बुधवार, 31 मार्च 2021

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.

                                                                         ग़जल

मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरूबा.

तेरे इश्क़ में, तेरी चाह में, मेरा दिल तो हो गया बावरा.


मेरे सारे पात हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया.

तू समन्दरों पे बरस गई, तेरी राह मैं रहा ताकता.


तुझे ये गुमां कि मैं बहुत खुश, तुझे ये गिला कि भुला दिया,

तेरी जुस्तजू मुझे आज भी, तुझे क्या ख़बर तुझे क्या पता.


मेरे हाथ भी हैं क़लम हुए, मेरी काट ली है ज़ुबा मगर,

मेरा सर अभी भी तना हुआ, वो तो कह रहा है झुका झुका.


अभी रूप का  बड़ा शोर है, अभी झूठ का बड़ा ज़ोर है.

अभी आइना है बिका हुआ, अभी सच बहुत है डरा हुआ.


अभी पास हूँ तो कदर नहीं, कभी खो गया मैं जो भीड़ में,

मुझे खोजता रह जायगा, कहीं हो गया मैं जो लापता.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात.

मंगलवार, 9 मार्च 2021

 

                  ग़ज़ल

तेरे बारे में अब सोचता भी नहीं.

और ये भी है सच भूलता भी नहीं.


तेरी तस्वीर तो देखता हूँ मगर,

पहले की तरह अब चूमता भी नहीं.


रूठने और मनाने के मौसम गये,

सोचकर मैं यही रूठता भी नहीं.


काट लेता हूँ तन्हाइयों का नरक,

बेज़ह हर जगह घूमता भी नहीं.


शाम का भूला लौटेगा इक दिन सुब्ह,

बस इसी आश पर मैं मरा भी नहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 09-03-2021

 

बुधवार, 13 जनवरी 2021

शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

                                                                            ग़ज़ल

 शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

ज़ुल्म  की कोई हद तो मुकम्मिल करो,  जिस्म से बात अब जान तक आ गयी .

 

मर गये मिट गये जो वतन के लिए, जिनके पुरखों ने दी थी शहादत यहां,

उँगलियां वो उठाते है औलाद पर, आंच अब अपने ईमान तक आ गयी.

 

स्याह रातों  में हम रोशनी के लिए, झोपड़ी भी जला बैठे अपनी यहाँ,

गाँव से फिर शहर, फिर शहर से सड़क, जां ये अब अपनी शमसान तक आ गयी.

 

अपनी तोपों के मुँह खोल दो तुम यहां,  हमको चिनवाओ दीवार में ग़म नहीं.

हक़ की ख़ातिर लड़े आखिरी सांस तक, जंग चौतरफा ऐलान तक आ गयी.

 

कितने मग़रूर तुम, कितने मज़्बूर हम, बेटे सरहद पे और बाप सड़कों पे हैं,

बेटियां दे रही हैं सहारा हमें,उनकी मां भी मैदान तक आ गयी.

 

आग की आँख में हैं बराबर सुनो, झोपड़ी हो महल हो  या मेअराज हों,

चौकियों की सुरक्षा से होते हुए दास्ता अब तो सुल्तान तक आ गयी.

 

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात. तारीख 13/01/2021

 

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

पत्थर जो उछाले थे सबने, घर उससे बनाया है हमने.


 पत्थर जो उछाले थे सबनेघर  उससे  बनाया है हमने.

 कांटे जो बिछाये  राहों मेंघर उससे सजाया है हमने.

 फौलादी  जिसे तुम समझे हो, मग़रूर जिसे तुम माने हो,

 आये जो कभी आँसू अपनेहँसकर के छिपाया है हमने.

 तीरों से बदन छलनी है मगरवे अपने शिकस्ता तीर गिने,

 हर वार पे दुश्मन के आगे  कदमों को बढाया है  हमने.

 वो जंग हो चाहे गलियों में, वो जंग हो चाहे सरहद पे,

 इंसा का लहू इंसा का ही है, ये राज़ भी पाया है हमने.

 लपटों औ धुओं की बातें करइल्ज़ाम लगाते हो हर दम,

 कुंदन की तरह अग्नि में बहुतखुद को भी तपाया है हमने.

 तुम जात धर्म की बातें करउलझाओगे कब तक सबको,

 मिल जुल के बढेंगे सब आगेरस्ता भी दिखाया है हमने.


 आज देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द मोदी जी के 70 वां जन्म दिन  है. ये ग़ज़ल उनकी उम्दा शख्शियत के नाम है. मैं उनकी रूह तक शब्दों के माध्यम से पहुँचा हूँ ये वे ही बता सकते हैं. वे गुजरात से क्या गये कि गुजरात की रौनक चली गयी. या यों कहें कि फिर उसके बाद चिरागों में रौशनी ना रही. गुजरात में उनका वांचे गुजरात कार्यक्रम बहुत ही लोकप्रिय हुआ था. किसी भी कार्यक्रम में मेहमान का स्वागत पुस्तक से करना उन्होंने सिखाया था. वे बताया करते थे कि किसी व्यक्ति के साथ रिश्ते की बुनियाद पुस्तकें होनी चाहिए.वे कहते थे गुजरातियो पढ़ो तुम्हें मेरी निंदा भी पढ़नी है तो छूट पर पढ़ो ज़रूर. मुश्किल को अवसर बनाने की कला में उन्हें महारथ हासिल है मोदी है तो मुमकिन है का नारा भी उन्हीं का है वे कठिन से कठिन निर्णय लेने में हिचकिचाते नहीं. जहां तक मेरी समझ है वे शांति के पक्षधर है इसी लिए पाकिस्तान जा कर उन्होंने सबको चौंका दिया था. चीन के राष्ट्रपति को भी अहमदाबाद झूले पे झुलाने से गुरेज़ नहीं किया. पर आज वही चीन सीमा पर नो लेन्ड मेन (जहां एक दूसरे की पेट्रोल जाती है)  घुस कर आँखें तरेर रहा है . हालांकि हमने भी जैसे के साथ तैसा कर के कुछ चोटियों पर बढ़त ले ली है. चीन को ये बहुत ही अखर रहा है. मोदी जी को जो जानते हैं उन्हें पता है वे दोस्ती दुश्मनी बखूबी निभाना जानते हैं. चीन की किसी भी गुस्ताख़ी का जबाब देने के लिए वे मौके की तलाश में हैं दोनों सीमाओं पर वे निर्णायक करेंगे. उनकी डिफेंस टीम बहुत ही असर दार है.

 एक उनका आध्यात्मिक पक्ष बहुत ही मजबूत है. मोदीजी  नवरात्रि व्रत बिना चूक रहते हैं खानपान पर बहुत ही  नियंत्रण है. योग से भी खुद को जोड़े हुए हैं तभी इतनी उर्जा से भरे रहते हैं. किसी एंकर ने उनसे जब  उनके स्वास्थ्य राज पूछा कि आप क्या खाते हैं तो उन्होंने हँसकर बताया था कि  हजारों किलो गाँलियां  जो  मैं  रोज़ खाता हूँ वो कोई दूसरा नहीं खाता होगा.अच्छे वक्ता के साथ व्यंगकार भी हैं. वे भावुक भी है उनके रुँधे गले को भी लोगों ने देखा है.

गुजरात से उनके जाने का बाद जो शून्यावकाश है वो कैसे भरे गतिमान गुजरात का आज हाल किसी से छिपा नहीं लोग परिवर्तन की आहट सुन रहे हैं. आज उनके जन्म दिन पर मैं उनके  स्वस्थ,दीर्घायु, त्वरित निर्णयवान   यशस्वी ,कठोर शासक बने रहने की  देवीमां से प्रार्थना करता हूँ

 

મને સદભાગ્ય કે શબ્દો મળ્યા તારે નગર જાવા,

    ચરણ લઈ દોડવા બેસું તો વરસોના વરસ લાગે મનોજ ખંડેરિયા) 

 धानपुर से  दिल्ली बहुत दूर है.

प्रिंसीपल डॉ. सुभाष भदौरिया सरकारी आर्टस कोलेज धानपुर जिला दाहौद गुजरात ता.17-09-2020.

Prin.dhanpurarts@gmail.com

 

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

इन दिनों नींद गायब बता क्या करें.



ग़ज़ल

इन दिनों नींद गायब बता क्या करें.
रतजगों की कहो अब दवा क्या करें.

तेरी यादों का अब ये न उतरे नशा,
और अब दूसरा हम नशा क्या करें.

हम को ख़ुद का पता ही नहीं आजकल,
जानकर उसका अब हम पता क्या करें.

बद-दुआओं का है कुछ असर इस तरह,
काम आती नहीं अब दुआ क्या करें.

एक ख़ता की मिली है सज़ा उम्र भर,
दूसरी और अब हम ख़ता क्या करें.

मेरा क़ातिल वही, मेरा मुंसिफ़ वही,
हमको मंजूर हर फैसला क्या करें.

जब वफ़ा का जहां में चलन ही नहीं,
हो गये हम भी अब बेवफ़ा क्या करें.

ख़ुद न दे, और औरों को देने न दे,
पूजकर ऐसा अब हम ख़ुदा क्या करें.

आँधियां हैं बुझाने को मचली हुईं,
अब बुझा, अब बुझा, ये दिया क्या करें.


डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.16-07-2020


बुधवार, 15 जुलाई 2020

मामला इस तरह न सुलझेगा.

ग़ज़ल

मामला इस तरह न सुलझेगा.

मुझको उलझा के वो भी उलझेगा.

खूब रच ले तिलिस्म तू झूटा,

एक दिन ये तिलिस्म टूटेगा.

सबने गिरवीं रखीं ज़ुबा अपनी,

हम ना बोले तो, कौन बोलेगा ?

साथ वो ही चलेगा अब मेरे,

घर तो क्या ख़ुद को भी जो फूकेगा.

शौक़ से काट ले तू सर मेरा,

जंग में धड़ भी मेरा जूझेगा.

हाथी, घोड़े, वज़ीर,सब रुख़सत,

शह बचाने की अब वो सोचेगा.

रफ़्ता रफ़्ता बढ़ेगी और कशिश,

और जितना वो ख़ुद को रोकेगा.

नाज़ हमने उठाये हैं तेरे,

हम  ना होंगे तो कौन पूछेगा ?

 

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.15-07-2020

 

 


रविवार, 12 जुलाई 2020

हमने खुलकर के मुहब्बत की है.


ग़ज़ल

हमने खुलकर के मुहब्बत की है.

हमने खुलकर के बग़ावत की है.

तेरी ख़ातिर हां तेरी ही ख़ातिर,

हमने ज़ख़्मों से भी उल्फ़त की है.

तुमको फ़ुरसत ही कहां ग़ैरो से,

हमने बस यूँ ही शिकायत की है.

तेरी बातों को भी तरसे बरसों,

तेरी चुप्पी की भी इज़्ज़त की है.

किसने,किसने, ये बताओ तो सही,

अपनी लाशों पे तिजारत की है.

आइने की भी तो हिम्मत देखो,

उसने पत्थर से अदावत की है.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.12-07-2020


रविवार, 24 मई 2020

पटरियों पे खिले हैं कमल क्या कहें.


पटरियों पे खिले हैं कमल क्या कहें.
                                                                       ग़ज़ल
संगेदिल आप हैं हाले दिल क्या कहें.
जब ग़ज़ल  ही नहीं तो ग़ज़ल क्या कहें.

सुनते आये थे कीचड़ में खिलते कमल,
पटरियों पे खिले हैं कमल क्या कहें.

आसमां पे बिठाये है वो ख़ास को,
आम सड़कों से भी बेदखल क्या कहें.

जो भी अमृत था सब देवता पी गये.
अपने हिस्से में छोड़ा गरल क्या कहें.

पहले थी ही बहुत ये कठिन ज़िंदगी,
और भी उसने कर दी सरल क्या कहें.

खोटे सिक्कों का इतना चलन हो गया,
छोड़िए अब असल की असल क्या कहें.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.24-05-2019

बुधवार, 6 मई 2020

कभी थाली बजाते हैं, कभी दीप जलाते हैं .


ग़ज़ल

रंग इश्क़ में हम तेरे क्या क्या न दिखाते हैं.
कभी थाली बजाते हैं, कभी दीप जलाते हैं .

कोरोना से पहल ही, ये भूख हमें मारे.
उपदेश तुम्हारे अब, कानों ना सुहाते हैं.

बेघर तो कभी के थे, रोज़ी भी गयी अब तो,
ख़ुदगर्ज़ वतन वाले हमको न बुलाते हैं.

सड़कों पे हमें देखो, ये भूख है ले आयी,
साज़िश है किसी के वे इल्ज़ाम लगाते हैं.

हैं पेट भरे जिनके, वे लोग न समझेंगे,
स्क्रीन पे जो आकर, अब गाल बजाते हैं.

है मौत बड़ी ज़ालिम पीछा नहीं छोड़ेगी,
शीशे के वदन वाले, पत्थर को सिखाते हैं.

ये ग़ज़ल उन मेहनत कशों के नाम जो अपने ही मुल्क में दर बदर हैं. घर में रहो जिनके घर हैं वे शौक से पहलू में बैठे रहें किराये के घर वाले क्या करें. मकान मालिक को क्या दें. सब देवता नहीं हैं. गरीब मज़्दूर  अपने वतन अपने गाँव से उम्मीद रखे हैं कैसे भी वहां पहुँच कर गुज़ारा कर लेंगे. पर मतलब परस्त वतन वाले हुक्मरान उन्हें बोझ समझकर मदद करने से कतरा रहे हैं.

उन्हें शराब बेचकर राजस्व कमाना है और जो घर में चैन से बैठे हैं उनके घर महाभारत करा के मज़े लेना है. वे पी के चाहे मरें या कोरोना फैला कर औरों को मारे पर उनका ख़ज़ाना भरें. बुढ्ढा मरे या जवान सरकार का चले काम.
दिल्ली के मुख्य मंत्री जी कह रहे हैं क्या करें जी. शराब नहीं बिकी तो तो सरकारी कर्मचारियों की तनखाह कहां से देंगे.

दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री भी शराबियों पर निर्भर हैं.उन्होंने भी मधुशालायें खोल दीं. सोसियल डिस्टेंस की ऐसी तैसी हो रही ले कोरोना दे कोरोना का खेल चालु हो गया.

पीने वाले भी सोचते हैं मरना ही है तो खा पी के मरें. मरते मरते 100 प्रतिशत कोरोना टेक्स दे कर देश के विकास में अपना योगदान देते जायें.

हमने ताली भी बजाई, थाली भी बजाई ,दीप भी जलाये, सरहद पे हमारे कमान्डिंग अफ्सर रेंक के आला अधिकारी शहीद हो रहे हैं. तो दूसरी तरफ फूल बरसाओ कार्यक्रम भी ज़ारी है. 

रही सही कसर शराब की दुकानों में लगी लाइनों ने पूरी कर दी. और शराबी पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए. वो चाहे कोरोना को हो या बेवफ़ा सनम का. शराब की कीमत दिल्ली में 70 प्रतिशत कोराना टेक्स के नाम पर वसूली जा रही हैं. पीने वाले कह रहे हैं हमसे 100 प्रतिशत ले लो पर मधुशाला खुली रखो. हम भी देश को बचाने में अपना योगदान देना चाहते हैं. सदके जावा पीने वालों के.

मंदिरों, मस्ज़िद, वाले अपने ख़जाने पर कुंडली मारकर बैठे हैं. उन्हें चाहिए कि लोगों लिए वे अपने खज़ाने खोलें. लोग ज़िन्दा रहे तो फिर भर देंगे. पर वे ऐसा नहीं करेंगें सारे धन को अपने साथ ले जायेंगे.
इस समय मरना गरीब आदमी का तो है ही पर उससे ज्यादा मध्यम वर्गीय लोगों का है जो सड़क पर भीख भी नहीं मांग सकते. सरकार की तरफ से आधार कार्ड के आधार पर राशन भी नहीं मिलेगा. 
सब के रोज़गार बंद है वे क्या करें. कब तक बोलो कब तक यूं ही पहलू में बैठे रहें. पर हमारे जैसे जो सरकारी अधिकारी हैं हेडक्वाटर नहीं छोड़ सकते. पहलू में बैठे रहना हमारी किस्मत में कहां.
परिवार से दूर ओन ड्यूटी कोलेज कभी कभी जाना पड़ता है बाकी दिनों ओन लाइन से काम करना पड़ता है.
 हमारे कमरे एक छिपकली कभी कभी दीवार पर नज़र आती है उसे भगाने की को जी नहीं करता. वही हमारी तन्हाईयों की  एक मात्र चश्मदीद गवाह है. 
कोरोना ने हाय राम बड़ी दुख दीना.लोक डाउन ने सब सुख छीना. 

दिल्ली जैसी बात हमारे गुजरात में कहां शराब की तो बात जाने दो पानी मिले वही नसीब है.

तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं.
ऐसी तन्हाई का जबाब नहीं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 06-05-2020



शुक्रवार, 13 मार्च 2020

तुम से लाख बहतर है प्यारा प्यारा कोरोना.


ग़ज़ल

और भी ये फैलेगा देश में ये कोरोना.
एक दिन ही रो लेंगे रोज़ रोज़ क्या रोना.

मुर्दे को जलाये वो, ज़िन्दा तुम जलाते हो,
तुम से लाख बहतर है प्यारा प्यारा कोरोना.

मौत की तबाही से क्यों हमें डराते हो.
जो भी आय सह लेंगे, जब भी हो जो भी होना.

खूँन के ये दाग़ों को कब तलक छिपाओगे,
और भी नज़र आयें, हाथ का ये क्या धोना.

राजधानी में जब से संत बस गये लोगो,
आग आसमां से बरसे, अपनों को पड़ा खोना.

आज कल किसी को मोबाइल करो. कोरोना वायरस से बचने के लिए सलाह शुरु हो जाती है मसलन हाथ किसी डिटरजन से धोओ, दूरी बना के रखो, तंग आ गये हम और ये ग़ज़ल हो गयी.
कोरोना में मौत आहिस्ता आहिस्ता बड़े प्यार से होगी ऐसा ज्ञानी बता रहे हैं मोबाइल हो या टी.वी. सब जगह कोरोना की पेलम पेल. कौन जाने कब इसकी चपेट में आ जाये. मैं मानता हूं ज़िन्दा जलने में ज़्यादा तकलीफ़ होती होगे जो जले वही जानते होंगे.
इसलिए मेरे देश के लोगो कोरोना से मत डरो. 
कोरोना का मुकाबला करना सीखो गुलामी नहीं.

जिस धज़ से कोई मक़्तल को गया वो शान सलामत रहती है.
ये जान तो आनी जानी है इस जान की परवाह क्या कीजे.

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.13-03-2020