मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

दिल्ली का ताज़ क़ातिलों के सर पे रख दिया.

ग़ज़ल
ज़ख़्मों में पे अपने नमक छिड़कते हैं देख लो.
हम सच कहें तो लोग भड़कते हैं देख लो.

दिल्ली का ताज़ क़ातिलों के सर पे रख दिया,
हम अपने खो के अब भी तड़पते हैं देख लो.

मरते हैं लोग, मरते रहें, उनको क्या पड़ी,
वो दौड़ के कुर्षी को पकड़ते हैं देख लो.

मुर्दा समझ के तुमने निगाहें तो फेर लीं,
सीने में दिल हमारे धड़कते हैं देख लो.

रूहों का ये सवाल, फ़ज़ाओं में है अभी,
क़ातिल हमारे अब भी अकड़ते हैं देख लो.

इज़्ज़त वतन की लूट रहा है वो रात-दिन,
मज़हब के नाम पर वो झगड़ते हैं देख लो.

शोले उठेंगे देखना हम को ये है यकीं,
हम रात-दिन पत्थर को रगड़ते हैं देख लो.

उपरोक्त तस्वीर मुंबई के उन बदनसीब विदेशियों की है जिन्हें हमारे मुल्क में रहने की सज़ा मिली ये ग़ज़ल इसी तस्वीर की मंज़रकशी है.
ता.09-12-08 समय-02-20PM



























6 टिप्‍पणियां:

  1. हम गैरराजनितीक लोग भी यह सोचने लगते है की राजनिती में हीं सारी समस्यायों का समाधान है। इस लिए हम जिस दल मे देश समाज का हित होता देखते है उसके हारने पर दिल अवसाद से भर जाता है। लेकिन हमे यह मानना हीं होगा की समाधान सिर्फ राजनिती मे निहीत नही है। और भी है राहे ..................

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  2. bahut sundar, bhartendu ji ne jo bharat durdasha ka varnan kiya tha use lakh guna jyada haalat kharab hai.kripya jab bhi aap apni rachna prakashit karen mere blog par link awashya chhod den.

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  3. उमेशवा जी ज्ञानीराज आपकी प्रोफाइल गायब है आप किस लोक के हैं अपनी शिनाख्त छिपाकर आप कौन सा राग आलाप रहे हैं. राजनीति के नागों सापों का तुम्हें इल्म होता ते ऐसी बात नहीं करते.उनके एक इशारे पर ट्रांसफर हो जाता है,इंक्रीमेंट रोक दिये जाते हैं प्रमोशन कि लिस्ट से नाम निकाल दिये जाते है.ऐसा हमारे साथ अभी हो रहा है गुजरात हाईकोर्ट में हमारी दो रीटें दाखिल हैं ले तारीख दे तारीख के बाद मुंसिफ महोदय ने राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को 6 महीनो में निर्णय लेने को कहा है.महीने दो महीने में जज महोदय बदलते रहते हैं ले तारीख दे तारीख का खेल चल रहा है.
    कारण सिर्फ इतना कि राजनीति में कोई हमारा माई-बाप नहीं.
    हम अपने ग़मों को तर्ज़ीह ही कहाँ देते हैं चाहे जंगल में फेको या रेगिस्तान हमेशा जाने को तैयार.
    राजनीति के नपुंसक कमान्डरों की वजह से देश की मिट्टी पलीत हो रही है.रोज निर्दोष लोगों का हलाक किया जा रहा है.देश का राजनीतिक नेतृत्व तमाशा देख रहा है. सारी समस्या की जड़ भृष्ट राजनीति नहीं तो और क्या है.
    आप गरीबी असमानता अन्याय का राग आलापने लगेगे. जानता हूँ पर आम लोगों की उसमें कोई भूमिका नहीं.अगली बार जो भी बयान दें तो अपनी पहिचान अवश्य दें इतनी ग़ैरत तो आप में होनी ही चाहिए.उम्मीद है मायूस नहीं करेंगे.
    मिस्टर मकरंद अपना चिट्ठा हिन्दी में लिखते हो टिप्पणी अंग्रेजी में करते हो This is not blowing man This is firing on target.I use GAZALS as weapon.
    ताऊजी राम राम.
    कोमन मेन लिंक देने और लेने के इल्म से महरूम हूँ नहीं तो टिप्पणियों की भीड़ लगी होती.आप ही कोई जुगाड़ कर लीजिये.
    अशोकजी आपके चिट्ठे पर जाकर देखा तो पता चला आप काफी संज़ीदा शख्शियत हैं साहब.
    हम इटावा के पास विधूना तहसील के हैं .हमारा बचपन यू.पी. के खेत खलिहानों में बीता है.रिज़्क की तलाश में हमारे पुरखे गुजरात चले आये और हम भी यहाँ शिक्षा विभाग में सरकारी मुलाज़िम के रूप में अपनी ऐसी तैसी करा रहे हैं.गुजरात के शिक्षा विभाग में सर्वोच्च योग्यताओ के बावज़ूद भृष्ट अधिकारियों की साज़िश के शिकार हैं.हमारी ही ग़ज़ल के एक मतले के मुताबिक-
    तीर उसकी कमान पर अब भी.
    है परिन्दा उड़ान पर अब भी.
    सच को कहने की आरज़ू न गयी,
    काट दी है ज़बान पर अब भी.
    आप जैसे पारखी जब हमारी अंजुमन में आते हैं तो जी उठते हैं. ऐसे ही आते रहिए दद्दा आप आ कर हमें अपने गांव की याद दिला देते है और रुला भी देते है.सूरदास के शब्दों मे कहें तो
    ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं.

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