिर से जला है ये,
अब और ज़्यादा तुम गुजरात ना जलवाओ.(बेटा विकास 


गुजरात के विकास की जमीनी हक़ीक़त उस समय सामने आ गयी  जब लाखों की तादाद में राज्य के सशक्त मानी जानी वाली कोम पाटीदार पटेल युवान, युवती, महिलायें बुजुर्ग ओ,बी,सी, कोटा में शामिल किये जाने की मांग को लेकर सड़कों पर आये. महीनों के आंदोलन की नब्ज़ परखने में नाकाम हुकूमत के कारण गुजरात जला. जो लोग गुजराती है और और गुजरात से प्यार करते हैं उन्हें भंयकर पीड़ा हुई होगी मेरी ही तरह. जो भी जानी माली नुकशान हुआ वो गुजरात का ही हुआ जिसमें पेड़ भी अपने थे और आँधिया भी अपनी थीं.
गुजरात में ये सब होना आकस्मिक नहीं है गुजरात में सरकारी नौकरियों में पांच वर्ष तक फिक्स वेतन की नीति और भर्ती प्रक्रिया में विलंब और धांधली के कारण उच्च शिक्षा की तकनीकी और गैर तकनीकी कोलेजों में हजारों की नियमित भर्ती का अभाव करार आधारित और फिक्स सेलरी से गाडी खीचनें के कारण पूरे राज्य मे युवकों, युवतियों, माताओं बहिनों, बुजर्गों का आक्रोश स्वाभाविक है. हां पर इस पर्वत के समान पीड़ा का पाटीदार आंदोलन के रूप में फूट पडना गुजरात के भावी परिवर्तन का संकेत है.

 गुजरात में विकास नहीं हुआ ऐसा नहीं है भौतिक विकास हुआ है नई सरकारी कोलेजों की करोड़ों की बिल्डिगें बनी पर उनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों की जगह खाली हैं. जो है भी वे फिक्स सेलरी पर मज्बूरी के कारण अभी २५००० में अध्यापक कार्यरत हैं जब कि गुजरात में ही दीव दमन की केन्द्र शासित सरकारी कोलेजों में अध्यापक को पूरी सेलरी ४३००० दी जा रही है. इस रहष्य का पता तब हमें चला जब पिछले साल हमारी सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा के दो  फिक्स सेलरी १६,५०० के हिन्दी के अध्यापक दीव और दमन में फुल सेलरी ४३००० मे हिजरत कर गये.

गुजरात में हर विभाग में फिक्स ५ वर्ष की सेलरी की नीति का उस समय मुझे तब गहरा अहसास हुआ जब गुजरात नेशनल लॉ युनिवर्सिटी से ग्रेज्युट बेटा एस.बी.ट्राविनकोर बेंक में पी.ओ. की परीक्षा पास कर केरला राज्य में नौकरी जोइन करने को मज़्बूर हो गया.
गुजरात प्रशासनिक सेवा वर्ग-१ प्रथम परीक्षा उसने अभी पास की पर मैंनें उसे केरला बेंक रहने की सलाह दी गुजरात में अब कोई भविष्य नहीं है और गुजरात जाहेर सेवा आयोंग पहले तो भर्ती नहीं होती और होती भी है तो वर्षों तक विलंब की प्रक्रिया और इसी बीच गुजरात हाई कोर्ट में किसी धाँधली की अपील फिर सब स्टोप. 

इंजीनियरिंग कोलेज सरकारी कोलेज, अनुदानित कोलेज सभी के अधिकारी गण महीने में आधे से ज्यादा दिन गुजरात हाईकोर्ट में ही शोभा भड़ाते है खासकर उच्चशिक्षा कमिश्नर कचेहरी के किसी अधिकारी को कोई समस्या बताने जाओ या फोन पर कहो तो साहब कोर्ट में हैं का आलम रहता है.

गजरात उच्चशिक्षा विभाग में मेरा जोइन डायरेक्टर के पद १ वर्ष रहना हुआ है उसमें ६ महीने इंचार्ज ६ महीने रेग्युलर उस दर्मयान गुजरात के तत्कालीन शिक्षा सचिव अडिया साहब जो अभी केन्द्र की शोभा बढा रहे हैं और तस्वीर में वित्त मंत्री जेटली जी को जलेबी तलवाते देख मुग्ध हो रहे हैं  मैने उन्हें उस समय बताया था कि गुजरात राज्य में पीएच. डी. करने वाले अध्यापकों के इंक्रीमेंट वापस लेना ठीक नहीं हैं अन्य राज्यों में अन्य विभागों के पीएच.डी. करने अधिकारी कर्मचारियों को भी प्रोत्साहित करने के लिए इंक्रीमेंट दिये जाते हैं फिर उच्चशिक्षा में तो शोध कार्य. ज़रूरी माना जाता है. 

 अभी गुजरात राज्य के हजारों नियमित सरकारी एवं अनुदानित कोलेजों के अध्यापकों के अभी भी ७००० से ८००० ग्रेड पे रुके हुए हैं. सिलेकशन ग्रेड ड्यु हैं.
 सबसे दुखद बात तो यह है कि  गुजरात की सरकारी कोलेजों में अंग्रेजी विज्ञान जैसे विषयों के नेट स्लेट अध्यापक  उपलब्ध न होने और फिक्स सेलरी पर काम न करने के कारण हजारों की तादाद में विद्यार्थियों की शिक्षा का नुकशान हो रहा है.
 हमारी सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा में ७ साल से अंग्रेजी का  नियमित अध्यापक नहीं विजीटिग मात्र ५००० में सभी क्लासों में पढाने का काम कर रहे हैं
. २००१ में सरकारी कोलेजों के विजीटिंग अध्यापक प्रति लेक्चर १०० रुपये का परिपत्रथा और कुल ५० लेक्चर की मर्यादा में कुल राशि ५००० की थी. गुजरात उच्चशिक्षा विभाग ने २०१४  आदेश में  एक लेक्चर के १०० रुपये की जगह २५० रुपये किये पर कुल राशि की मर्यादा ५००० ही रखी. ५००० की मर्यादा में मात्र २० लेक्चर ही दिये जा सकते है जब कि वर्क लोड प्रति सप्ताह एक अध्यापक का १८ से ज्यादा का रहता है.
हमारी सरकारी कोलेज में  आउट सोर्सिंग स्वीपर सफाई कर्मचारी की तनखाह ६३०० है जब कि विजीटिगं  अध्यापक की मात्र ५००० रुपये.  ना शर्मआती है न लाज फिर वी गायें जय जय गरवी गुजरात.
 उच्च शिक्षा कमिश्नर के साथ गुजरात शिक्षा विभाग के सलाहकार (पूर्व कुलपति गुजरात युनिवर्सिटी) श्री ए.युय पटेल साहब को विजी़टिंग अध्यापकों और हमने कहा था कि सर विजी़टिंग अध्यापकों की तनखाह बढवादो उन्होंने कहा था कि फाइल मुख्यमंत्रीजी के पास पड़ी है. पर अभी तक कुछ नहीं हुआ.

 जिस राज्य में सफाई कर्मचारी की तनखाह शिक्षक से ज्यादा हो वो रोल मोडल बताया गाया जाता हो वहां हार्दिक जैसे तूफान  आँधी का आना आकस्मिक नहीं है. आग अगर झोपडी में लगी है तो महलों तक भी जायेगी और आग की आँख में बराबर फूस का घर भी राजधानी भी. गुजरात और देश के हुक्मरान इसे समझें तो बेहतर है. सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ.

और हाँ अब तो दाल (१५०) और मुर्गी की भाव और प्याज और सेव का भाव १०० रुपया हो गया हो तो अँधेर नगरी चौपट राजा सवासेर भाजी सवासेर खाजा की कथा सार्थक होती दिखाई दे रही है. देश का हर सुधीजन सोचने को मज़्बूर है क्या से क्या हो गया बेवफ़ा तेरे प्यार में. जैसे सांपनाथ वैसे नागनाथ हमारी किस्मत में सिर्फ डसवाना ही लिखा है क्या हे राम  हे राम-----

गुजरात के नवयुवक अब सेना में भर्ती के लिए आकर्षित हुए पुलिस में फिक्स सेलरी में क्या करें. हमारी सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा के विद्यार्थी बीच में ही कोलेज छोड फौज में भर्ती हो गये. हमारी एन.सी.सी. तीन साल से मांग के बाद एन.सी.सी. गुजरात निदेशालय से नही मिली. गोधरा बटालियन में फाइल अटकी पड़ी है. एन.सी.सी. युनिटें अगर सरकारी कोलेजों में दी जायें तो युवकों को सेना में जाने के लिए ट्रेनिग के साथ प्रोत्साहित किया जा सकता है. सीमावर्ती प्रदेश होने के बावज़ूद गुजरात की अब तक कोई अपनी रेजीमेंट नहीं है. क्या अच्छा हो कि गुजरात के पाटीदारों की अपनी सेना में रेजिमेंट हो वो सड़कों पर ही नहीं बोर्डर पर भी अपनी शिनाख़्त दे.केबिनेट की रेजीमेंट तो काम आयी नहीं हे राम अपने हुए पराये घर को ही आग लग गई घर के चिराग से.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. तारीख १५-०९-२०१५
                                                                        

रविवार, 31 मई 2015

तुम भूल कर कभी भी, न किसी से प्यार करना.

ग़ज़ल

तुम भूल कर कभी भी, न किसी से प्यार करना.
यूँ ही चुपके-चुपके रोना, यूँ ही इंतज़ार करना.


दिल भूलता नहीं है , मिलना वो बिछुड़ जाना,
इक बात के लिए वो बातें हजार करना.


कभी खुद ही रूठ जाना, कभी खुद ही मान जाना,
कभी पास आ लिपटना, कभी बेकरार करना.


मुझे मौत भी हँसी है तू जो साथ क्या कमी है,
मेरी मुश्किलों के साथी मेरा एतबार करना,

ये तो पहले भी हुआ है ये तो बाद में भी होगा,
दुनियां का दो दिलों को यूँ ही संगसार करना.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात.ता.३१-०५-२०१५








शनिवार, 2 मई 2015

गुजरात में हिन्दी पर छुरियां जो चलाते हैं.






ग़ज़ल
हिन्दी का कतल कर के त्यौहार मनाते हैं.
इस दौर के हाकिम अब आँखों ना सुहाते हैं.

संसद में तो हिन्दी के वे गीत तो गाते हैं.
गुजरात में हिन्दी पर छुरियां जो चलाते हैं.

कहने को वो हिन्दी की रोटी को जो खाते हैं,,
दड़बे में वो पेंशन की अब ख़ैर मनाते हैं.

मुज़रिम हैं सभी मुज़रिम देखें है तमाशा जो,
है राष्ट्र की जो भाषा उसको लतियाते हैं,

घर फूँक के हमने तो गाया है कबीरा को,
ज़ालिम  को सदा हम तो आईना दिखाते हैं,

होते हैं ज़ुलम जब जब  मज़्बूर व मुफ़लिस पर,
 भूकंप सुनामी सब ऐसे नहीं आते हैं.

गुजरात की ग्रांटिड कॉलेजों से हिन्दी गायब. वर्ष २०१५-२०१६ की राज्य की सभी अनुदानित कॉलेजों की भर्ती प्रक्रिया में 496 अध्यापकों की पदों की भर्ती में एक भी पद हिन्दी के अध्यापकों का रिक्त नहीं हैं, मोदीजी मुख्यमंत्री के १० वर्ष के स्वर्णिम काल में पहले कक्षा १० और कक्षा १२ से हिन्दी को हटाया गया तो फिर ये कॉलेजों में छात्र- छात्रायें कक्षा ९ के बाद कॉलेजों में हिन्दी क्यों पढ़े परिणाम स्वरूप जो होना था हो के रहा. खुद मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र की सरकारी कॉलेज में से हिन्दी गायब कर दी गयी थी. अब सब हिन्दी के पढे पीएच.डी. छात्र छात्रायें रो रहे हैं हमारा क्या होगा. गुरुओं ने हिन्दी पढ़ा के अपना तो घर भरा हमें अनाथ कर दिया. देखने वाली वात ये है कि गुजरात में महात्मा गांधी ने तो हिन्दी को महत्व दिया ही था उससे पूर्व कच्छ के महाराजा ने मध्यकाल में कच्छ में ब्रजभाषा की पाठशाला खोली थी. हमारी शिक्षा भी हिन्दी में पीएच.डी तक गुजरात में ही हुई. आज हिन्दी को गुजरात से क्यों गायब किया गया एक सवाल है. गुजरात में धडाधड अंग्रेजी की लेब खोली गयीं क्यों कंप्यूटर बिके फिर भी आप अध्यापकों में सबसे ज्यादा १२१ जगह खाली हैं अंग्रेजी के नेट स्लेट अध्यापक नहीं मिल रहे. देश के प्रधान मंत्री खुद संसद में हिन्दी में भाषण देते हैं. हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा है फिर उसकी गुजरात में हत्या क्यों हुई. हिन्दी के गुजरात में हुई हत्या पर सभी गुजरात के देश प्रेमी शोक मनायें. अब हिन्दी पढ़ने पढाने वालों को कहीं और आशियाना ढूँढना पड़ेगा. चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना. .उपरोक्त  ग़ज़ल इसी हादसे पर है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख- 02-05-2015



सोमवार, 13 अप्रैल 2015

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.

ग़ज़ल

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.
मानजा, मानजा, जगहँसाई न कर.

तोड़़ दे मेरे दिल को कोई ग़म नहीं,
दुश्मनों से तो यूँ दिल मिलाई न कर.

और भी दाग़ लग जायें दामन तेरे,
रात-दिन और ज़्यादा सफ़ाई न कर.

खेत खलिहान की कुछ ख़बर ले ज़रा,
आसमानों में अब यूँ उड़ाई न कर.

ख़ूँन सरहद पे  बहता ज़रा रोक अब,
और ज़ख़्मों की ज़्यादा खुदाई न कर.

फासले रख भले चाहने वालों से,
गैर के तू यहां आवा-जाई न कर.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.१३-०४-२०१५





शनिवार, 4 अप्रैल 2015

तेरी ख़ुश्बू को इसमें ढूंढ़ते हैं. मेरे साथी मोबाइल सूँघते हैं.

ग़ज़ल
तेरी ख़ुश्बू को इसमें ढूंढ़ते हैं.
मेरे साथी मोबाइल सूँघते हैं.

मैं डीलिट यूँ तो कर देता हूँ सब कुछ,
मगर आँसू कहां ये सूखते हैं ?

तुम्हीं कह दो कहूँ, क्या उनसे अब मैं,
तेरे बारे में अब सब पूछते हैं.

ज़रा सी बात पे रूठे हो तुम तो,
कहीं अपनों से ऐसे रूठते हैं.

गिरे हैं टूटकर शाखों से पत्ते,
चले आओ कि हम भी टूटते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.04-04-2015