बुधवार, 10 जनवरी 2018

मेरी तन्हाईयाँ लगता है मुझको मार डालेंगी.

ग़ज़ल

तेरी यादें कहां तक अब भला मुझको संभालेंगी.
मेरी तन्हाईयाँ लगता है मुझको मार डालेंगी.

तुम्हें शिकवे बहुत थे ये कि ज़्यादा बोलता हूँ मैं,
मेरी ख़ामोशियां ही अब मेरा ये दम निकालेंगी.

कहां किस्मत थी मैं सोऊं तेरे ज़ानूं पे सर रखकर,
समन्दर की ये ख़ाराशें मुझे ऐसे लुभालेंगी.

उठाये तेरी महफ़िल से कहां लोगों में जुर्रत थी,
पता क्या था तेरी गुस्ताख़ियां पगड़ी उछालेंगी.

सिर्फ़ ख़ाराश ही मुझमें नहीं रहते है गौहर भी,
  हुआ रुख़सत जो दुनियां से तो फिर सदियां खंगालेंगी.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.10-01-2018




मंगलवार, 2 जनवरी 2018

तेरी गली तो क्या, तेरा शहर भी छोड़ दिया .

ग़ज़ल

कभी जो नाता था तुझसेवो कब का तोड़ दिया.
तेरी गली तो क्यातेरा शहर भी छोड़ दिया .

क़फ़स में सांस भी लेने में दिक्कतें थी बहुत,
अना ने हमको भी अंदर से फिर झिंझोड़ दिया.

 दिखाया अक्श जो उसकोतो ये सज़ा दी मुझे,
जुनूं में हाथ से आईनाउसने फोड़ दिया.

परों को काटवो पंछी की ज़ुबा सिलता था,
उड़ान भरने पे गर्दन को फिर मरोड़ दिया.

 गुलाब ज़ख़्मों के महकें न क्यों हमारे अब ?
लहू जिगर का सभी,लफ़्ज़ों में निचोड़ दिया.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.02-01-2018






रविवार, 31 दिसंबर 2017

चेहरे की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.

ग़ज़ल
चेहरे की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.
जीने के मेरे सारे ,वो अरमान ले गया .

सिगरिट, शराब, अश्क, तन्हाई, व बेकली,
किन रास्तों पे मेरा, महरबान ले गया.

अब लोग पूछते हैं, बताओ तो कौन था ?
जो जिस्म छोड़कर, के मेरी जान ले गया.

अब मेज़बां के पास, तो कुछ भी बचा नहीं,
दिल की तमाम हसरतें, महमान ले गया.

हम गुमशुदा हैं ख़ुद से,ही ख़ुद की तलाश है,
अपने वो साथ मेरी भी, पहिचान ले गया.

उसने तो साथ छोड़ दिया, बीच धार में,
साहिल तलक मुझे, मेरा तूफान ले गया.

अँधों के शहर आइना था, बेचना गुनाह,
ये शौक ही तो हम को, बियाबान ले गया.

क्या-क्या हुए हैं हादसे, हम से न पूछिए,
घर को ही लूट घर का,वो दरबान ले गया.
डॉ. सुभाष भदौरिया

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.31-12-2017.


शनिवार, 30 दिसंबर 2017

घर मेरे उसने जो आना चाहा.

ग़ज़ल

घर मेरे उसने जो आना चाहा.
रास्ता सबने भुलाना चाहा.

और भी सर पे चढ़ गये अपने,
हमने उनको जो मनाना चाहा

ऐब गिनवाके मेरे मुहसिन ने,
दूर जाने का बहाना चाहा.

तोड़ने का रहा जुनूं उसको,
हमने नाता तो निभाना चाहा.

एक तेरी थी तमन्ना हमको,
कब भला हमने ख़ज़ाना चाहा ?

हम बियांबा में भटकते अब भी,
तेरी आँखों में ठिकाना चाहा.

चाह महलों की कहाँ थी हमको,
बस तेरे दिल में समाना चाहा.

हम पहाड़ों से डटे हैं अब भी,
आँधियों ने तो गिराना चाहा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 30-12-2017



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

हाथ में जब भी जाम लेते हैं.

ग़ज़ल

हाथ में जब भी जाम लेते हैं.
बेवफ़ाओं का नाम लेते हैं.

हमसे रखते हैं फ़ासले अक्सर,
सबका झुक झुक सलाम लेते है.

तुझको रुस्वा नहीं होने देंगे,
सब गुनाह अपने नाम लेते हैं.

फूल से ख़ार ही लगे बेहतर,
बढ़ के दामन को थाम लेते हैं.

दिल लगाने का शौक है जिनको
आँसुओं का इनाम लेते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.29-12-2017




बुधवार, 27 दिसंबर 2017

वो पत्थर दिल पिघलता ही नहीं है.

ग़ज़ल

वो पत्थर दिल पिघलता ही नहीं है.
मेरा कुछ ज़ोर चलता ही नहीं है.

तकूं मैं राह सुब्ह-वो-शाम उसकी,
वो इस रस्ते निकलता ही नहीं है.

मैं दिल को यूं तो बहलाये बहुत हूँ,
ये उसके बिन बहलता ही नहीं है.

झरे हैं अश्रु बारोमास अपने,
यहाँ मौसम बदलता ही नहीं है.

ज़ख़ीरा ये तेरी यादों का अब तो,
संभाले से संभलता ही नहीं है.

हुआ गुम है ये अपना चांद जब से,
समन्दर दिल उछलता ही नहीं है.

भरे मौसम में ये दम तोड़ देता,
दरख़्ते इश्क फलता ही नहीं है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 27-12-2017




मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

मिल जायें अगर जो राहों में झट से वो किनारा करते हैं.

ग़ज़ल

मिल जायें अगर जो राहों में झट से वो किनारा करते हैं.
तस्वीर हमारी जो चुपके चुपके से निहारा करते हैं.

ठंडी ठंडी रातों की चुभन उस पर ये ग़ज़ब की तन्हाई,
यादों की रजाई पर तेरी, मुश्किल से गुज़ारा करते है.

ये बात कहां वो समझेंगे, ये बात कहां वो मानेगे,
हम रात को अक्सर उठ उठ कर उनको ही पुकारा करते हैं,

दिल उनका रखने की ख़ातिर सह लेते हैं हर एक सितम,
जीती हुई बाजी को उनसे हँस हँस कर हारा करते हैं.

आबाद रहे जिसने की है इस लख़्ते जिगर पे कारीगरी
उस कारीगरी की हम लोगों अब नज़र उतारा करते हैं.

हम नाम ना लें, हम ना सोचें, हम खायें कसम चाहे लाखों,
यादों की गलियों में उसकी हम खुद को संवारा करते है.

अल्फ़ाज़ हमारे गर तुम तक, पहुँचें तो हमारी सुध लेना,
अब दोस्त तो क्या दुश्मन भी मेरी हालत पे विचारा करते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 26-12-2017



गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

मोम से फिर पिघलने लगते हैं.

ग़ज़ल

मोम से फिर पिघलने लगते हैं.
और अरमां मचलने लगते हैं.

कौन देता है दस्तकें फिर से,
दिल के दरवाज़े जलने लगते हैं.

यादें जब तेरी घेर लेती हैं,
घर से बाहर निकलने लगते है.

और क्या तेरे ग़मगुसार करें,
जाम से फिर बहलने लगते हैं.

चाँद ख़्वाबों में मुस्कराता है,
फिर से करवट बदलने लगते हैं.

कौन थामें है हाथ अब किस का,
ख़ुद ही मैकश सँभलने लगते है.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.21-12-2017



शनिवार, 16 दिसंबर 2017

जानेमन यूँ ना दिल को दुखाया करो.

ग़ज़ल

जानेमन यूँ ना दिल को दुखाया करो.
ख़्वाब में ही सही आप आया करो.

रूठ लो, रूठ लो, हक़ दिया ये तु्म्हें,
जब मनाये तो फिर मान जाया करो.

मेरे दिल की भी बतियाँ सुनो गौर से,
और अपने भी दिल की सुनाया करो.

राज़दां हैं तुम्हारे यकीं तो करो,
राज़ अपने ना हमसे छुपाया करो.

शौक़ से जान ले लो कोई ग़म नहीं,
अपनी नज़रों से यूँ ना गिराया करो.

आईना आप भी देखिये तो कभी,
आईना हमको ही ना दिखाया करो.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात. ता. 16-12-2017

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

हम ग़ज़ल कह रहे हैं तुम्हारे लिये.

ग़ज़ल

हम ग़ज़ल कह रहे हैं तुम्हारे लिये.
मुस्कराओ ज़रा तुम हमारे लिये.

एक हम थे जो तूफ़ान से भिड़ गये,
लोग बैठे रहे सब किनारे लिये.

बात क्या फिर कोई हम खरी कह गये,
लोग फिरते हैं सब क्यों दुधारे लिये.

हों मुबारक तुम्हें फूल की वादियाँ,
क्या करेंगे इसे दिल के मारे लिये.

ये अलग बात है आज तन्हा हैं हम,
साथ फिरते थे हम चांद तारे लिये.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.15-12-2017