बुधवार, 20 सितंबर 2017

बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है.पापा का और चाचा का नाम कर दिया है.

ग़ज़ल
बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है.
पापा का और चाचा का नाम कर दिया है.

खेतों में लोटा ले के, जाते थे जो कभी वे,
हगने का उनको घर में, आराम कर दिया है.

पटरी के जो किनारे, आते थे जो नज़ारे,
आँखों को अब हमारी, निष्काम कर दिया है.

रोटी व दाल को भी , तरसे हैं, अम्मा घर में,
इस बेरुख़ी ने तुमको, बदनाम कर दिया है.

मँहगाई ऐसी आयी, रोये हैं लोग-लुगाई,
अब मूम की फली को, बादाम कर दिया है.

हम नोट बंदी से ही, पहले ही मर चुके थे,
जीएसटी ने सबको,गुमनाम कर दिया है.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.20-09-2017 गुजरात.



मंगलवार, 19 सितंबर 2017

गलियों में तेरी बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या.


ग़ज़ल
अब तू ही बता तेरा ग़म ऐसे मिटायें क्या.
तेरी ही सहेली को, अब फिर से पटायें क्या.

दीदार तेरे हमको हों सुब्ह- शाम हरदम,
गलियों में तेरी बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या.

कोई ताज़ नया सर पे आ जायें हमारे भी,
वादों का कहो चूरन हम सब को चटायें क्या.

घर तेरे फिर आने का कोई तो बहाना हो,
अब्बू की तेरी फिर से अब टांग तुड़ायें क्या.

तोहफ़ा तुझे देने को, वो फिर से करें तिकड़म,
मोलों में जा के फिर से अब हार चुरायें क्या.

अब हम भी बने बाबा और खोलें अपना ढाबा,
भक्तों और भक्तिन को अब चूना लगायें क्या.



डॉ. सुभाष भदौरिया ता.19-09-2017 गुजरात

रविवार, 17 सितंबर 2017

लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली.

ग़ज़ल
कभी इसने मार ली तो,  कभी उसने मार ली.
लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली.

हिन्दू या मुसलमान मरें उनको क्या पड़ी,
गीधों ने भेड़ियों ने तो किस्मत संवार ली.

मज़्बूरियां ना पूछ ओ, जीने की सितमगर,
बच्चों की फीस बेंक से हमने उधार ली.

तुम अपनी अपनी ख़ैर मनइयो अय दोस्तो,
रो धो के सही हमने तो अपनी गुज़ार ली.

पंखे पे झूलते हुए लड़की ने ये कहा,
कब तक मैं जूझती लो चलो मैं तो हार ली.


डॉ. सुभाष भदौरिया ता.17-09-2017 गुजरात.



रविवार, 10 सितंबर 2017

खूँन के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह.


ग़ज़ल
जिनमें जान होती है, वो ही डूब जाते हैं.
मुर्दे बैठे साहिल पे,शोर ही मचाते हैं.

खूँन के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह,
और भी नज़र आयें, जितना वो छिपाते हैं.

सच को हमने कहने का, ये इनाम पाया है,
लाश पर मेरी देखो, गिद्ध मुश्कराते हैं.

मौत की करें परवाह, और लोग होंगे वे,
हम तो जां हथेली रख, आइना दिखाते हैं.

क़त्ल में मेरे शामिल, दोस्त भी हैं दुश्मन भी,
लाश पर मिरी माला, मिल के सब चढ़ाते हैं.

अब क़लम से इस दौर का हाल ना लिखा जाये,
आख़िरी संदेशा हम, सबको छोड़ जाते हैं.

 उपरोक्त नारी क़लमकार गौरी लंकेश  की बुज़दिली पूर्वक की गयी नृशंस हत्या पर आहत होते हुए पूरी संवेदना के साथ.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता. 10-09- 2017


मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हमको गुरू घंट मिले ऐसे. अँधों को बटेर मिले जैसे.


गुरू महिमा.
हमको गुरू घंट मिले ऐसे. अँधों को बटेर मिले जैसे.

हमको दुत्कारत थे हर दम, वे प्रीत करत थे छोरिन ते.
हम द्वार पे ठाड़े राह तकें वे इश्क़ करे कुलबोरन ते.

पंछी वे हमाये उड़ाये सदा, फिर फाँसत थे बलजोरिन ते.
हमको तलफत वे छोड़ गये वे जाय फँसे हैं औरन ते.

हमरी वो पंतग को काटत थे,आँखें वो दिखाय के क्रोधन ते.
नीबू सा निचोड़ हमें फेंकें, वे चाटें चटा चटकोरन ते.

हे नरक के वासी निवासी गुरू हम सादर याद तुम्हें करते.
आवेंगे कछु दिन में हमहुँ, तुम धीर धरो अपने मन ते.

परम पावन अपने महागुरू की याद में शिक्षक दिवस पे.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.05-09-2017


बुधवार, 23 अगस्त 2017

दिल भी भूतों का डेरा था अपना कोई,

ग़ज़ल
ताज़ा ताज़ा है ये ज़ख़्म गहरा नहीं.
अब ख़यालों पे है उसका पहरा नहीं.

दिल भी भूतों का डेरा था अपना कोई,
जो भा आया यहाँ ज़्यादा ठहरा नहीं.

वो सुनी अनसुनी कर गया सब मेरी,
मुझको मालूम था वो था बहरा नहीं.

छोड़ दे, छोड़ दे तेरी मर्ज़ी है ये,
टूटा खंडहर हूँ मैं, घर सुनहरा नहीं.

जाते जाते तो इक बार मिल ले गले,
बाद में ये न कहना कि पूछा नहीं.

मौसमों की तरह तू बदल जायेगा,
तेरे बारे में ऐसा था सोचा नहीं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.23—8-2017


सोमवार, 21 अगस्त 2017

उसने ख़त में मुझे बेवफ़ा लिख दिया.

ग़ज़ल

सोचे समझे बिना मुझको क्या लिख दिया.
उसने ख़त में मुझे बेवफ़ा लिख दिया.

ढूँढ़ लो दूसरी अपने जैसी कोई,
कितना दिलचस्प ये मश्वरा लिख दिया.

 उसकी गुस्ताख़ियों को लगाया गले,
ज़हर का नाम हमने दवा लिख दिया.


दिल के हाथों में हम कितने मजबूर थे,
दिल के क़ातिल को ही दिलरुबा लिख दिया.

बुत परस्ती की ये इंतिहा देख लो,
हमने पत्थर को अपने ख़ुदा लिख दिया.


मुझको पढ़ते अगर तो कोई बात थी,
बिन पढ़े ही मेरा तब्सिरा लिख दिया.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.21-08-2017


बुधवार, 16 अगस्त 2017

तुम तपिश दिल की बढ़ने तो दो, बर्फ पिघलेगी ही एक दिन.


ग़ज़ल
तुम तपिश दिल की बढ़ने तो दो, बर्फ पिघलेगी ही एक दिन.
तोड़कर सारी जंज़ीरें वो, घर से निकलेगी ही एक दिन.

शौक़ जलने का परवाने को, होगया आजकल इस कदर,
लाख कोशिश करे कोई भी, शम्आ मचलेगी ही एक दिन.

अश्क बहते नहीं उम्र भर, ग़म न कर अय मेरे हमसफ़र.
बात बिगड़ी है जो आजकल, वो तो सँभलेगी ही एक दिन.

आँसुओं को सँभालो ज़रा, मोतियों को बिखरने न दो,
उखड़ी उखड़ी है तबियत जो ये, a-08-2017०१७,  वो तो बहलेगी ही एक दिन.

तू हवाओं से खुद को बचा, मान ले बात ओ दिलरुबा,
आग दिल में लगी देखना,वो तो फैलेगी ही एक दिन.

लोग समझें इसे दिल्लगी, जानलेवा है ये शायरी,
बाद मरने के मेरे इसे, दुनियां समझेगी ही एक दिन.



डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता,16-08-2017

रविवार, 13 अगस्त 2017

अय बच्चों दुबारा तुम, लेना कहीँ और जनम,



ग़ज़ल
रोते हैं बिलखते हैं, मछली से तड़पते हैं.
माँ-बाप से उनके जब, बच्चे जो बिछुड़ते हैं.

अय बच्चों दुबारा तुम, लेना कहीँ और जनम,
दौलत की यहां ख़ातिर सांसों को जकड़ते हैं.

संतान का ग़म क्या है, समझेंगे वही जिनकी,
हर याद पे जिनके दिल ,दिन रात सिकुड़ते हैं.

आज़ाद वतन की, ये बस इतनी कहानी है,
बाज़ों को खुली छूटें, चिड़िया को पकड़ते हैं.

बेशर्म हैं ये कितने,सांसों के ये सौदागर,
आनी थी शरम जिनको, वे और अकड़ते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.13-08-2017

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

दुश्मन से आर पार का कब होगा फैसला,

ग़ज़ल

वो तो उलझ के रह गये योगी की चाल पे.
हमतो रिसर्च कर रहे हैं रोटी दाल पे.

दुश्मन से आर पार का कब होगा फैसला,
आँखें वो मूदे बैठे हैं मेरे सवाल पे.

आँखें वतन को रोज़ दिखाये हैं देख लो
चिंता की रेखा खिच गयी हैं सब के भाल पे.


तुम रोओ गाओ या सभी अब जाओ भाड़ में,
कुछ होने वाला है नहीं उस मोटी खाल पें.


इस रौशनी में अपनी तो आँखें चली गयीं,
ताली बजा रहे हैं सब उनके कमाल पे.

सूखे पड़े हुए थे कोई पूछता न था,
बारिश हुई तो आ गये नाले उछाल पे.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.10-08-2017