सोमवार, 30 मार्च 2015

छोड़ जाने की बात करते हो. दिल दुखाने की बात करते हो.

ग़ज़ल
छोड़ जाने की बात करते हो.
दिल दुखाने की बात करते हो.

तुम कहानी हो क्या बताओ जो ?
भूल जाने की बात करते हो.

सीख लेना हमारे बिन जीना ,
आज़्माने की बात करते हो.

हम तो रोना भी भूल बैठे हैं,
मुस्कराने की बात करते हो.

अगले जन्मों में फिर मिलेंगे हम,
क्यों बनाने की बात करते हो.

दिल की राहों में बहुत जोख़म हैं ,
दिल लगाने की बात करते हो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.30-03-2015




सोमवार, 23 मार्च 2015

मैं पागल था मगर इतना नहीं था.

ग़ज़ल

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था.
मैं पागल था, मगर इतना नहीं था.

समन्दर से निकल आया मैं बचकर,
तेरी आँखों में जब डूबा नहीं था.

पुकारा ना मेरी खुद्दारियों ने,
तुझे अय दोस्त मैं भूला नहीं था.

मैं पहुँचा रूह तक माना ये तूने,
जहां पहले कोई पहुँचा नहीं था.

चला बाज़ार में मैं कुछ दिनों तक,
मैं सिक्का तो मगर खोटा नहीं था.

तलाशेंगे मुझे खो जाने पर ये,
जो कहते हैं कि मैं अच्छा नहीं था.

ये माना सांसें चलती थी ये मेरी,
मगर ये सच कि मैं ज़िन्दा नहीं था.

सभी ने देखा मुझको बाहरी ही,
किसी ने भीतरी देखा नहीं था.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.२३-०३-२०१५

बुधवार, 18 मार्च 2015

उदास हैं तो उदासी का कुछ सबब होगा.

ग़ज़ल

उदास हैं तो उदासी का कुछ सबब होगा.
तू ही बता दे कि दीदार तेरा कब होगा.

अभी उम्मीद की थोड़ी सी किरन बाकी है,
मरे जो प्यासे तो फिर देखना ग़जब होगा.

खुली रहेंगी मेरी आँखें बाद मरने के,
तेरी ही चाह, तेरा नाम ज़ेरेलब होगा.

गुनाह मैने तो अपने सभी क़बूल किये
सफ़ेदपोश कभी तू भी तो तलब होगा.

वो ताज़ो तख़्त को हँसकर के छोड़ने वाला,
ज़रूर आशिकी उसका यही मज़्हब होगा.

इसी ख़याल ने रक्खा है मालामाल मुझे,
कहीं पे देखना अपना भी कोई रब होगा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-03-2015




रविवार, 1 मार्च 2015

अच्छे दिनों ने बीते दिनों की याद दिला दी.


ग़ज़ल

अच्छे दिनों ने बीते दिनों की याद दिला दी.
ख़ासों को खुश किया है तो आमों को सज़ा दी.

पत्थर को पूजने का ये अंजाम हुआ है
अपना ख़याल ऱखने की हमको है  सलाह दी.

लौटाना अय खुदा तू सलामत मेरे घर पे,
मां-बाप ने घर निकले ये बेटी को दुआ दी..

छीनेगा अब जमीन भी मुफ़लिस की बची जो,
इस फिक्र ने गरीब की अब नींद उड़ा दी.

गंगा को साफ करने जो निकला था सरेआम,
उम्मीद की जो अर्थी थी गंगा में बहा दी.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात 01-03-2015




शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल्ली तो गयी अब की गुजरात संभालो अब.



ग़ज़ल

आईनों पे इस तरह कीचड़ ना उछालो अब.
दिल्ली तो गयी अब की, गुजरात सँभालो अब.

उड़ना ये हवाओं में, अब बंद करो साहब,
बाकी जो बची थोड़़ी, उसको ही बचालो अब.

अंबाणी, अदाणी की यारी ये डुबो देगी,
मज़्लूम व मुफ़्लिस की बेहतर है दुआ लो अब.

कोख़ो को यहां माँ की, इंडस्ट्री बतायें जो,
गुस्ताख़ ज़बानों को महफ़िल से निकालो अब.

डस लेंगे तुम्हें इक दिन कुछ होश करो अब भी,
आस्तीन के सांपों को यूँ घर में न पालो अब.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-02-2014

रविवार, 25 जनवरी 2015


ग़ज़ल

जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आन बान रखते हैं.

शब्द भेदी हैं हमको पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.

वैसे तो हम ज़मी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखते हैं.

दोस्तों पर तो जां छिड़कते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.

डूब जाओगे उलझने वालों,
समन्दरों सा उफान रखते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.25-01-2015



सोमवार, 5 जनवरी 2015

सर हमारा तो अभी बाकी है.


ग़ज़ल

हाथ काटे हैं ज़बां काटी है.
सर हमारा तो अभी बाकी है.

दूऱ फेका है शहर से उसने,
तेरी ख़ुश्बू अभी तो आती है.

चाहे जितने तू सितम कर ज़ालिम,
ग़म उठाने का दिल तो आदी है.

एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो,
तोप पर बैठी गुन गुनाती है.

तुम जो आओ तो कोई  बात बने,
सूनी- सूनी ये दिल की घाटी है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 05-01-2015


बुधवार, 31 दिसंबर 2014

सोच कर तेरे बारे में हम क्या करें.



ग़ज़ल

सोच कर तेरे बारे में हम क्या करें.
बीती बातों का अब छोड़़ो ग़म क्या करें.

रोज़ होता नहीं दिल का किस्सा बयां,
रोज़ आँखों को हम अपने नम क्या करें.

मोम के वो नहीं जो पिघल जायेंगे,
अपने पत्थर के हैं इक सनम क्या करें.

साथ तूफां में तो सब निभाते नहीं,
सब में होता नहीं हैं ये दम क्या करें.

झूट की तो नवाज़िश हुई हर तरफ,
सच के हिस्सें में आये ज़ख़्म क्या करें.

जी में आता है सब शूट कर दें यहां,
हाथ में है मगर ये कलम क्या करें.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.31-12-2014


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

जाम अश्कों के हमने पिये किस तरह.


ग़ज़ल

जाम अश्कों के हमने पिये किस तरह.
होंट चुपचाप फिर भी सिये किस तरह.

जन्मदिन पर बधाई तो  देते हैं सब,
ये भी सोचो कि अब तक जिये किस तरह.

ज़ख़्म दो चार होते तो सह लेते हम,
ज़ख़्म पर ज़ख़्म सबने दिये किस तरह.

आँच आने न दी उस मुहब्बत को पर,
सारे इल्ज़ाम हमने लिये किस तरह.

एक ही अपने सीने में दिल था मगर,
लाख टुकड़े सभी ने किये किस तरह.


आज अपने जन्म दिन पर ये ग़ज़ल चाहने वालों की नज़र है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात.  ता. 05-12-2014






शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

वादा करके वो ज़ालिम मुकर जायेगा.


ग़ज़ल

वादा करके वो ज़ालिम मुकर जायेगा.
राह तक तक के हर दिन गुज़र जायेगा.


शीशा-ए-दिल से यूं दिल्लगी तू न कर,
हाथ से गर गिरा तो बिखर जायेगा.


और भी  उसकी गुस्ताख़ियां बढ़ गयीं,
हमने सोचा था इक दिन सुधर जायेगा.


तू भी पछतायेगा देख मेरी तरह,
ये नशा इश्क़ का जब उतर जायेगा.


घाव ताज़ा है तकलीफ़ देगा ही ये,
सब्र कर रफ़्ता ऱफ़्ता ये भर जायेगा.


डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात. ता.28-11-2014