बुधवार, 6 दिसंबर 2017

जान देकर के शान रखते हैं.

ग़ज़ल
जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आन बान रखते हैं.

शब्दभेदी हैं हमको पहिचानो,
दिल में तीरों कमान रखते हैं.

दोस्तों पे तो जां छिड़कते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

वैसे तो हम जमी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखते हैं.

यूँ तो हम हर अदब से वाकिफ़ हैं,
हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं.

डूब जाओगे उलझने वालों,
समन्दरों सा उफान रखते हैं.
डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.०६-१२-२०१७


शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

इस बार तो गुजराती, नहीं हाथ में आने के.

ग़ज़ल
अब भेष धरो लाखों, चुंगल में फँसाने के.
इस बार तो गुजराती, नहीं हाथ में आने के.

कभी गंगा बुलाती है, कभी बाबा बुलाते हैं,
आने को हैं दिन अब तो, धूनी के रमाने के.

झोले को सिला करके तैयार फकीरा हो ,
सेल्फी की जगह आये, दिन चिमटा बजाने के.

हमने तो तुम्हें साहब, पलकों पे बिठाया था,
हम काम फकत आये बस चूना लगाने के.

चिड़ियों को फिक्स दाना, बाजों को यूँ दुलराना,
हैं राज़ सभी जाने उस उस काले खजाने के.

आहें ये गरीबों की, खाली नहीं जाती हैं,
अब लेना मज़े तुम भी, दिल सब के दुखाने के.

अपनों ने ही अपनों की, हालत ये है कर डाली,
अब लोग यकीं करते, बाहर के घराने के.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.28-10-2017



रविवार, 15 अक्तूबर 2017

लोगों की लुगाई ने घर ऐसे संभाला है, शक्कर न मिली गुड़ की फिर चाय बनाली है.

ग़ज़ल

ये कैसा उजाला है ये कैसी दिवाली है.
सब्जी भी हुई गायब खाली मेरी थाली है.

हमने तो कटोरी में डुबकी को लगा देखा,
है दाल बहुत मंहगी और जेब भी खाली है.

लोगों की लुगाई ने घर ऐसे संभाला है,
शक्कर न मिली गुड़ की फिर चाय बनाली है.

अब ताज संभालों तुम, मुश्किल है बहुत मुश्किल,
सड़कों पे गरीबों की पगड़ी जो उछाली है.

दो चार ही दिन में तुम खेले हो करोड़ों में,
मेहनत से नहीं तुमने तिकड़म से कमाली है.

अब सर को पकड़ कर के रोये हो बहुत लोगो,
जब नीम हकीमों से तुम ने ही दवा ली है.

इस बार वो आयें तो छलने को हमें फिर से,
हमने तो बदलने की अब राय बना ली है.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.15-10-2017


शनिवार, 30 सितंबर 2017

ट्रेन बुल्लट चलाने का वादा करें, पुल बनाने की जिनको न फ़ुर्सत मिली.

ग़ज़ल
ट्रेन बुल्लट चलाने का वादा करें, 
पुल बनाने की जिनको न फ़ुर्सत मिली.
हादसा हो कहीं भी मेरे मुल्क में, 
मुझको ऐसा लगे गाज़ मुझपे गिरी.

आइनो पे ना पत्थर उछालो बहुत, 
वक्त है साब इनकी हिफाज़त करो,
नोट बंदी से पहले परेशान थे, 
मर गये और जी.एस. टी है जब से लगी.

उड़ रहे आसमां उन्हें क्या ख़बर,
 कितने खड्डे जमी पर हुए आजकल,
जिनको लोगों ने बर्ख़ास्त था कर दिया ,
हमसे कहते हैं ढूँढ़े हैं हम नौकरी.

झूट का उसने सिक्का चलाया बहुत,
 चाँद हाथों में सबको दिखाया बहुत,
सच कहा जब भी हमने उसे प्यार से,
 क्या करें गर उसे है जो मिर्ची लगी.

दर्द होता है क्या पूछिये उनसे ये, 
झोंक दी उम्र परिवार के वास्ते,
ग़ैर होता तो सह लेते ये दर्द हम, 
अब तो घर के ही कहने लगे बाहरी.

शौक़ से झोपड़ीं तुम जलालो भले, 
आँधियां उठ रही हैं ये चारों तरफ,
आग पहुँचेगी महलों तलक देखना, 
आँख गर वक्त पर आपकी ना खुली.

इक गुलामी से हम दूसरी में फँसे,
 वो अँधरे ही बेहतर थे इस से भला,
इन उजालों को लेकर के हम क्या करें,
 छीन ली जिसने आँखों की सब रोशनी.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.30-09-2017 गुजरात.








शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

फेसबुक पर ही मिल लीजिये.

ग़ज़ल

फेसबुक पर ही मिल लीजिये.
फूल बन कर के खिल लीजिये.

जान भी देंगे फिर बाद में,
पहले टूटा सा दिल लीजिये.

आँख से सब समझ जायेंगे,
आप होटों को सिल लीजिये.

रफ़्ता रफ़्ता करीब आयेंगे,
चाहे जितने उछल लीजिये.

ज़िन्दगी तो संभलने को है,
आज थोड़ा मचल लीजिये.

वो न बदलेगा ज़ालिम कभी,
आप अपने बदल लीजिये.

राहें बदनाम हैं इश्क़ की,
तुम भी चुपके निकल लीजिये.

डॉ. सुभाष भदौरिया. गुजरात ता.29-09-2017


सोमवार, 25 सितंबर 2017

अच्छे दिनों का हमको,कोई जवाब दे दो.

ग़ज़ल
अच्छे दिनों का हमको,कोई जवाब दे दो.
नज़रें तरस रही हैं, कुछ तो हिसाब दे दो.

हम गदहे, कुत्ते, बिल्ली, मुर्गें हैं आपके ही ,
हिस्से के कुछ हमारे टुकड़े ही साब दे दो.

ये क्या सितम की लाठी, गोली है उनकी  किस्मत,
बेटी के हाथ तुमने कहा था किताब दे दो.

सच को कहेंगे हम तो, हो दौर झूट का वो,
चौराहे हमको चाहे फाँसी जनाब दे दो.
                  
   कुछ रौशनी हमारी कुटिया को छोड़ देते,
महलों को चाहे सारा, तुम आफ़्ताब दे दो.

दौड़ेंगे दूर तक वे लेंगे हिसाब अपना,
सोये हैं उनके हाथों, तुम इंक़लाब दे दो.


डॉ. सुभाष भदौरिया ता.17-09-2017 गुजरात.


बुधवार, 20 सितंबर 2017

बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है.पापा का और चाचा का नाम कर दिया है.

ग़ज़ल
बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है.
पापा का और चाचा का नाम कर दिया है.

खेतों में लोटा ले के, जाते थे जो कभी वे,
हगने का उनको घर में, आराम कर दिया है.

पटरी के जो किनारे, आते थे जो नज़ारे,
आँखों को अब हमारी, निष्काम कर दिया है.

रोटी व दाल को भी , तरसे हैं, अम्मा घर में,
इस बेरुख़ी ने तुमको, बदनाम कर दिया है.

मँहगाई ऐसी आयी, रोये हैं लोग-लुगाई,
अब मूम की फली को, बादाम कर दिया है.

हम नोट बंदी से ही, पहले ही मर चुके थे,
जीएसटी ने सबको,गुमनाम कर दिया है.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.20-09-2017 गुजरात.



मंगलवार, 19 सितंबर 2017

गलियों में तेरी बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या.


ग़ज़ल
अब तू ही बता तेरा ग़म ऐसे मिटायें क्या.
तेरी ही सहेली को, अब फिर से पटायें क्या.

दीदार तेरे हमको हों सुब्ह- शाम हरदम,
गलियों में तेरी बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या.

कोई ताज़ नया सर पे आ जायें हमारे भी,
वादों का कहो चूरन हम सब को चटायें क्या.

घर तेरे फिर आने का कोई तो बहाना हो,
अब्बू की तेरी फिर से अब टांग तुड़ायें क्या.

तोहफ़ा तुझे देने को, वो फिर से करें तिकड़म,
मोलों में जा के फिर से अब हार चुरायें क्या.

अब हम भी बने बाबा और खोलें अपना ढाबा,
भक्तों और भक्तिन को अब चूना लगायें क्या.



डॉ. सुभाष भदौरिया ता.19-09-2017 गुजरात

रविवार, 17 सितंबर 2017

लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली.

ग़ज़ल
कभी इसने मार ली तो,  कभी उसने मार ली.
लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली.

हिन्दू या मुसलमान मरें उनको क्या पड़ी,
गीधों ने भेड़ियों ने तो किस्मत संवार ली.

मज़्बूरियां ना पूछ ओ, जीने की सितमगर,
बच्चों की फीस बेंक से हमने उधार ली.

तुम अपनी अपनी ख़ैर मनइयो अय दोस्तो,
रो धो के सही हमने तो अपनी गुज़ार ली.

पंखे पे झूलते हुए लड़की ने ये कहा,
कब तक मैं जूझती लो चलो मैं तो हार ली.


डॉ. सुभाष भदौरिया ता.17-09-2017 गुजरात.



रविवार, 10 सितंबर 2017

खूँन के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह.


ग़ज़ल
जिनमें जान होती है, वो ही डूब जाते हैं.
मुर्दे बैठे साहिल पे,शोर ही मचाते हैं.

खूँन के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह,
और भी नज़र आयें, जितना वो छिपाते हैं.

सच को हमने कहने का, ये इनाम पाया है,
लाश पर मेरी देखो, गिद्ध मुश्कराते हैं.

मौत की करें परवाह, और लोग होंगे वे,
हम तो जां हथेली रख, आइना दिखाते हैं.

क़त्ल में मेरे शामिल, दोस्त भी हैं दुश्मन भी,
लाश पर मिरी माला, मिल के सब चढ़ाते हैं.

अब क़लम से इस दौर का हाल ना लिखा जाये,
आख़िरी संदेशा हम, सबको छोड़ जाते हैं.

 उपरोक्त नारी क़लमकार गौरी लंकेश  की बुज़दिली पूर्वक की गयी नृशंस हत्या पर आहत होते हुए पूरी संवेदना के साथ.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता. 10-09- 2017