रविवार, 16 जून 2019

ख़त तेरे फिर से जलायें बोलो.



ग़ज़ल

और क्या दिल को सतायें बोलो.
ख़त तेरे फिर से जलायें बोलो.

अब पहाड़ों ने हमें रोका है,
क्या तेरे ख़्वाब में आयें बोलो.

तुम को फुर्सत है कहां गैरों से,
गुल कोई हम भी खिलायें बोलो.

खूँन ज़ख़्मों से लगा है रिसने,
घाव ये किसको दिखायें बोलो.

तुमने मुँह फेर लिया है जब से,
हम ग़ज़ल किस को सुनायें बोलो.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-06-2019



रविवार, 7 अप्रैल 2019

हम चौकीदार खेलें, तुम चोर चोर खेलो.


ग़ज़ल

हम चौकीदार खेलें, तुम चोर चोर खेलो.
हम तुम को थोड़ा पेलें, तुम हम को थोड़ा पेलो.

कब किसने माल काटा, कब किसने सांप बोये,
कभी हमने तुमको झेला, अभी तुम भी हमको झेलो.

गुलशन के कपड़े  सारे सब मिल के हैं उतारे,
एक चड्डी जो बची है अब वो भी तुम भी लेलो.

दुश्मन को मज़ा आये, वो रोज़ मुस्कराये,
अब गंदगी ज़ुबा से इक दूजे पे उड़ेलो .

सीरी ज़बान किसकी ? है आनबान किसकी ?
अब नीम चड़े हैं ये मौसम के सब करेलो.

जिस पे करें भरोसा, वो ही हमें ठगे है,
प्यासे वतन की कौनउ ना प्यास अब बुझैलो.

डॉ. सुभाष भदौरिया  गुजरात ता.07-04-2016





मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

सीने ने आज छप्पन के काम कर दिया है

ग़ज़ल

दुश्मन के घर में घुस कर के नाम कर दिया है.
सीने ने आज छप्पन के काम कर दिया है.

टेलर है सिर्फ ये तो, पिक्चर भी देख लेना,
गुस्ताख़ियों कि उसको पैग़ाम कर दिया है.

ख़ामोशियों को अपनी वो मान बैठा बुज़दिल,
ज़िन्दादिली हमारी को आम कर दिया है.

हम चाहते थे रहना मिलजुल के मगर उसने,
चाहत को पर हमारी बदनाम कर दिया है.

अब ताज़ तख़्त क्या ये,सर भी वतन को हाज़िर,
सासों को दुश्मनों की अब जाम कर दिया है.
                  
डॉ.सुभाष भदौरिया ता.26/02/2109

                                                    

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

हाथ पर हाथ क्यों धरे बैठे ? इतनी कुर्षी से मुहब्बत क्यों है

ग़ज़ल

उनको सहने की ये आदत क्यों है ?
बुज़दिली उनकी शराफ़त क्यों है.

हाथ पर हाथ क्यों धरे बैठे ?
इतनी कुर्षी से मुहब्बत क्यों है ?

सांस की जगह रोकते पानी ,
ये मदारी सी करामत क्यों है. ?


जान हमतो वतन पे दे बैठे,
अपनी लाशों पे सियासत क्यों है ?

जो भी करना है आर-पार करो,
अपने दुश्मन पे रियायत क्यों है ?

घाटी जलती है अगर धू- धू के,
फिर करांची ये सलामत क्यों है ?


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.२२-०२-२०१९

रविवार, 30 सितंबर 2018

अब कितना रूलाओगे बोलो तो ज़रा हमको.

ग़ज़ल

अब कितना रूलाओगे बोलो तो ज़रा हमको.
फिर छोड़ के जाओगे बोलो तो ज़रा हमको.

सब लोग जुदाई का पूछे हैं सबब हमसे,
दिन ये भी दिखाओगे बोलो तो ज़रा हमको.

मुश्किल है बहुत मुश्किल, पत्थर का पिघलना भी,
कब होश में आओगे बोलो तो ज़रा हमको.

फुरसत ही नहीं मिलती, मिलने की तुम्हें हमसे,
फिर हमको बनाओगे, बोलो तो ज़रा हमको.

सूरत ये हमारी अब पहिचानी नहीं जाती,
आईना दिखाओगे बोलो तो ज़रा हमको.

हो जायें अगर रुख़सत, दुनियां से कभी हम जो,
फिर हमको मनाओगे बोलो तो ज़रा हमको.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.30/09/2018


शनिवार, 29 सितंबर 2018

या तो आ जाओ, या फिर हमको बुलाकर देखो.


ग़ज़ल


या तो आ जाओ, या फिर हमको बुलाकर देखो.
आशिक़ी चीज है क्या दिल को लगाकर देखो.

दूर ही दूर से मौज़ो को नहीं समझोगे,
लुत्फ़ लेना है समंदर में नहाकर के देखो.

दूरियां शौक़ से रक्खो है तुम्हारी मर्जी,
और भड़के नहीं कहीं आग दबाकर देखो.

और भी रूह में उतरेगी ये खु़श्बू मेरी,
तुम अगर चाहो तो ख़त मेरे जलाकर देखो.

कांच का जान हमें  धूल में फेका सबने,
'
हो अगर पारखी तुम हमको उठाकर देखो.


सारी रंगीनियां रिश्तों की ये उड़ जायेंगी,

वक्त की धूप में थोड़ा सा सुखाकर देखो.



डॉ. सुभाष भदौरिया ता. 29-09-2018




रविवार, 9 सितंबर 2018

दिल तवाइफ़ का कोठा था अपना कोई.


ग़ज़ल

उम्र-भर वो मेरा दिल दुखाते रहे.
हम ग़मों को गले से लगाते रहे.

दिल तवाइफ़ का कोठा था अपना कोई,
लोग आते रहे लोग जाते रहे.

ये अलग बात उसने सुना ही नहीं,
दर्दे-दिल तो बहुत हम सुनाते रहे.


यूँ अकेले में रोये बहुत फूटकर,
महफ़िलों में मगर मुस्काते रहे.


आग थी कोई हमको जलाती रही,
आग से आग हम भी बुझाते रहे.


ज़िंदगी क्या थी ये पूछिये मत हमें,
लाश कांधों पे अपनी उठाते रहे.


जिन के दिल मंदिर और मस्ज़िद हों उनके लिए ये ग़जल नहीं हैं उन्हें अगर नागवार गुज़रे तो वे यहाँ से शौक़ से तशरीफ़ ले जा सकते हैं. 
 साथ ही उपरोक्त तस्वीर देश के विभाजन पर बनी बेहद दर्दनाक फिल्म बेगमज़ान की है. इस विभाजन में इंसान कहलाने वाले लोग ही तबाह नहीं हुए वो खाकसार तवाइफ़ भी हुईं जिनका शुमार इंसानों में नहीं किया जाता.

 देश के  हुए भारत-पाकिस्तान का दर्द मेरा उस समय और बढ़ गया था जब   कॉलेज के छात्रों के प्रवास में गुजरात की समुद्री सीमा पर सटे कोटेसर  जाना हुआ था. 

सीमा सुरक्षा दल की चौकी के बोर्ड पर पढ़ा आगे जाना माना है. पता चला वहां से करांची  का मात्र आधे घंटे का सफ़र था. आगे का देश जो कभी हम सब का था वो पाकिस्तान हो गया था. न वो आ सकते ना हम जा सकते.


हमारे सियासतदानों का कितने पाकिस्तान बनाने का खेल अभी भी ज़ारी है इसमें कुछ इज़ाफ़ा भी हुआ है. अब तो इन सियासत दानों ने अपने सिंहासन बचाने के चक्कर में ख़ुद को ही सर्वोच्च समझ लिया है. हमें आपस में लड़ा आग लगाने वाले ये भूल जाते हैं- आग की आँख में बराबर है फूस का घर भी राजधानी भी. 

दीवार पर दीवार उठाने वाली किसी भी तामील के हक़ में मैं नहीं हूँ. मैं सेतु बनने और बनाने में विश्वास रखता हूँ और उस पर ही अमल करता हूँ. आप को अपने हक़ हैं जो भी करें, गुज़ारिश सिर्फ़ इतनी है लोक हित में आँखें खुली रखें.

डॉ.सुभाष भदौरिया तारीख- 09-09-2018


शनिवार, 4 अगस्त 2018

हम गले जो लगे आप घबरा गये, दूसरों को लगाओ तो कुछ भी नहीं.


ग़ज़ल

हम गले जो लगे आप घबरा गये,
दूसरों को लगाओ तो कुछ भी नहीं. 
बात गन की ज़रूरी हो जिस वक्त में,
 बात मन की सुनाओ तो कुछ भी नहीं.

आँख हमने जो मारी तो हँगामा क्यों,
खेल है सब सियासत को तुम जान लो,
खेल हम जो दिखायें तो तकलीफ़ क्यों
खेल तुम जो दिखाओ तो कुछ भी नहीं.

अब तो संसद में हैं हम मदारी सभी
एक पर एक हैं सारे भारी सभी, 
आँख हम जो नचायें तो हैरान हो,
देश को तुम नचाओ तो कुछ भी नहीं.

बाँट लें बाँट ले मिल के सारा सभी छाँट लें, 
छांट ले मिल के प्यारा सभी,
हम जो खायें तो ये शोर बर्पा है क्यों,
 माल तुम जो ये खाओ तो कुछ भी नहीं.


हिन्दू मर जायें सारे हमें क्या पड़ी, 
और मुस्लमां का तुम लो बना कोरमां, 
आग हम जो लगायें तो इल्ज़ाम क्यों
 आग तुम जो लगाओ तो कुछ भी नहीं.

ऐब पर मेरे हरदम ना सोचा करो,
आईना आप भी साब देखा करो, 
दाग़ दामन पे मेरे गिनाओ बहुत, 
दाग़ अपने छिपाओ तो कुछ भी नहीं. 

कोई मस्ला भले हल न हो हम से पर,
और मस्ले बढायें चलो मिल के हम, 
बांसुरी हम बजायें तो आफत बहुत 
गाल तुम जो बजाओ तो कुछ भी नहीं.

हैं ये मुर्दों का अब देश प्यारा बहुत 
हमने मिल कर के है इसको मारा बहुत, 
चूना हम जो लगायें तो बदनाम हों
 चूना तुम जो लगाओ तो कुछ भी नहीं. 

मछलियों की तरह फाँसते हैं इन्हें
लोग फिर भी नहीं हैं जाँचते हैं हमें,
जाल में हम फंसायें तो भड़काओ तुम 
जाल में तुम फँसाओ तो कुछ भी नहीं. 

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात तारीख- 04-08-2018

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018


ग़ज़ल

किसने किसने साथ है छोड़ा मत पूछो.
नीबू जैसा हमें निचोड़ा मत पूछो.

जिसको देख के जीते थे हम बरसों से,
उसने भी अब मुख को मोड़ा मत पूछो.

जिस्म का फोड़ा होता तो सह लेते हम,
जान ही लेगा रूह का फोड़ा मत पूछो.

जो भी आया, खेला खाया खूब यहाँ,
कैसा अपना दिल है निगोड़ा मत पूछो.

कुछ तकलीफें थी उसमें, कुछ मुझ में भी,
दोनों  में ही ऐब था थोड़ा थोड़ा मत पूछो.

    खेत में जिसने मिल कर लूटा मुनियां को,
मंत्री जी का है वो मोड़ा मत पूछो.

जिससे हमको बहुत उम्मीदें थीं लोगो,
वो भी निकला काग भगोड़ा मत पूछो.

चिड़िया का घर तोड़ के तुमने फेंक दिया,
तिनका तिनका उसने जोड़ा मत पूछो.


गधे का खा रहे दूध जलेबी अब देखो,
घास खा रहा बूढ़ा घोड़ा मत पूछो.



गले लगाकर आँख दबाये महफिल में,
वो भी निकला हाय छिछोड़ा मत पूछो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.03-8-2018




गुरुवार, 14 जून 2018

फिटनिश ही दिखानी है सरहद पे दिखाओ अब.


ग़ज़ल

हर रोज़ न सरहद पे बेमौत मराओ अब.
फिटनिश ही दिखानी है सरहद पे दिखाओ अब.

कश्मीर गया कब का जम्मू भी है जाने को,
आँखों पे पड़ा पर्दा बेहतर है हटाओ अब.

इस योग से दुश्मन तो समझेगा भला कैसे,
तुम पार्थ अगर हो तो गाँडीव उठाओ अब.

रूहों को शहीदों की तकलीफ़ पहुँचती है,
मुँहतोड़़ जबाबों का गाना तो न गाओ अब.

छीने जो कोई बेटा, सिंदूर उजाड़े जो,
शैतां को ज़रूरी है अब पाठ पढ़ाओ अब.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-06-20