Monday, July 7, 2008

ब्लॉग की मौसी बहुत हँसती हैं.

ग़ज़ल
ब्लॉग की मौसी बहुत हँसती हैं.
खेत में सबके जा बरसती हैं.

हाय इनकी अदा के क्या कहने !
उल्टे पल्लू में खूब जँचती हैं.

तितलियों और गुलों की बस्ती में,
सबसे पहले ये जा पहुँचती हैं.

छोरियों की करे ये वाह-वा हैं,
हमको अकसर ये आ घुड़कती हैं.

मिल के गाँधी से ये जुआ घर में,
पी के दारू ये फिर बहकती हैं.

चेले लेते हैं इनके इन्टरव्यू,
मौसीजी आप किस पे मरती हैं.

लौंडे जब भी बवाल करते हैं,
फिर तो धीरे से ये खिसकती हैं.

रेप के केश में फँसा गब्बर,
मौसी अपनी भी फिकर करती है.

ज़ख्मी ठाकुर की ये तो ग़ज़लें हैं.
सीधे जा के कलेजे घुसती हैं.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.08-07-08 समय.11.00AM.




तेरी पतली कमर के क्या कहने.

ये ग़ज़ल उपरोक्त तस्वीर से वाबस्ता है हज़्रात मुलाहज़ा फ़र्मायें और अपनी नवाज़िश से ग़रीब को मालामाल करदे. आमीन.
गज़ल
तेरी शातिर नज़र के क्या कहने.
तेरी पतली कमर के क्या कहने.

थाह पाई कहाँ ? जमाने ने ,
तेरी गहरी नहर के क्या कहने.

कितने जलवाये, कितने कटवाये,
तेरे ख़ौफ़ो-ख़तर के क्या कहने.

चीखें अब भी सुनाई देती हैं,
तेरे क़ातिल शहर के क्या कहने.

रुहें अब भी सवाल करती हैं,
तेरे पिछले ग़दर के क्या कहने.

मैं भी तेरी ज़बान बोले हूँ ,
मुझ पे तेरी असर के क्या कहने.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.07-07-08 समय.11.25PM.









Sunday, July 6, 2008

बुश से करने चले सगाई वे.

ग़ज़ल
देश की दे रहे दुहाई वे.
बांट खायेंगे फिर मलाई वे.

लोटे बिन पेंदी के लुढ़क करके,
दे रहे देखो अब सफाई वे.

गांड फाड़े है सब की मँहगाई,
बुश से करने चले सगाई वे.

चोर-चोरों में मौसिया रिश्ता,
हैं तो आपस में भाई भाई वे.

उनको अपने भले की चिन्ता है,
मुल्क की क्या करे भलाई वे.

भाँड निकले हैं फिर तमाशे को,
कर रहे देखो जगहँसाई वे .

हमने जिन पे था एतबार किया,
आज करते हैं बेवफ़ाई वे.

रोज़ ताज़ा वो ज़ख्म देते हैं,
हँस के बांटे हैं फिर दवाई वे.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.06-07-08 समय.8.00PM.








Wednesday, July 2, 2008

दूध सांपों को वो पिलाते हैं.

ग़ज़ल
दूध सांपों को वो पिलाते है.
बेंचकर मुल्क मुस्कराते हैं.

हम वचन दे के, प्राण दें अपने,
दोगले कह के मुकर जाते हैं.

इन लुटेरों की तो हिम्मत देखो,
ख़ुद को मालिक ! वो अब बताते हैं.

सिर्फ़ कश्मीर ही नहीं अब तो ,
पूरा हिन्दोस्तां वो चाहते हैं.

राम के वाण , और सुदर्शन के,
चमत्कारों को भूल जाते हैं.

भोले बाबा अगर बिगड़ जाये,
फिर तो तांडव भी वो दिखाते हैं.

खून अपनी नशों में खौले है,
और वो जश्न को मनाते हैं.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.03-07-08 समय.8.45AM.









Tuesday, July 1, 2008

अब मशालों को जलाओ लोगो.

उपरोक्त तस्वीर हमारे गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री श्रीनरेन्द्रमोदीजी की है.
ये ग़ज़ल इसी पसमंजर की है. उनके चाहने वाले इस तस्वीर पर क्लिक कर लुत्फ़ उठायें और जलने वालों को हमारा मशवरा है अपना इलाज़ करायेंआमीन.
ग़ज़ल
तुम अँधेरों को भगाओ लोगो.
अब मशालों को जलाओ लोगो.

सर झुकाकर के रहोगे कब तक ?
शान से सर को उठाओ लोगो.

रास्ता सांप अगर रोकें तो,
तुम गरुड़ बन के दिखाओ लोगो.

राम और कृष्ण के हो वंशज तुम,
याद दुश्मन को दिलाओ लोगो,

खूँन मांगे हैं सरहदें अब तो,
कर्ज़ मिट्टी का चुकाओ लोगो.

हाथ पर हाथ रखे बैठे हो,
काम कुछ करके बताओ लोगो.

फ़ैसले आप करो खुद अपने,
अब न का़ज़ी को बुलाओ लोगो.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.02-07-08 समय.6.20AM.












Sunday, June 22, 2008

मुख्यमंत्री श्रीनरेन्द्रमोदी की सरकारी कालेज से हिन्दी निष्कासित

उपरोक्त एन.सी.सी. युनिफोर्ममें में मुख्यमंत्रीश्री से हस्तधुन करती तस्वीर हमारी है जब वे हमारी गुजरात कॉलेज पधारे थे।
मुख्यमंत्री श्रीनरेन्द्रमोदी की सरकारी कॉलेज से हिन्दी निष्कासित.

मात्र राज्य ही नहीं राष्ट्र स्तर पर आलीशान कॉलेज श्री के.का.शास्त्री शिक्षा संस्थान मणीनगर परिसर का लोकार्पण करते समय ता.19-6-08 के रोज मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीजी फूले न समाये. कार्यक्रम की शुरुआत छात्र छात्रों द्वारा हिन्दी प्रार्थना-नृत्य इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर होना की मनमोहक प्रस्तुति से हुआ.
मंचस्थ महानुभावों में मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी, महसूल मंत्री श्रीमती आनंदी बहिन पटेल शिक्षामंत्रीश्री रमणलाल वोरा, राज्यकक्षा शिक्षामंत्री श्रीमती डॉ.मायाबहिन कोडनानी ,संसद सभ्य हरीन पाठक,राज्य की शिक्षा कमिश्नर,गुजरात राज्य की युनिवर्सिटी के कुलपति गण सभी झूम रहे थे. एन.सी.सी ऑफीसर के रूप में मैं भी हाज़िर था. पर हिन्दी अध्यापक होने के नाते मेरा मन रो रहा था कि जिस हिन्दी भाषा की मधुरता पर सब के सर हिल रहे थे क्या उन्हें पता है कि उसी राष्ट्र भाषा हिन्दी को दो वर्ष से यहाँ सरकारी आर्टस कॉलेज में विद्यार्थीओं की भारी मांग होने के वावज़ूद हिन्दी भाषा को विषय के रूप में नहीं दिया जा रहा.कारण कॉलेज की कार्यकारी आचार्य श्रीमती गीता पंड्या हिन्दी को फालतू विषय बताती हैं. अंग्रेजी,संस्कृत,गुजराती,मनोविज्ञान,अर्थशास्त्र,इंडोलोजी विषय पढ़ाये जाते हैं पर हिन्दी नहीं. पर इसके पीछे का रहस्य यह है कि वे अर्थशास्त्र की अध्यापिका हैं उनका प्रिंसीपल की प्रमोशन लिस्ट में नाम है हिन्दी विषय देने से हिन्दी का कोई पिंसीपल आ सकता है. इसलिये न रहेगा बांस न बजेगी बासुरी. अपनी कुर्षी को बचाने के चक्कर में ये खेल जारी है.

अहमदाबाद मणीनगर की पूर्व पट्टी में ज्यादातर गरीब हिन्दी बोलने वाले हिन्दू,मुसलमानों की संख्या ज़्यादा है . ये मुख्यमंत्रीजी का विधानसभाक्षेत्र है.जब हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है तो उर्दू, फारसी की बात करना तो दूर की बात है. गुजरात राज्य की अंग्रेजों के जमाने की सबसे पुरानी हमारी गुजरात कॉलेज में हिन्दी ही नहीं उर्दू फ़ारसी भाषायें भी सिखायी जाती हैं.
जिन विद्वान के.का.शास्त्री के नाम पर इस कालेज का नामकरण संस्कार हुआ है ये वे संस्कृत गुजराती हिन्दी के प्रकांड पंडित थे. हिन्दी भाषा को बेहद प्यार करते थे मेरा उनसे कई बार मिलना हुआ था. कल रात स्वप्न में उनकी स्वर्गीय आत्मा ने मुझसे कहा वत्स मैं इस दुनियां में होता तो हिन्दी के साथ कॉलेज की आचार्या के इस रवैये की सीधी शिकायत मुख्यमंत्रीजी से करता और हिन्दी के साथ उर्दू,फारसी भाषाओं को भी शुरू कराता. तुम कुछ करो वत्स. मैंने कहा मैं क्या कर सकता हूँ मैं एक हिन्दी के अध्यापक के नाते लेख ही लिख सकता हूँ.
मणीनगर के गरीब तबके हिन्दू मुसलमान बाहर से ही शानदार बिल्डिंग को हसरतों से देखते हुए गुजरजाते हैं उनकी कोई सुनने धुनने वाला नहीं.मुख्यमंत्रीजी ने अपने इस विधान सभा क्षेत्र में गरीबों खासकर आमलोगों को अपने विस्तार में पढ़ने की तमाम सुविधा मिले इस हेतु से सरकारी बी.बी.ए.कॉलेज,सरकारी ऑर्टस कालेज,सरकारी सायंस कॉलेज,सरकारी लॉ कॉलेज केरियर डेवलपमेंट सेन्टर जैसी शाखायें खोली.पर इसमें हिन्दी उर्दू भाषायें बेरहमी से मारी गयी.

जिस हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने पूरे भारत में अलख जगायी. कच्छ के महाराजा ने कच्छ में प्राचीन समय में ब्रजभाषा की पाठशालायें खोली, तत्कालीन समय में हिन्दी सीखने लोग गुजरात आते थे. गुजरात के कवि दयाराम गुजराती के साथ ब्रजभाषा के प्रकांड विद्वान माने गये है. उनकी दयाराम सत्सई उनकी अनुपमकृति है. आज उसी हिन्दी को गुजरात सेनिष्काषित किया जा रहा है. स्कूलों में हिन्दी जो दो वर्ष पूर्व गुजराती के साथ अनिवार्य विषय के रूप में सिखायी जा रही था उसे हटा दिया गया है अपनी बिटिया को कक्षा 11 कोमर्स में प्रवेश दिलाने पर पता चला उसे हिन्दी नहीं मिल सकती वह तो बंद हो गयी.
गुजराती कंपलसरी मिलेगी हिन्दी नहीं. वह मेरी तरफ दर्द से देख कर रह गयी. बेटी के गुजराती में 78 अंक हिन्दी में 75 अंक. मैंने दोनो विषय पढ़ाये थे अंग्रेजी माध्यम तो उसका था ही वह मन मसोस के रह गयी.
और जब कॉलेज में अपने हिन्दी विभाग में बैठा था तो कालेज की प्यून वृद्धा ने आकर मुझ पर कई सवाल दाग़ दिये उसने कहा मेरी बेटी सुनीता को आपने पढ़ाया उसने हिन्दी से बी.ए.में फर्स्टक्लास अंक प्राप्त किये अभी उसने एम.ए.में 58 प्रतिशत अंक प्राप्त किये.बताओ वो क्या करे रा्ज्य में से स्कूलों से हिन्दी हटा दी गयी बी.एड.कर के क्या करे. कॉलेज में रिटायर्ड अध्यापकों को पढ़ाने के लिए बुलाया जा रहा हैं नयी भर्ती बंद है मेरी बेटी क्या करे उसने कहा है कि मेरे हिन्दी डिपार्टमेंट के हेड डॉ.भदौरिया साहब
से पूछना उन्होंने मुझे बी.ए. में हिन्दी पढ़ाया है.
अपने सत्रह साल के हिन्दी पढाने के केरियर में इन सवालों के जबाब मुझे देने होंगे नहीं सोचा था.उस कर्मचारी महिला ने ये भी कहा कि मैने आपलोगों पानी पिलाकर आप लोगों के डिपार्टमेंट में झाड़ू लगा कर मेरी बेटी को पढ़ाया कि वो कुछ आगे बढ़े जो मैनें किया वो उसे न करना पड़े. उसे राष्ट्रभाषा पढ़ने को बड़ा शौक था. अरे गुजराती विषय रखा होता तो स्कूल में तो नौकरी मिल जाती.
वो घर पर रोती रहती है साहब हिन्दी पढ़ कर अच्छे अंक लाकर वो क्या करे. मैं दुबारा आपके पास इन सवालों के जबाब लेने आऊँगी आप सोचके रखना. मैं चुप था कुछ बोल न सका.

गुजरात मे हिन्दी की दुर्दशा के जिम्मेवार वे तमाम हिन्दी के शिक्षक हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ाकर आश्वस्त हैं किराज्य की स्कूलों से कॉलेजों से हिन्दी बिल्कुल निकल जाये तो अब उन्हें चिन्ता नहीं स्वैच्छिक निवृत्ति ले कर पेंशन पर गुज़ारा कर लेंगे.

हमारी रही सही कसर सुब्ह गुजरात युनिवर्सिटी की विभागाअध्यक्ष डॉ.रंजना अरगडे ने पूरी कर दी उन्होंने कहा मैं सुब्ह सुब्ह आपके चिंतनकक्ष में गुजरात में हिन्दी के साथ होने वाले सौतेले व्यवहार की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ.
कि आप अब तक चुप क्यों हैं.
अब हम क्या करें सब को ऐसा लगता है कि हम कुछ कर सकते हैं हम तो सिर्फ बांस पर चढ़ के इतना ही कह सकते हैं कि भाई हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है उसे भी कोने मे पड़ा रहने दो अंग्रेजी के साथ खूबचूमाचाटी करो हनीमुन मनाओ, पर इस गरीब हिन्दी पर ज़ुल्म मत करों मेरे दाताओ,भाग्य निर्माताओ. इस गरीब हिन्दी दुखियारी की बददुआयें मत लो. जो हिन्दी को प्यार नहीं करते वे हिन्दुस्तान को कैसे करेंगे. मैं तो राज्य के मुख्य मंत्रीजी से निवेदन कर सकता हूँ कि वे इस वर्ष अपनी सरकारी कॉलेज मे हिन्दी के साथ उर्दू फ़ारसी भाषाओं को शुरू कराने का आदेश देकर अपने अन्यभाषाओं के प्रति प्रेम का आम विधानसभा क्षेत्र के गरीब हिन्दू मुसलमानों को प्रतीत करायें पर कॉलेज की आचार्या गीता पंड्या कोई आ ही नहीं रहा कि रिपोर्ट देकर हिन्दी उर्दू स्वाहा कर देंगी. मैं इस नामांकित कालेज में अपनी सेवायें देने को तैयार हूँ. वर्षो से प्रिंसीपल के प्रमोशन की फाइल जो अटकी पड़ी है इंचार्ज प्रिंसीपल से काम चल रहा है जब मुख्यमंत्री के विधान सभा क्षेत्र की सरकारी कॉलेज में रेग्यूलर प्रिंसीपल नहीं तो बाकी का क्या हाल होगा.
हम तो सबको सन्मति दे भगवान अल्लाह ईश्वर तेरे नाम की प्रार्थना कर सकते हैं.
आमीन.
डॉ.सुभाष भदौरिया अध्यक्ष हिन्दी विभाग
गुजरात आर्टस सायंस कॉलेज अहमदाबाद. ता.22-6-08 समय-2-00PM















Wednesday, June 11, 2008

सिपैया गोली मार गये हाय मोरी अम्मा.









सिपैया गोली मार गये हाय मोरी अम्मा.
हम बापों से ही क्या कम परेशान थे कि राजस्थान में अम्मा ने भुनवा डाला. मारो मारो जितना मारना है मारो पर महारानीजी मरने का रेट तो डिक्लेर करो. खाने,पीने,सोने-सुलाने के दाम बड़े फिर मारने की भी तो कोई कीमत आँको पर नहीं जब दिल्ली के स्टोक चेन्ज से भाव खुलेंगे फिर राजस्थान का रेट पता चलेगा. हाल में हैदराबाद में भी तो ऐसा हुआ था. मस्जिद में बम्ब बिस्फोट में तो मरे ही सिपैयों ने भी जो ताक ताक कर मारे उनका भाव दिल्ली से खुला फिर राज्य ने कीमत घोषित की. पर लगता है राजस्थान का घाटे का बजट है सो आशा कुछ कम ही नज़र आती है.
ये सिपैये और इनके आला अफ्सर चोर लुटेरों के पाँव चाटें, तस्कर बदमासों को बहिना बेटी ब्याहें, ककुर्मी नेताओं की पिछाड़ी अपनी जीभ से साफ करें. आतंकवादियों को देखकर पाखाने में छुप जायें पर लाचार निहत्थे किसानो, मजदूरों,मुसल्मानों,हिन्दुओं को गोली से भूजने में इन्हें महारथ हांसिल हैं. माना सब ऐसे नहीं है पर अधिकतर ऐसे हैं उनका क्या करें. ये भूल जाते हैं कि जिन पर ये गोली चलाते हैं वे कोई दूसरे नहीं इन्हीं के मुल्क के लाचार बेबस जुल्म के शिकार लोग हैं जो अपने हक के लिए बहरे कानों को सुनाने की कोशिश में जान से हाथ धो बैठते हैं.
सामने गुर्जर किसानों की लाशें पड़ी हैं गुजरियां चीख मार मार कर बिलख बिलख कर रो रहीं है उनके रूदन से आसपास के इलाके हिल रहे हैं पर दिल्ली की अभी नींद नहीं टूटी.उनका कल्पान्त मुझे यहाँ अहमदाबाद तक सुनाई दे रहा है.पड़ोसी जो ठहरा.
गैया रोये, बछिया. रोवें बैला भइया.
पानी के बदले में गोली कोइ न आय बचैया.
गद्दी पर बैठी अम्मा ने मुश्किल कर दिया जीना.
हत्यारिन हाय राम बड़ा दुख दीना.
लाशें पड़ी गुर्जर की देखो रोवें सारी गुजरियां.
कहाँ छुपे बैठे हो जल्दी आओ तुम्हीं संवरिया.
बैरी नागिन नें पिया डस लीना
पापिन अम्मा ने हाय राम बड़ा दुख दीना
और फिर क्या था संवरिया ही नहीं उनकी पूरी सेना सड़कों पर उतर आयी. समय ठहर सा गया है, इतिहास बताता है गुर्जर जाति अपने शौर्य और शक्ति की मिशाल रही है
ये अपनी पर आ जाये तो जान दे भी दे और ले भी ले. उनका खून पानी नहीं कि बहा दो और पत्ता भी न डोले. आज दिशायें डोल रही हैं. रास्ते ठप्प सब कुछ थम सा गया है. यदि सच्चे दिल से उनसे माफी माँगी जाय उनकी बात सुनी जाय तो वे शान्त हो सकते हैं. पर इतनी फुरसत किसे है सब तमाशा देख रहे हैं.
दिल्ली में बैठी बड़ी अम्मा इस खेल पर नज़र रखे हुए हैं. उनके कमान्डर राजस्थान पहुँच चुके हैं वे इस आग में और पिटरोल डालेंगे. मौका अच्छा है सबको अपने हिसाब .चुकता करने हैं चाहे घर के हों या बाहर के राजस्थान की अम्मा को सोचना चाहिए.
लोग सोचते थे कि बापों का राज तो देखा उसमें मरे कटे जले.अब अम्माओं पर भरोसा किया कि वे ममता से भरी होंगी वे दुख दर्द समझेंगी. पर सारा गणित ग़लत निकला. अभी तो वे दो चार ही हैं जब उनका कोटा पूरा हो जायेगा तब तो वे गोली नहीं बम्ब बरसायेंगी. दुख की बात तो ये है कि हम इन अम्मा बापों को पहिचानते हुए भी इनके हत्थे बने हुए हैं और हम आपस में एक दूसरे की जड़े काटने पर तुले हुए हैं. चाहे वे गुर्जर हों मीना हों हिन्दू हों मुसल्मान हों कोई फर्क नहीं पड़ता.
इन अम्मा और बापों के खेल में सहना आम आदमी को ही है. कभी धर्म के नाम पर ज़िन्दा जलाने का खेल, कभी जाति के नाम पर गोलियों से भूनने का खेल.राजनीति के इस शतरंज के खेल में मरना हम गधे घोड़ो को ही है. इस खेल में चाहे राजा हो या रानी उन्हें सिर्फ मात ही मिलती है.
डॉ.सुभाष भदौरिया. अहमदाबाद.




































Thursday, June 5, 2008

मैं ख़यालों मैं महक जाऊँगी.

ये ग़ज़ल मर्हूम आरुषि के नाम पूरी शिद्दत और ख़ुलूस के साथ उसी की मुँह ज़बानी.
ग़ज़ल
तुमको हर सिम्त नज़र आऊँगी.
पापा मम्मी तुम्हें रुलाऊँगी .

तब्सिरे मौत पे हुये मेरे,
ज़िंदगी क्या थी मैं बताऊँगी.

बंद कमरों के घुप अँधेरों में,
क्या पता था की भटक जाऊँगी.

रौशनी बन गयी मेरी दुश्मन,
इस ख़ता पे ही मारी जाऊँगी.

जीते जी चाहतों को तरसी थी,
बाद मर के भी तरस जाऊँगी.

दोस्तो तुम को मिस करूँगी मैं,
अपना दुखड़ा किसे सुनाऊँगी.

अपना अपना नसीब है यारो,
गीत ये ही मैं गुन-गुनाऊँगी.

चाहने वालो याद कर लेना,
मैं ख़यालो में महक जाऊँगी.

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.05-06-08 समय-07-45-AM.








Wednesday, June 4, 2008

पीते भी नहीं हरदम तौबा भी नहीं करते.

ग़ज़ल
वे अपनी ज़फ़ाओं को छोड़ा भी नहीं करते.
हम अपनी वफ़ाओं को रुस्वा भी नहीं करते.

मौसम के तकाज़ों पे रखते हैं नज़र हम तो,
पीते भी नहीं हर दम तौबा भी नहीं करते.

हमने जो ज़रा चक्खी सब शोर मचाते हैं,
छिप छिप के पियें वाइज़, चर्चा भी नहीं करते.

तुमने जो चुभाये हैं नश्तर जो मेरे दिल में,
बदला भी नहीं लेते, भूला भी नहीं करते.

रिश्तों को निभाते हैं हम खुद को सताते हैं,
गुस्ताख़ नशेमन को, तन्हा भी नहीं करते.

औरों पे इनायत है, बस हमसे शिकायत है,
हम ख़ाक नशीनों को पूछा भी नहीं करते.

हम अपने अँधेरों में करते हैं गुज़र अपनी,
बिजली से उजालों को मांगा भी नहीं करते.

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.05-06-08 समय-09-00-AM.





Friday, May 23, 2008

मुझको उलझाके वो भी उलझेगा.

ये ग़ज़ल नीरज एवं राकेशजी जैसे कद्रदानों की नज़र है जिनकी कल लिखी गज़ल की टिप्पड़ियों ने आज मुझसे ये ग़ज़ल पोस्ट करवाली.
नेट के बेमुरव्वत पाठकों को क्या कहूं जिन्हें हसीन फुलझडियों में ही सबकुछ नज़र आता है भैरा के गिरते हैं कमबख्त उनकी पोस्टों पर हें हें बहुत अच्छा लिखती हैं आप.हमें एक बार
एक मित्रने सलाह दी थी कि तुम अपनी तस्वीर हटाकर किसी कमसिन ज़ुहरा जबीं की तस्वीर लगा दो फिर तुममें नयी बात नज़र आयेगी उनको.
पर फ़रेब हमारी फितरत में ही नहीं धोका खाना तो आता है धोका देने के इल्म से महरूम हैं अब तक.

ग़ज़ल
मामला इस तरह न सुलझेगा.
मुझको उलझा के वो भी उलझेगा.

नाज़ हमने उठाये हैं तेरे,
हम न होंगे तो कौन पूछेगा.

हम तो मारे गये वफ़ा करके,
बेवफ़ा को कहां ये सूझेगा.

दो-दो नावों पे पांव रखता है,
देखना ऐक दिन वो डूबेगा.

सर कलम भी करोगे तुम मेरा,
धड़ मेरा धड़ है वो भी जूझेगा.














Thursday, May 22, 2008

रोज़ डसती है ज़िन्दगी हमको.

ग़ज़ल
रोज डसती है ज़िन्दगी हमको.
खा गयी उसकी दुश्मनी हमको.

हम किनारों पे बहुत अच्छे थे,
साथ ले डूबी इक नदी हमको.

सब ने पत्थर समझ के ठुकराया,
काश मिलता वो जौहरी हमको.

वार करते हैं सिर्फ अपने ही,
आसरा देंगे बाहरी हमको.

प्यास ऐसी कि क्या कहें तुमसे,
ले गयी दूर तशनगी हमको.

ख़ुदकशी हसरतों ने करली है
ज़िन्दा रक्खे है दोस्ती हमको.

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.23-05-08 समय-10-55-AM.







Wednesday, May 21, 2008

हमको मरवाते हरामी साले.











ये तस्वीरें 13मई २०० ८ जयपुर में हुए विस्फोटों की हैं जो बी।बी।सी।पर उपलब्ध हुई हैं। ये ग़ज़ल इसी पसमंजर की है.
ग़ज़ल
हमको मरवाते हरामी साले.
हैं अमीरों के ये हामी साले.

लाशें सड़कों पे बिछी हैं देखो,
चैन से सोते इमामी साले.

बैठे संसद में तमाशा देखें,
कितने बुज़दिल हैं ये नामी साले.

दोगलों की ही अदाकारी से,
शान से घूमें इनामी साले.

अपने वोटों की फिकर है इनको,
देते गुंडों को सलामी साले.

सच को शूली पे चढा देते हैं,
झूट की करते गुलामी साले.,

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.22-05-08 समय-10-40-AM.