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सोमवार, 5 मार्च 2012

खा के ठोकर वो समझेगा शायद.


ग़ज़ल

खा के ठोकर वो समझेगा शायद.
मुझको खोकर वो समझेगा शायद.

बात हँसकर के जो नहीं समझा,
बात रोकर वो समझेगा शायद.

काग़ज़ी कश्ती पे रक्खे है यकीं,
सब डुबोकर वो समझेगा शायद.

दूरियों के पहाड़ इक बिस्तर,
साथ सोकर वो समझेगा शायद.

है बबूलों से आम की ख़्वाहिश,
बीज बोकर वो समझेगा शायद.

क्यों लहू रिसता है लफ़्ज़ो से मेरे ?
दिल चुभोकर वो समझेगा शायद.

कत्ल के आँखों से मिटते न निशा,
हाथ धोकर वो समझेगा शायद.

डॉ. सुभाष भदौरिया.

बृहस्पतिवार, 9 फरवरी 2012

सरकार हमारे नाड़े में.

ग़ज़ल
तुम रोते ही रहना हर दम खटिया को पकड़कर जाड़े में.
चहुँ तरफा राज़ हमारा है, सरकार हमारे नाड़े में.

मंत्री, अफ़्सर, हीरो, जोकर, सब टपकाते हैं लार इधर,
छिप छिप कर खेलें खेल सभी, ऐसा जादू अगवाड़े में.
(सरकार हमारे नाड़े में)

योगी, भोगी, ढोंगी, लोभी, हमसे वे जीत सके न कभी,
चारों खाने चित हो जायें, लड़ने जो आयें अखाड़े में
 (सरकार हमारे नाड़े में)

अधरों से पिलायें हम मदिरा, हाथों में सौपें स्वर्ण कलश,
रफ़्ता रफ़्ता जन्नत का सफ़र हम करवाते अँधियाड़े में.
(सरकार हमारे नाड़े में)

ज़िन्दा जलवायें लाख हमें, मिट्टी में मिलायें लाख हमें,
हम राख से उभरेंगें हर दम मारेंगे लात पिछाड़े में.
(सरकार हमारे नाड़े में)

 प्रिंसीपल डॉ. सुभाष भदौरिया.

कल रात में सर्दी के और टेंशन के मारे सो न सका.गुजरात के उच्च शिक्षा विभाग की साज़िशों ने हमें हमारी इकलौती पत्नी से १९० किमी.दूर प्रिंसीपल के प्रमोशन के नाम पर तीन साल से ऐसी जगह पटका जहाँ खाने के लाले पड़ गये.एन.सी.सी.के कारण अहमदाबाद की सरकारी कोलेज का चार्ज शिक्षा सचिव ने ६ महीने से शिक्षा कमिश्नर से दिलवाया पर,शिक्षा कमिश्नर कचेहरी की षडयंत्र मंडली ने साजिश से एन.सी.डिप्टी डॉयरेक्टर गुजरात पर दबाव डाल कर एन.सी.सी. का चार्ज देने से मना करवा दिया. साथ में एन.सी.सी,के केप्टन रेंक को ख़त्म करने की तुरंत कार्यवाही करने का फ़र्मान भी दिलवा दिया.

इस साज़िश के पीछे कौन है इस के बारे में सोचते सोचते आँख लगी ही थी कि रात के अंतिम पहर में अचानक राजस्थान की बहुचर्चित भँवरी देवी सपने में आ गयी उससे जो बातचीत हुई उसी के आधार पर ये ग़ज़ल लिखी है. बातचीत के अंश इस प्रकार रहे.

मैंने ज्यों ही सपने में भँवरी देवी को घर पर देखा को देखा तो तपाक से कहाँ भँवरी जी आप मुझ ख़ानाखराब के यहाँ कैसे ?

वो बोली उज़डे लोगों में ढूँढ़ वफ़ा के मोती ये खज़ाने तुझे बेहतर है खराबों में मिले. मैं ख़ाना खराब के यहाँ जानकर आयी हूँ पर तुमने मुझे पहिचाना कैसे?

कह कर ठहाका मारकर हँस पड़ी मैनें कहा ग़रीब ने आपके बारें में इंटरनेट पर बहुत कुछ पढ़ा देखा है.

मैंने कहा पानी ही है घर पर पियोगी .

वो हँस पड़ी मैं पानी नहीं पीती.

तुम एन.सी.सी. में मिलेट्री अफ़्सरों के साथ रहे हो मेरा मतलब नहीं समझें.

मैनें कहा समझता तो हूँ पर इन दिनों प्रिंसीपली की ड्यूटी कर रहा हूँ. एन,सी,सी, तो ज़ालिमों ने छीन कर दूर दराज गाँव में फेंक दिया जहां एन.सी.सी.की कोई युनिट नहीं.युनिफोर्म छिन जाने का का ग़म बर्दास्त नहीं होता भंवरीजी.
मैंने गुजरात सरकार के शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव सबके पास प्रार्थना पत्र दिये ६ महीने से ट्रांसफर की फाइल मुख्यमंत्रीजी तक पहुँचने ही नहीं पायी क्या करूँ. क्लास वन अधिकारी होने के कारण ट्रांसफर फाइल मंजूरी के लिए मुख्यमंत्री जी के पास जाती है उनके दस्तख़तके बाद ही मोक्ष होता है.शिक्षा सचिव अडिया साहब के सचिवालय से फाइल ६महीने से आगे बढ़ी  ही नहीं. इसी बीच हमारे दुश्मनों ने  एन.सी.सी.को स्वाहा कर दिया. एक मात्र रास्ता गुजरात उच्च न्यायालय बचा है.

भँवरी ने कहा हर सरकार नाड़े में है भदौरियाजी.

राजस्थान की सरकार को तो तुम जानते हो न ? मैनें कहा हाँ नाड़ा मंत्री ने तुम्हें ठिकाने लगाया और बाद में तुमने उसे.

पर हमारी गुजरात की सरकार ऐसी नहीं है हमारे मुख्यमंत्री तो योगी हैं.

भँवरी जोर से ठहाका लगाकर हँस पड़ी.

वे योगी हैं पर दूसरे नहीं न.गुजरात उच्चशिक्षा विभाग को नहीं जानते.

तुम्हारे गुजरात की सरकारी कोलेजों में बड़े शहरों अहमदाबाद गाँधीनगर में प्रिंसीपल के पद पर कौन हैं महिलायें तुम्हारे जैसों  को क्यों दूरदराज़ रगेड़ा जाता हैं.. क्यों सरकारी अध्यापकों के ही ट्रांसफर किये जाते हैं.

क्यों किसी सरकारी अध्यापिका के अहमदाबाद और गाँधीनगर से १० साल से गुजरात में टाँसफर नहीं हुए.

मैनें भँवरी देवी से पूछा ये तुम्हें कैसे मालूम वो बोली मैं तु्म्हारा ब्लाग पढ़ती हूँ. ग़ज़लों के साथ तुम गुजरात उच्च शिक्षा कमिश्नर कचेहरी की लीला भी तो लिखते हो तुम्हारी कमिश्नर मैडम तुमसे इसी लिए नाराज़ रहती हैं.

मैंने कहा भँवरीजी क्या करूँ.उच्च शिक्षा कमिश्नर कचेहरी में चापूलूसों की भीड़ है वे ही हमारे खिलाफ कान भरते रहते हैं.

पर मैंने कहा भँवरीजी आप मेरे सपने मैं क्यों आयीं.

वो बोली मैं तुम्हें समझाने आयी हूँ कि हर सरकार नाड़े में है.

चाहे राजस्थान की हो या दिल्ली या दक्षिण की नाड़ा लीला सब जगह है.

पर मैं तुम्हारे पास इसलिये आयी हूँ कि तुम अपने गुजरात के मुख्य मंत्री से कहो कि वे मेरी मदद करें. उनके घोर विरोधी पक्ष के सभी नाड़े में हैं वे अपने गुफ्तचरों को उस काम में लगायें. मेरी मिट्टी खराब हो रही है मुझे ढुँढ़वाने में मदद करें.

मैने कहा वे मेरी नहीं सुनते मेरे इष्ट देव हनुमानजी और इष्टनेता गुजरात के मुख्यमंत्री ही हैं पर वे दोनों फेमेली प्राब्लम नहीं समझते. सो मैंने उन्हें फरियाद करना ही बंद कर दिया. जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिए.पर एन.सी.सी छिनवाके उच्चशिक्षा कमिश्नर कचेहरी ने अच्छा नहीं किया.शिक्षा सचिव अडिया साहब की नहीं चलती पर मुख्य मंत्रीजी तो हमारे साथ हो रहे अन्याय की जाँच करवा सकते हैं.

मैने कहा भँवरीजी तुम क्यों हमारे गुजरात के मुख्यमंत्री के सपने में जा कर उन्हें मदद करने को नहीं कहती वे तुम्हारी सुनेंगे.

भँवरी बोली न बाबा न तुम्हारे मुख्यमंत्रीजी की सिक्युरिटी कितनी सख़्त है तुम जानते हो. मैं नहीं जा सकती. वे ठहरे योगी सिक्युरिटी से बच भी गयी तो उनके श्राप से बचना मुश्किल.

फिर वो धीरे से शर्माते हुए बोली मैं उन्हें पसन्द करती हूँ गुजरात का विकास उन्होंने किया है तुम राजस्थान आये तो तुमने रास्ते तुमने देखे थे.

मैने कहा वो तो है. गुजरात का विकास तो अँधो को भी दिखाई देता है.

मैंने कहा भँवरीजी जब सभी सरकारें नाडें में हैं उनके अफ़्सर नाड़े में हैं तो क्या हमें भी नाड़ा बोम्ब का निर्माण करना होगा.

वो बोली हाँ जैसे लोहा लोहे को काटता है उसी तरह नाड़ा नाड़े को मारता है. ये मंत्र तुम याद कर लो.

अचानक वह दर्द से कराह उठी मैनें कहां बहुत दर्द हो रहा है वो बोली हाँ ज़ालिमों ने बहुत कष्ट दिये मर कर भी रूह को चैन नहीं मिल रहा. केन्द्र की सरकार उन्हीं की है वे सब लीपा पोती कर देंगे. मैं अपने पढ़ोसी से बड़ी उम्मीद ले कर आयी हूँ गुजरात राजस्थान का पढ़ोसी है इस दृष्टि से मेरे भौगोलिक ही नहीं सांसकृतिक दृष्टि से भी नाता है. तुम नरेन्द्रभाई से कहो मैने कहा नरेन्द्रभाई वो बोली हाँ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई के नाम से ही गुजरात में जाने जाते है गुजरात के बाहर भले वे मोदी की नाम से विख्यात हों.

अंत में भँवरी बोली मैं गुजरात से मदद भी मांगती हूँ और आगाह भी करती हूँ अन्य सरकारों की तरह गुजरात सरकार नाड़े से बचे.

नाड़ा बोम्ब अणुबोम्ब से ज़्यादा ख़तरनाक है. ये ख़तरनाक हथियार आंतकियों के हाथ आ गया तो वे नाड़े में बोम्ब की जगह छिपा कैमरा लगा कर सब कुछ तहस नहस कर देंगे.

फिर गुजरात में बोम्ब विस्फोट की जगह नाड़ा विस्फोट होंगे.

मैने कहा भंवरीजी ऐसी बददुआयें मत दीजिये मेरे गुजरात को.
मैं परेशान तो हूँ पर गुजरात का हमेशा भला चाहता हूँ.

अचानक सुब्ह के गीत मेरे लाड़लो जागो का रिकोर्ड बजने लगा. वो बोली बातों बातों में सुब्ह हो गयी. अच्छा जाती हूँ भदौरियाजी.

फिर हँस कर बोली तुम सब पर ग़जलें लिखते हो मुझ पर लिख कर बताओ तो जानूँ.

ये ग़ज़ल आदरणीया भँवरीजी के नाम पूरे आदर के साथ नाम है जो मेरे सपनों में आयी. जिसके जिस्मकी तलाश तो सी.बी.आई. कर रही है पर उसकी रूह से जो हमारी बातचीत हुई वह पाठकों की नज़र है.
डॉ.सुभाष भदौरिया प्रिंसीपल सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा.
ता. ०९-०२-२०१२

















शनिवार, 14 जनवरी 2012

सार्वजनिक अनुशासन विचार से लेकर अमल तक. डॉ.राजीव कुमार गुप्ता.


 
















डॉ.राजीव कुमार गुप्ता.
सार्वजनिक अनुशासन विचार से अमल तक.डॉ.राजीव कुमार गुप्ता.
तारीख 21 दिसम्बर 2011 बुधवार शाम 5.45 अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसियेसन के सभागार में गुजरात के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी(I.A.S)  डॉ.राजीव गुप्ता साहब की पुस्तक सार्वजनिक अनुशासन विचार से अमल तक का विमोचन राज्य के मुख्य मंत्री श्री नरेन्द्रमोदीजी के वरद्हस्तों से हुआ. इस कार्यक्रम में पूर्व शिक्षा आयुक्त डॉ.राजीव गुप्ता ने अपनी पुरानी शिक्षा विभाग की  जिस टीम को सभा हाल से लेकर बाहर तक सुचारू संयोजन का दायित्व सोंपा था उसमें हम भी एक थे. सभा हाल तो शाम 5.30 को  ही खचाखच भर गया तो हम लोग अन्य दूसरे हाल जहाँ प्रसारित कार्यक्रम की  व्यवस्था थी वहां पर आने वाले महमानों को भेजने लगे तो वहां भी कोई सीट खाली न रही लोग खड़े थे. एक पुस्तक विमोचन के समारोह में शहर के सभ्रान्त नगर जनों का भारी संख्या में आना आश्चर्यजनक  तो था ही साथ ही राजनैतिक महाशक्ति के रूप में मुख्य मंत्री नरेन्द्रमोदीजी और प्रशासनिक महाशक्ति डॉ.राजीव गुप्ताजी के व्यक्तित्व का जादू ही था जो लोगों को दूरदराज़ से खींच कर सभागार में ले आया था.
राज्य के मुख्य मंत्रीश्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने अनेक अभियानों में  पढ़े गुजरात जो वांचे गुजरात के नाम से जाना जाता है उसने  राज्य के आमोख़ास के जहन में काफी बदलाव दर्ज किये हैं. मुख्य मंत्रीजी का राज्य की जनता से चुटकी लेते अनेक बार किया गया अनुरोध पढ़ो गुजरातियो पढ़ो वह फिर मेरी निंदा ही क्यों न हो अगली सदी ज्ञान की सदी है याद रखो. बच्चे चाकलेट की जगह पुस्तक मांगे,शादी विवाह में रिश्ते जब तय किये जायें तो लोग जमीन जायदाद की जगह घर में पुस्तकें कैसी और कितनी है को ध्यान में लें ये  परिवर्तन मैं प्रजा की सोच में चाहता हूँ.इसका असर रफ़्ता रफ़्ता अब गुजरात में देखने को मिल रहा है शिक्षा के क्षेत्रमें ही नहीं अन्य प्रसंगों में भी लोग अब फूल या साल उढ़ाने की जगह पुस्तक से  महेमानों का स्वागत करने लगे हैं.इसका हमने खुद भी अनुभव किया है. हमारी जो पुस्तकें लोग  पढ़ने के बहाने चाऊं कर गये थे वे अब किसी कार्यक्रम में प्रिंसीपल एवं बहैसियत मुख्य महेमानजाने पर  भेंट के रुप में लौटने लगी हैं.  अब कोई पहले की तरह फूल का गुलदस्ता देकर स्वागत नहीं करता प्राचीन परंपरा  अब गुजरात में टूट रही है.पुस्तकों के प्रति लोगों का रुझान अब गुजरात में बढ़ रहा है. लोगों का विशाल रूप में पुस्तक समारोह में आना इसी क्रांतिकारी परिवर्तन का का सूचक था.सभा हाल में राज्य के कुलपति महोदय से लेकर वरिष्ठ अध्यापक, लेखक,प्रबुद्ध नागरिकों का तांता लगा हुआ था. सभी स्थान ग्रहण कर चुके थे कई किनारे खड़े आतुरता से मुख्यमंत्री के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. 

मुख्य मंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी

अचानक मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदीजी के सुरक्षा दस्ते की हरकत स्नीफर डॉग ब्लेक केट राज्य के वरिष्ट पुलिस एंव प्रशासनिक अफ्सरों की सर्गर्मियां तेज होने लगीं तो ज्ञात हो गया कि राज्य के सुप्रिम कमान्डर निकट ही हैं.
किसी भी कार्यक्रम के अंतिम क्षणों तक किसी  आमोख़ास को ज्ञात नहीं होता के मुख्य मंत्रीजी किस मार्ग से मंच पर जायेंगे. वे सिंहावलोकन करते हुए थोड़े आगे बढ़,फिर रुक,फिर चारों तरफ मुआयना कर आगे बढ़ते हैं वे किस दिशा में किस तरफ चल देंगे साथ चलने वालों को भी ज्ञात नहीं होता. उनकी पुस्तक कन्वीनियंट एक्शन के कार्यक्रम में वे मुख्य टागौर हाल में सीधे न जाकर बाहर बैठे छात्र वर्ग एवं आम नागरिकों के पास चले आये थे. उस समय भी बाहर के  खास कर छात्रों के अनुशासन की ज़िम्मेदारी डॉ.राजीव सरने  हमें ही सौंपी थी आगाह भी किया भदौरिया ध्यान रखना.  विशिष्ट मार्ग से जब वे मंच पर पहुँचें तो मुख्य दरवाजे परतैनात सुरक्षा कर्मियों के साथ हमारी शिक्षा विभाग की टीम को भी राहत हुई.जिज्ञासा वश ऊपर के हाल में हमने प्रसारण खड़े खड़े ही देखा खास कर मुख्य मंत्रीजी कहते क्या हैं.
 मंच से सबसे पहले तो उन्होंनें अपनी व्यंग्य परिहास शैली से सभागार को संबोधित करते हुए कहा सार्वजनिक अनुशासन के कार्यक्रम में मुख्य मंत्री का विलंब से आना कारण जो भी हो पर सत्य ये है कि मैं देरी से आया इस लिए  आप सब से क्षमा चाहता हूँ. साथ मंचस्थ लेखक  भाई डा.राजीव गुप्ता एवं नवभारत साहित्य मंदिर के प्रकाशक को आश्वस्त करता हूँ के आप लोग पुस्तक के प्रचार  प्रसार की ज़रा भी चिंता न करें ये समाचार के कल के अखबार में मुख्य  पृष्ट पर होंगे.साथ ही  सभा हाल में गुजराती भाषा के व्यंग लेखक विनोद भट्टजी जो उपस्थित थे उन्हें इंगित करते हुए कहा कि उन्हें  अपने अखबारी कोलम में  सार्वजनिक अनुशासन के कार्यक्रम में मेरे विलंब से आने पर मशाला मिल गया वे भी उपयोग करें. लोग सभा हाल में ठहाका लगा कर हँस रहे थे मीडिया पर मुख्यमंत्रीजी के व्यंग्य का ऐसा असर हुआ कि पुस्तक के विमोचन के शुभ समाचार चित्रों सहित आये. पर अभी ब्लाग पर अंतर्राष्ट्रीय समाचार आने बाकी थे. हमें सरकारी कोलेज शहेरा और  गुजरात कोमर्स  कॉलेज अहमदाबाद का प्रिंसीपली का चार्ज होने से 190 किमी. आवागमन के कारण पढ़ने लिखने का वक्त कम ही मिल पाता है. सो समय पर कार्यक्रम की रिपोर्ट न करने पर अपने अंतर्राष्ट्रीय पाठक वर्ग को समय पर जानकारी न दे पाने का खेद है.
 सबसे पहले मुख्यमंत्री मोदीजी ने लेखक डॉ.राजीव कुमार गुप्ता को मातृभाषा हिन्दी होने पर भी गुजराती भाषा में ज़ाहेरशिश्त विचार थी अमल सुधी पुस्तक लिखने पर बधाई दी.  इसी पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण Public Discipline  Thought to Action  खास वर्ग तक पहुँचेगा ही उसके साथ राज्य की भाषा गुजराती में पुस्तक आम लोगों तक पहुँचे उसकी ख़ुश्बू से वे राज्य का आम नागरिक वाकिफ़ हो मुख्यमंत्रीजी का इशारा मैं समझ रहा था. उन्होंनें  निश्चित पुस्तक का विंहगावलोकन कर लिया था. भले वे कह रहे थे कि इस पुस्तक का मैं विधिवत अध्ययन करूँगा .
कार्यक्रम की समाप्ति पर  मेहमानों के लिए स्नेहभोज की व्यवस्था थी पर उसमें रुचि न लेकर लोगों की भीड़ पुस्तकों को खरीद कर लेखक डॉ.राजीव कुमार गुप्ताजी के हस्ताक्षर लेने के लिए लाइन लगाये हुए थी. इसमें सचिवालय के आम खास कर्मचारी से लेकर शिक्षा विभाग के लोगों की तादाद ज़्यादा थी. ये सिलसिला रात्रि 9.30 तक ज़ारी रहा.राजीव सर कार्यक्रम के एक घंटे पूर्व शाम 4 बजे महेमानों के स्वागत के लिए खड़े थे  किंतु वे अभी भी खड़े खड़े ही लोगों को अपनी पुस्तक पर हस्ताक्षर दे रहे थे जब कि कुर्षी की पास में व्यवस्था कर दी गयी थी. वे अपने पाठकों को हस्ताक्षर के साथ साथ सम्मान भी दे रहे थे ये बात किसी से छिपी न रही.
 भोजन दरवाजे पर हो और लोग पुस्तक खरीद कर लेखक के हस्ताक्षर के लिए लाइन लगायें ये मेरे लिए अपने 20 साल के शिक्षा एवं साहित्य क्षेत्र में अद्भुत घटना थी. प्राया लोग साहित्य समारंभों में पुस्तक खरीदने की जगह भोजन पर जिस तरह टूटकर गिरते हैं वह सब पहले देखा था.पुस्तक भी लेखक से मुफ्त में ले शायद ही पढ़ें बाकी खाये पीये फूटे वाले ज्यादातर  पुस्तक विमोचन समारोहो में होते है.
भीड़ कुछ कम हुई तो हमने भी अंग्रेजी एवं गुजराती दोनों संस्करण स्टाल से खरीदे. एक अपने लिए दूसरे दिल्लीमें यू.पी.एस.सी.की तैयारी कर रहे बेटे के लिए उसने कहा था पापा राजीव गुप्ता सर का व्याख्यान गुजरात नेशनल लॉ.युनिवर्सिटी  गाँधीनगर में सुना था. वे काफी ज्ञानी हैं सीनियर आई.ए.एस.अफ्सर के साथ इन्टरनेशनल लॉ पर पीएच.डी.हैं. साथ ही उसने हमें वार्न भी किया था के वे डिसीप्लिन के बहुत ही आग्रही हैं पहले की तरह ज़रा भी चूक मत करना.
पूरे गुजरात राज्य में शिक्षा विभाग पूर्व शिक्षा कमिश्नर राजीव गुप्ता सर के चमत्कार को आज भी नमस्कार करता है तीन साल पहले वे गुजरात राज्य के शिक्षा कमिश्नर रह चुके हैं. अभी प्रिंसीपल सेक्रेटरी  के रूप में किसी अन्य विभाग में कार्यरत हैं.
कभी शिक्षा विभाग में वापिस आये तो खैर नहीं राज्य का आधा शिक्षा विभाग तो इसलिए भी हाज़िर था फिर चाहे वाइस चान्सलर हों सरकारी गैर सरकारी अध्यापक अध्यापिकायें हों कि हमारे जैसे सरकारी या गैर सरकारी प्रिंसीपल हो उनका फ़र्मान आख़िरी फ़र्मान होता है.किसी अध्यापक क्या प्रिंसीपल की मज़ाल जो मीटिंग के समय मोबाइल की रिंग बज जाये उनके आने से पहले स्विच आफ हो जाते थे. सर ने सरकार में नौकरी कैसे की जाती है बहुत अच्छी तरह से हमें भी सिखाया था.सेनेट का इलेकशन फोर्म वापिस न खींचने पर 400 किमी. अहमदाबाद से दूर सरकारी कोलेज में पोस्टिंग का आदेश शनिवार घर पर भिजवाया था. तब मैं सरकारी अध्यापक था.
प्रशासन में राजनैतिक आदेशों की अवहेलना करने पर परिणाम शुभ नहीं होते. ये वे भी जानते हैं और मैं भी जानता हूँ. मुझे एन.सी.सी.में फौजी अफ्सरों के साथ कार्य करने का अनुभव था राजीव गुप्ता सर के आक्रमक तेवर, हुक्म हुक्म की तरह दिये जाने का उनका अंदाज सिवीलियन न होकर फौजी ही होता है.किसी भी कार्यक्रम से आयोजन के पूर्व स्थल की रेकी करना, तमाम शूक्ष्म से शूक्ष्म जिम्मेदारी का स्वयं मूल्यांकन करना ग़लती करने वाले को सज़ा निश्चित देना वो भी तुरंत आनन फानन. आज कि बात कल पर वे नहीं टालते ये सारी खूबियाँ मुझे ज्ञात थीं. अपनी पुस्तक सार्वजनिक अनुशासन विचार से अमल तक में भी उन्होंने अनुशासन भंग के तमाम क्षेत्रों पर अपनी पैनी नज़र डाल कर अनुशासन बद्धता को प्राथमिकता दी है.
जब वे राज्य के शिक्षा आयुक्त थे तब उनसे पाला पड़ा था.शिक्षा विभाग में ज़रा भी चूक करने वालों को कैसे दिन में तारे दिखाते हैं उसका बोध हमें ही नहीं राज्य के तमाम सरकारी गैर सरकारी अध्यापकों, वाइसचान्सलरों, आडिट आफीसरों को था. एक ओडिट आफीसर राजपूत साहब पोरबंदर से आये ही नहीं थे पुस्तक खरीद कर गुप्ता सर के हस्ताक्षर भी ले रहे थे. हमें लगा सर के चमत्कार  का असर हम पर ही नहीं शिक्षा विभाग के कई नामी गिरामी हस्तियों पर आज भी है. लकड़ी के भर ही बंदरी नाचती है ये हुनर सर के पास है. पर आज कल किसी ऐसे विभाग में कार्यरत हैं कि पुस्तक के माध्यम से सब को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे हैं.सर से अंग्रेजी पुस्तक बेटे के लिए लेकर हस्ताक्षर लिए तो उन्होनें उसका नाम पूछने पर यू.पी.एस.सी की सफलता के साथ Your Father wonderful follow him. लिखा तो मैंने घर पर बताया तो श्रीमतीजी  ठहाका लगा कर हंसी बोली वंडरफुल तो तुम हो ही पर मैंने कहा सर ने फौलो हिम लिखा वो सूचक है.
 डॉ.राजीव गुप्ता सर को अपने राज्य के शिक्षा कमिश्नर के रूप मैंने व्यक्तिगत भी मिलेट्री कमान्डर के रूप में देखा अनुभव किया है.उनकी बोलचाल रुआब आम आई.एस.अफ्सरों जैसा न होकर विशिष्ट तरह का है उनकी किसी भी सभा में अध्यापक तो क्या प्रिंसीपल से लेकर वाइसचान्सलर तक के मोबाइल का बजना ज़रा भी पसन्द नहीं सभी के स्विचआफ उनके आने से पहले ही हो जाते मैनें देखे हैं.
सार्वजनिक अनुशासन हीनता को उन्होंनें अपने दीर्घकालिक उच्च प्रशासकीय जीवन में  सड़क से लेकर वायुयान तक देखा है उसकी पीड़ा को भोगा है. पुस्तक में सार्वजिनक अनुशासनहीनता के तमाम क्षेत्र लिफ्ट से लेकर हवाई यातायात तक लेकर लोगों की अधीरता बेताबी दूसरों के लिए मुसीबत का सबब बनजाती है उसका क्रमशा सोदाहरण वर्णन ही नहीं किया उसके उपचार के रास्ते भी सुझाये हैं.एक तरफ  व्यक्ति अपने घर परिवार में तो अनुशासन का आग्रही है पर सार्वजनिक स्थलों,मोल,थियेटर,संगीत समारोहों में जा कर लोगों की भावना की परवाह किये बिना मोबाइल पर ज़ोर ज़ोर से बात करना कहां कि सभ्यता है. ज़ाहेर शौचालय में धक्का धक्की करना  उसमें अश्लील लेखन चित्रआदि का प्रदर्शन भला कौन सी संस्कृति है. रेल कंपार्टमेंट के शौचालय में लोगों की लेखन प्रतिभा चित्र कौशल को मैंनें स्वयं देखा है. लोगों की उदासीनता भी ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करती है. स्वच्छंदता के नाम पर कला प्रदर्शन में लोग राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से लेकर देवी देवताओं को भी नहीं छोड़ते. इस तरह की सार्वजनिक अनुशासन हीनता सार्वजनिक कलह की वजह बन जाती है. लेखक राजीव गुप्ताजी ने अपनी पुस्तक में डॉक्टरों की लापरवाही को बयान किया है. सभी अस्पताल में इमरजन्सी इन्टेसिव केर युनिट में जूता उतार कर जाने का नियम होने के बावज़ूद आई.सी.सी.यू में बूट पहिन कर जाने से मरीज़ को इन्फेक्शन लग जाने का भय रहता है पर डॉक्टर स्वंय कहा उसकी परवाह करते हैं उन्हें कौन रोकने वाला है वे अपने पाठकों से पूछते हैं क्या आप कह सकेंगे डॉ. प्लीज़ आप अपने जूते उतारें.
सिने अभिनेताओं के डॉयलोग हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहां से  शुरू होती है बच्चों को  अनुशासन हीनता की और खींच ले जाते हैं.रेल्वे क्रांसिग हो  या सड़क थियेटर हों या संगीत समारोह, पार्टी हो या विवाह स्थल लायब्रेरी हो या शोकसभा का स्थल सब जगह अनुशासनहीनता लोंगो की पीड़ा का सबब बनी हुई है.महफिलों के भी आदाब होते हैं एक कलाकार तन्मयता से दर्शकों को भावविभोर करने में लगा है तो दूसरी तरफ मोबाइल पर आपकी बातचीत बार बार अपनी जगह से उठने से दूसरों का रसभंग होता है पर झूटी अपनी कला मर्मज्ञता के प्रदर्शन में लोग ऐसे स्थलों पर जाते हैं और लोगों को पीड़ा पहुँचाते है जाने अनजाने में इसे स्वयं ही अनुशासित करना होगा दूसरों की भावना का ख़याल कर जब तक हम अपना वर्ताव नहीं करते तब तक ये संभव नहीं अपने संवेदन तंत्र को थोड़ा सचेत उसे जागृत कर हम एक सभ्य सुसंस्कृत भारतीय नागरिक होने का गौरव ले सकते हैं.
दूसरी तरफ आधुनिक परिवेश में आर्थिक समृद्धि ने लोगों को भौतिक साधनों का सुख भले दिया हो पर मानिसक चैन छीन लिया है. एक तरफ निरंकुश  संतान संड़कों पर बाइक पर धूम स्टाइल से स्टंट कर लोगों का सड़क पर चलना हराम कर रही है. पुस्तक में युवावर्ग की इसी अनुशासन हीनता की ओर लेखक राजीव गुप्ताने सचित्र वर्णन किया है.
अहमदाबाद में युवां बाइकर का बीच सड़क पर स्टंट

दूसरी तरफ अपने लाड़लों के कारनामों मे मांबाप अनभिज्ञ हो ऐसा नहीं है पर वे ख़ामोश आँखों पर पट्टी बाँधे देख रहे हैं. अहमदाबाद जैसे शहर में ऐसी स्टंट करने वाली गैंग को पकड़ने के लिए दस्ते बनायें गये हैं. माता पिता को अपनी संतान को  बाइक गाड़ी दिला वो भी लाइसंस की परवाह किये बिना सड़कों पर उत्पात करने को खुला छोड़ देते हैं जब  फँसते हैं या जान गवां बैठते हैं. तब उन्हें बोध होता है कि पुत्रमोह ठीक नहीं.
लोगों का हेल्मेंट बाइक पर लटका रखना, पत्नी की गोद में दे देना तो आम बात है. 
  जिसकी वजह से सड़क दुर्घटनामें 18 से 40 साल के बीच के लोगों के मरने में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है राष्ट्र का अमूल्य नागरिक धन अनुशासनहीनता की बलि चढ़ जाये लेखक डॉ.राजीव गुप्ता का ह्दय इससे भी द्रवित हो उठता है.
हद तो तब हो जाती है जब शोकसभायें भी आडम्बर और प्रदर्शन का मंच बन जाती हैं. मृतक की महानता का गुणगान करने का किसी को अवसर न मिला तो उसका ये रोना है हमें हमारी भावनायें व्यक्त करने का क्या कोई अधिकार नहीं शोकसभा के ये दृश्य देख कर आप ही विचार करें.
मरने वाले से ज्यादा ज़िन्दा व्यक्ति से यदि शोकसभा  की संख्या का सरोकार है तो उसे शोकसभा कहा भी जाय या नहीं सवाल है. मरने वाला कितना भी निकम्मा धूर्त पापी क्यों न हो हर व्यक्ति को उसकी महानता की कहानी ज़रूर याद आती है जिसे वह रुंधे कंठ, अश्रुभीगे नयन से सुनाने को आतुर होता है वहां  भी अँधा बाँटे सीकरी अपने अपने देय. जैसा हाल होता है.
मृतक के परिवार को उसकी ग़ैरहाजरी में मदद करना,सही श्रद्धांजली कही जा सकती है.
एक तरफ लेखक ने नारी सम्मान को महत्व देते हुए राज्य के   पूर्व मुख्य सचिव का दृष्टांत देते हुए अहोभाव प्रदर्शित किया है, जो किसी भी समारंभ में उन्हें मिलने आने वाली स्त्री का सम्मान उठ कर करते. मित्र पत्नी के साथ किस तरह का व्यवहार करना खास कर जब उसकी शादी हुई हो,मित्र की गैरहाज़िरी में घर जाना शंका कुशंका को जन्म दे सकता है.मित्र पर तुम्हारा अधिकार ज़्यादा ये प्रदर्शित करना, तुमने मित्र से शादी करके भूल की जैसे डॉयलोग बाजी नवी दुल्हन के मन को आहत करेगी. उसके मन में प्रेम की जगह धिक्कार की भावना जन्म लेगी. शादी के बाद मित्र को साथ में घूमने के लिए लेना ये कोई बुद्धिमत्ता नहीं है इससे प्रश्न खड़े हो सकते है. शादी विवाह एक ज़िम्मेदारी है जहाँ आप एक दूसरे को ज़िम्मेदारी उठाने का दायित्व सौंपते हैं विवाह की गंभीरता को समझे बिना आंमत्रण कार्ड की डिजाइन से लेकर आभूषड़, वस्त्रो पर घंटो की बहस चलती है पर विवाह जैसे प्रसंगो मंत्रोच्चार समर्पण जैसी भावना पर  गंभीरता से सोचने की किसी को फुर्सत कहां कि एक दूसरे की भावना को  सम्मान दे समझ कर सुचारू जीवन का श्रीगणेश करे.
शादी विवाह समारंभो में भोजन का जो बिगाड़ होता है उसके पीछे मंहगी डीस तमाम भारतीय वेरायटी जिसे चखते चखते ही पेट भर जाता है असली भोजन तक का सफर करते समय जगह कहां बचती है फिर भी डीस में लोग लुगाई लेते ज़रूर है जो जूठन के रूप में बिगड़ता है. अन्न को हमारी संस्कृति में अन्न देव कहा जाता है पर कितने लोग उसका आदर करते हैं. हर क्षेत्र में सार्वजनिक अनुशासनहीनता का आलम है. हमें इस पर विचार करना  अमल करना होगा. हमारी बुरी आदतें विश्व के साथ चलने में बाधक न हो जायें राष्टहित एवं भारतीय संस्कृति  की रक्षा हेतु भी हमें इस पर विचार ही नहीं अमल तक अग्रसर होना होगा.
पुस्तक के लेखक डॉ.राजीवगुप्ता का गुजरात राज्य भूतपूर्व शिक्षा आयुक्त के रूप में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े रहने के कारण आईपी.एल. जैसी क्रिकेट मैचों का परीक्षा के समय होना भी खलता है
 वे इस पर गंभीरता से विचार करते हैं.लाखों कक्षा 10 और 12 के छात्रों का मैंच को टी.वी. अथवा स्टेडियम में देखना और फिर रिजल्ट में पिछड़ना हताश होकर आत्महत्या करना,बूढे विवश मांबाप की बुढापे की लाठी छिनजाना उस पर कौन सोचेगा. पुस्तक का अंत बड़ा ही करुण है, हरेक शीर्षक  के साथ सचित्र  वर्णन पाठक की संप्रेषणीयता को आसान कर देता है.
एक तरफ चुनाव आयोजन पर तो आई.पी.एल.मैचों को स्थगित करने का निर्णय लिया जाता है पर हमारे क्रिकेट क्रेजी देश में छात्र परीक्षा के समय अपने जीवन के निर्णायक क्षणों से गुज़र रहें हों तब 20 लाख से भी अधिक छात्रों को क्रिकेट के माध्यम से अपना कीमती समय बर्बाद करने को ललचाया जाता हो उस पर सब मौन रहें तो दूसरी तरफ ज़बरदस्त मुनाफा कमाने वाले आई.पी.एल मेचों के फ्रेनचाइज़ी की मनमानियों को  देखने और सहने को समाज कितना विवश है. लेखक की दृष्टि से इस तरह की सार्वजनिक अनुशासन हीनता को प्रजाकीय सज्जता ही राजकीय सज्जता को  सुधार लाने के लिए प्रेरित कर सकती है. इससे पूर्व हमें स्वयं अनुशासन बद्धता की सीमा में रह स्वयं दूसरे की भावना का ख़याल रख अपने आचरण में आमूल परिवर्तन लाना होगा. तभी हम अपने चारों तरफ एक संयमित सौहाद्रपूर्ण  शांतिमय वातावरण की संरचना कर सकेंगे.
इस पुस्तक की सहजता इसमें है कि पाठक कितना ही अनुशासन बद्ध क्यों न हो कहीं न कहीं जाने अनजाने सार्वजनिक अनुशासन हीनता कर बैठता है. लाख बचने पर भी उससे जाने जाने चूक हो ही जाती है.
एक पाठक के रूप में दो प्रंसग मुझे काफी स्पर्श कर गये. मुझे जीवन में अन्य पाठों की तरह घर से बाहर  जूता उतारने के लिए श्रीमती जी ने हमारे साथ कई युद्ध लडे. मसलन घर में जूता पहिन कर आने पर वे बरस पड़ती. मैनें अभी पोछा लगाया और आप जूता पहिन कर घुस आये. जब बंदे पर कोई फर्क नही पड़ा तो उनके तेवर तीखे होते चले गये. तुमने मुझे नौकरानी समझ रखा है. पांव की जूती से ज़्यादा नहीं समझते तुम.रात दिन के कलकलाट से मैं भी तंग था जानकर नहीं करता था पर हो जाता था. एक दिन वे किचन में काम कर रही थी. बेटा पांच साल का रहा होगा वह स्कूल से आकर अपने जूते उतार अंदर घुसा मैं भी कोलेज से छूट कर घर में जूते पहिन कर डॉइंगरूम में घुस चुका था बेटे ने आवाज़ दी मम्मी पापा जूता पहिन कर घुस आये. मैने उसके मुँह पर ज़ल्दी से हाथ रख चुप किया फिर झाड़ू से मिट्टी साफ कर मामला सँभाला. नई नई शादी होने पर मित्रों के साथ के कारण रात 9 बजे आने पर ये डॉयलोग सुनने को मिलते थे. ये शरीफों के आने का वक्त है तो दूसरी तरफ मित्रों का आकर्षण .मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ जैसा हाल था. लेखक ने शादीशुदा जोड़ों को घुमने आदि के स्थलों पर पत्नी के साथ मित्रों के ले जाना ठीक नहीं मित्र की गैरहाज़िरी में मित्र पत्नी के साथ हँसी मज़ाक ठीक नहीं ये सब मामूली सी लगने वाली बातें शंका कुशंकाओं को जन्म देंगी.नयी शादी हुई हो रात देर तक मित्रों के साथ गप्पे लगाना ठीक नहीं. लेखक ने ऐसे अमूल्य सुझाव पुस्तक में दिये हैं.ख़ास कर आपसी झगड़े में दूसरों को शामिल करने से समस्यायें और बढ़ेगी.
एक बार मेरे साथ ग़ज़ब हो गया नई नई हमारी शादी हुई थी.एक परिचित के घर जाने पर कविता के साथ साथ उन्होंने खंडकाव्य सुना दिया भोजन भी कराया पर रात के 11 बज गये अब घर कैसे जाऊँ क्या बहाना बनाऊं स्कूटर पंचर का बहाना  काम नहीं आयेगा.आज तो पड़ोसी इकट्ठे होगें.जैसे तैसे दबे पांव घर पहुँचा भाई ने दरवाज़ा खोला. घर में सन्नाटा तूफान के आने के आसार थे. जाकर दूसरे बिस्तर पर चुपचाप सो गया. कुछ नहीं हुआ रात दिन की हिदायतों से अगला समझ चुका था कि कुछ असर होने वाला नहीं.
बाहर किसी मित्र के यहाँ खाना खा लेने पर मैनें घर आने पर जैसी ही बताया कि मैं बाहर खा कर आया हूँ बड़े चाव से बनाये दहीवडों को श्रीमतीजी ने खुद भी न खाकर सब बाहर फेकते देखा है. आज भी कहीं बाहर खाने से पूर्व उन्हें सूचित करना अनिवार्य समझता हूँ फिर कोई दिक्कत नहीं.रसोई घर में बिगड़ती है साथ बनाने वाले की भावना को चोट पहुँचती है बहुत देर से समझा हूँ. हमेशा जीवन में समय बद्ध रहना अनुशासन को पालन करने में मैंने श्रीमतीजी को  हमेंशा अब्बल पाया है ये उनके अपने संस्कार उन्हें  मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक अधिकारी पिता से मिले हैं. पर डॉ.राजीव गुप्ता सर की पुस्तक थियेटर हाल में पिक्चर देखने जाने वाली माँतायें शिशु को साथ में ले जाती है. बच्चा हाल में अधेरे से भयभीत हो ज़ोर ज़ोर से रोना शुर कर देता लोग परेशान होते हैं बाहर ले जाओ बहिनजी के नारे लगने लगते हैं.
ऐसे एक अपने प्रसंग को याद कर आज भी काँप जाता हूँ. जब शिशु रहे अपने बेटे के साथ पिक्चर होल जाने पर श्रीमती जी ने दूध की बोतल हाथ में थमा सीट की बाजू में फुटरेट पर बेटे को सुला दिया था.वो मज़े से दूध पी रहा था रोने गाने का काम उसने कभी नहीं किया. राजीव सर की पुस्तक सार्वजनिक अनुशासन  विचार से अमल तक पढ़ने के बाद मैं सोचता हूँ हमेशां नियम अनुशासन में रहने वाली और मुझे रखने वाली मेरी पत्नी ने बेटे को फुटरेट पर पास में सुला कैसे पिक्चर देखी होगी.थियेटर शिशुओं के साथ फिल्म देखने वालीं मार्डन मांतायें लोगों को तो प्रताड़ित करती हैं बच्चे भी अँधेरे के कारण रो रो कर परेशान होते हैं.लेखक ने उन निरीह जानों के दुख की भी परवाह की है. मैं ये भी तस्लीम करता हूँ पत्नी को पिक्चर देखने को मैंने ही मजबूर किया हुई होगा जाने अनजाने में मेरे बेटे को पिक्चर हाल में सुलाने की उनसे  चूक हुई होगी. मैं इस विचार से आज भी कांप जाता हूँ कि कोई भूल से थियेटर हाल में बच्चे पर पैर रख देता तो इसमें कसूर किस का होता .
सार्वजनिक अनुशासन विचार से अमल तक पुस्तक  में डॉ.राजीव गुप्ता साहब के अपने शूक्ष्म अति शूक्ष्म अन्वेषण हैं जहाँ उनकी पारखी नज़र ने जमीन से ले कर वायुमार्ग आकाश में एयरहोस्टेस से लोगों को उद्धता से पेश आने के फैशन को नज़दीक से देखा है. पैसा आने से संस्कार नहीं आते.लेखक का कथन बहुत ही मार्मिक है. फ्लाइट में जाना मुझे तो अभी तक नसीब नहीं हुआ .वहां लोगों की ज़ोर ज़ोर से बात करने की आदत सीट को एक दूसरे की परवाह किये बिना आगे पीछे करना तो मैं नहीं जानता  पर बस में लोगों  को ऐसा करते ज़रूर देखा है चाहे भले पीछे वाले को आपत्ति हो.
हवा में हवातिया मारते उन्होंने हवाई जहाज में लोगो लुगाइयों को देखा होगा तभी लिखा है. पैसा आने से संस्कार नहीं आते. एक अंतिम बात पुस्तक मांगने वाले मैं इसे ले जाऊँ  के बहाने कैसे हमेशा के लिए हड़प जाते है उसका मैं शिकार हुआ हूँ मेरे महत्वपूर्ण पुस्तकें ही नहीं परंतु पीएच.डी.की थीसिस जो हिन्दी ग़ज़ल पर थी उसे किसी ने मांग कर नहीं लौटाया तब बड़ा आघात लगा.  ईश्वर की कृपा ही समझो कि 1990 में पीएच.डी. की मौखिक परीक्षा लेने आये दिल्ली से जाने माने साहित्यकार रामदरश मिश्रजी ने अपनी कोपी मुझे दे दी थी वही सँभाल कर रखी हुई है. इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक उसके साथ घटी घटना के किसी न किसी प्रसंग से अवश्य जुड़ जायेगा. मैंने जानबूझकर सभी प्रसंगो को नहीं समेटा उन्हें अन्य पाठको की जिज्ञासा वश अछूता रखा है.ये पुस्तक बाल,वृद्ध,नर,नारी,कुँवारे,कुँवारी सब के लिए उपयोगी है. किसी के घर जाने पर लोग अपने बच्चों के कारनामें कैसे चाव से सुनाकर बोर करते हैं बेटा अंकल को डांस कर के दिखाओ. कोई आप से काम से मिलने आया हो और आप अपने पुत्र-पुत्री की लीला का बखान करने लगे. सबको उसमें रस नहीं होता. दोपहर के समय बीमार व्यक्ति की ख़बर पूछना, या देर रात को फोन कर कहना सो गये थे क्या अथवा तुमने मुझे पहिचाना की नहीं ये सब बातें फोन के आदाब के ख़िलाफ़ हैं. सामने वाला मर्यादा वश कुछ न कहे पर वह हमारी मूर्खता को अवश्य भांप लेता है कि नोट हजार की है या पांचसों की है.
 ये पुस्तक उन मां बाप के लिए तो उपयोगी है ही जो अपने बच्चों को अनुशासन में रखना चाहते हैं साथ ही खास कर स्कूलों,कोलेजें के नवयवकों के लिए इसमें जीवन के बहु उपयोगी मंत्र सीधी सादी भाषा में संकलित हैं वे इसे खरीद कर पढ़ें में इसका लिंक अपने छात्रों और चाहने वालों के लिए बहुचर्चिचत सोसियल साइट फेश बुक पर भी दे रहा हूँ ताकि उनके ज्ञान में इज़ाफ़ा हो.
 ये पुस्तक आमोख़ास सभी के मात्र सार्वजनिक जीवन ही नहीं व्यक्तिगत जीवन में आने वाली समस्यायों का निदान करने में महत्वपूर्ण साबित होगी. लेखक के लंबे प्रशासकीय अनुभव का निचोड़ सार्वजिनक अनुशासन विचार से लेकर अमल तक में व्यक्त हुआ है. 
इस पुस्तक के लेखक डॉ.राजीव कुमार गुप्ता, प्रकाशक श्रीजयेशभाई एवं पुस्तक के विमोचन कर्ता राज्य के मुख्यमंत्रीश्री नरेन्द्र मोदीजी को बधाई देता हूँ कि गुजरात अब पढ़े गुजरात से लिखे गुजरात की ओर अग्रसर हुआ है भौतिक सिद्धियों के साथ साथ सांस्कृतिक मूल्यों का जतन करना भी गुजरात की ज़िम्मेवारी है. ये पुस्तक इसी दिशा की ओर उठाया महत्वपूर्ण कदम है.
बकौले मीरतक़ीमीर अगर कहूँ तो
सारे आलम पे हूँ  मैं छाया हुआ.
मुस्तनद है मेरा फ़र्माया हुआ.
 पुस्तक ज़ाहेर शिश्त विचारथी अमल सुधी गुजराती में और अंग्रेजी में Public Discipline Thought to Action written by Dr,Rajivkumargupta IAS ISBN978-81-8440-532-3 नवभारत साहित्य मंदिर,202 पेलिकिन हाउस,आश्रमरोड अहमदाबाद-9 से प्रकाशित है गुजराती में पुस्तक का मूल्य 275 अंग्रेजी में प्राप्त स्थल है email: info@navbharat.com web:www.navbharat.com  फोन.079-26580365,22132291
प्रिंसीपल डॉ.सुभाष भदौरिया सरकारी आर्टस कॉलेज शहेरा जिला पंचमहाल गुजरात.मोबा.97249 49570
prin.shehara@gmail.com blog  http://subhashbhadauria.blogspot.com

मंगलवार, 27 दिसम्बर 2011

फूल है सामने ख़ंजर पीछे,तुझको बचना है उनकी घातों में.
















ग़ज़ल

वो न मानेंगे बात बातों में.
जिनको आता मज़ा है लातों में.

फूल  है सामने ख़ंजर पीछे,
तुझको बचना है उनकी घातों में.

दिन दहाड़े वो देश लूटे हैं,
ख़ौप रहता था पहले रातों में.

जंग लड़नी है, हमको मिलकर के,
फूट डालेंगे मिल वो जातों में.

अब गरुण बन के झपटना है तुझे,
देश में सापों की जमातों में.

हमतो तन्हा ही बहुत अच्छे हैं,
क्या रखा है फ़रेबी नातों में

डॉ.सुभाष भदौरिया.
एक बार हम फिर से अपने पुराने तेवरों में वापिस लौटे हैं चारों तरफ जब सांप ही सांप हो तो भला कोई कब तक सहन कर सकता है.  हमारा मश्वरा है देश के लोग शहरों और गांवों के सांपों से बाद में निपटें पहले आस्तीनों के सापों का फन कुचलें.
भृष्टाचार रूपी कालीनाग का दमन सिर्फ अन्नाजी या उनकी मंडली से संभव नहीं होगा. उपवास से आत्मा की शुद्धि भले होती हो असुर शुद्धि के लिए तो अग्नि ही काम आती है. आखिर लोग कब तक ख़ामोश रहेंगें. सर्दी के मौसम में असुर स्वाहा का कार्यक्रम हो तो कछ मज़ा आये केन्डल जला उपवास रखने से वो समझने वाले नहीं सभी चोर चोर मौसेरे भाई जो ठहरे मज़बूत लोकपाल बिल के लिए कुर्बानी देनी होगी.
देश के नवयुवकों का  आक्रोश फेश बुक पर मर्यादा को पार भले कर गया हो पर ग़लत नहीं हैं. दिल्ली के कर्णधार खुद पे लगाम लगाने की जगह फेशबुक जैसी सामाजिक साइडों पर पाबंदी लगा और भी आग को भड़कायेंगे.
फेश बुक पर  देश की  वर्तमान समस्या पर पायी तस्वीर ने हमें भी ग़ज़ल लिखने को मज़बूर कर दिया था तभी से हम भी फेश बुक के चाहक हो गये.
हमारे देश का युवा वर्ग अपनी ताकत के साथ  फेशबुक पर मौज़ूद है.जो जागा हुआ है वे समझते हैं देश सो रहा है.










मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

हम ग़ज़ल में तुझे याद करते रहे.

ग़ज़ल


तुझपे जीते रहे, तुझ पे मरते रहे.
हम ग़ज़ल में, तुझे याद करते रहे.

यूँ तो ख़त तुझको लिखते रहे रात दिन,
तेरे हाथों  में देने  से डरते  रहे.

भूल कर तूने डाली न हम पर नज़र,
तेरी ख़ातिर तो ही हम सँवरते रहे.

खिड़िकियों से न देखा कभी झाँककर,
तेरी गलियों से तो हम गुज़रते रहे.

ये अलग बात कोई न पूरे हुए,
यूँ तो अरमान दिल में उभरते रहे.


हमने सोचा था कि मान जायेंगे वो,
और वो थे कि हरदम मुकरते रहे.



आँधियाँ ग़म की चलती रहीँ उम्र भर,
सूखे पत्तों से हम तो बिखरते रहे.



डॉ.सुभाष भदौरिया. ता.06-12-2011

शुक्रवार, 2 दिसम्बर 2011

पर लिपटकर कभी रोशनी ना मिली.


ग़ज़ल

हमने चाही वो हमको ख़ुशी ना मिली.
दुश्मनी तो मिली, दोस्ती ना मिली.

दूर ले जाये हमको बहाकर कहीं,
तेज़ रफ़्तार की वो नदी ना मिली.

यूँ   अँधेरे मिले  बेतहाशा   हमें,
पर लिपटकर कभी रोशनी ना मिली.

कोई आँसू बहाये हमारे लिए ?
आँख में वो किसी के नमी ना मिली.

हादसा ये हुआ क्या कहें अब तुम्हें,
आसमां तो मिला पर ज़मी ना मिली.


 हमने चाहा जिसे हमने माँगा जिसे,
अपने हिस्से में वो ज़िन्दगी ना मिली.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.02-12-2011











सोमवार, 7 नवम्बर 2011

डूबना ही मुक़द्दर था अपना कितना गहरा था पानी न पूछो.


ग़जल

आँसुओं की कहानी न पूछो.
कौन थी ऋतु सुहानी न पूछो.

डूबना ही मुक़द्दर था अपना,
कितना गहरा था पानी न पूछो.

उम्र भर यूँ ही तड़पा किये हैं,
उसकी कोई निशानी न पूछो.

बोझ बचपन का क्या कोई कम था,
अपनी ज़ख़्मी जवानी न पूछो.

सिर्फ राजा ही पागल नहीं था,
उसकी पागल थी रानी न पूछो.

इश्क की झोपड़ी को समझलो,
हुस्न की राजधानी न पूछो.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.07-11-2011


बृहस्पतिवार, 27 अक्तूबर 2011

आँखों की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.



                                                        
ग़ज़ल
आँखों की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.
जीने के मेरे सारे ,वो अरमान ले गया .

सब लोग पूछते हैं, बताओ तो कौन था ?
जो जिस्म छोड़कर, के मेरी जान ले गया.

अब मेज़बां के पास, तो कुछ भी बचा नहीं,
दिल की तमाम हसरतें, महमान ले गया.


सिगरिट, शराब, अश्क, तन्हाई, व बेकली,
किन रास्तों पे मेरा, महरबान ले गया.

हम गुमशुदा हैं ख़ुद से,ही ख़ुद की तलाश है,
अपने वो साथ मेरी भी, पहिचान ले गया.

उसने तो साथ छोड़ दिया, बीच धार में,
साहिल तलक मुझे, मेरा तूफान ले गया.

अँधों के शहर आइना है, बेचना गुनाह,
ये शौक ही तो हम को, बियाबान ले गया.

झूटों को उसने सर पे बिठाया कमाल है,
सच को वतन से दूर वो फ़रमान ले गया.

क्या-क्या हुए हैं हादसे, हम से न पूछिए,
घर को ही लूट घर का,वो दरबान ले गया.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.27-10-2011.

गुजरात में मनाये जा रहे आज नये वर्ष के शुभ अवसर पर हम अपने चाहने वालों और सताने वालों दोनों को नये वर्ष की शुभकामनायें दे रहे हैं. साथ ही पिछले वर्ष हम से किसी दोस्त या दुश्मन का दिल जाने अनजाने में दुख गया हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं. हुकूमते गुजरात के कई मिशनों मे सदभावना मिशन भी इस वर्ष ज़ोरों से मनाया जा रहा है सबका साथ सबका विकास की तर्ज पर हम भी किसी से कोई दुर्भावना न रखकर सबका साथ का सबका विकास चाहते हैं.आमीन.
प्रिंसीपल डॉ.सुभाष भदौरिया सरकारी आर्टस कोलेज शहेरा एवं गुजरात कोमर्स कोलेज अहमदाबाद.ता.27-10-2011