सोमवार, 14 दिसंबर 2009

अपने को कहाते हैं देखो तो वो फ़ुरसतिया.

ग़ज़ल
जिस दिन वो मुहब्बत से घर अपने
बुलायेंगे.
जूठे ही सही उनके हम बेर भी खायेंगे.

अपने को कहाते हैं, देखो तो वो फ़ुरसतिया,
ज़ख़्मों को हमारे हम फ़ुर्सत से दिखायेंगे.

शीरी थी ज़बा अपनी, ये तल्ख़ हुई कैसे ?
रूदादे सफ़र अपना, हम उनको सुनायेंगे.

बिछुड़े हुए मेले में, बरसों के मिले जैसे,
सीने से लिपटकर के रोयेंगे, रुलायेंगे.

मिट्टी ये वतन की हैं, खींचे है तेरी जानिब,
अहसास हमारे हम पुरखों का करायेंगे.

किस्मत की लकीरों के मोहताज नहीं हम,
हम अपनी हथेली पे सूरज भी उगायेंगे.

महफ़ूज़ रहेंगे क्या, घर मेरे पड़ोसी के,
बारूद हमारे जो आँगन मे बिछायेंगे.

डोली में सँवर के वे जायेंगे सजन घर को,
कोने में कहीं चुपके हम अश्क बहायेंगे.

अपने न हुए अपने ग़ैरों की इनायत है,
मरने पे मेरी अर्थी दुश्मन भी सजायेंगे.

डॉ.सुभाष भदौरिया ता.14-12-09

ये ग़ज़ल चिट्टाजगत की मश्हूर शख़्शियत अनूप शुक्ल के नाम पूरे एहतराम के साथ है। जिन्हें लोग मिस्टर फ़ुरसतिया के नाम से जानते हैं। उन्हें मेरे ग़ज़ल लेखन और तस्वीर प्रस्तुति पर कुछ जिज्ञासायें थी मतलब मैं ग़ज़ल पहले लिखता हूँ या तस्वीर पहले रखता हूँ. ये तस्वीर और ग़ज़ल उसी का परिणाम है.

11 टिप्‍पणियां:

  1. जिस दिन वो मुहब्बत से घर अपने बुलायेंगे.
    जूठे ही सही उनके हम बेर भी खायेंगे


    मिट्टी ये वतन की हैं, खींचे है तेरी जानिब,
    अहसास हमारे हम पुरखों का करायेंगे.

    किस्मत की लकीरों के मोहताज नहीं हम,
    हम अपनी हथेली पे सूरज भी उगायेंगे.

    महफ़ूज़ रहेंगे क्या, घर मेरे पड़ोसी के,
    बारूद हमारे जो आँगन मे बिछायेंगे
    गजल पूरी बहुत ही शानदार है, बहुत खूबसूरत शेर है, भगवान आपको एवं आपकी गजलों को दुशमनों की नजर से बचाए।
    मतले की दूसरी लाइन पर किसी का दोहा याद आ रहा है..
    शबरी जैसी आस रख चातक जैसी प्यास.
    कुआ स्वयं ही आएगा चलकर तेरे पास.

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  2. 1-अशोक दद्दा आपने आपने कल देर रात फोन करके भी शेरों पर अपनी कीमती राय से वाकिफ़ कराया था.आपको ग़ज़ल के कई शेर पसन्द आये ये मेरी ख़ुशकिस्मती है.
    वैसे ग़ज़ल में एकाद शेर ही हांसिले ग़ज़ल शेर होता है अधिकतर भर्ती के.

    आप ने जिस दोहे का दृष्टांत दिया बहुत प्यारा है.
    रही बात बुरी नज़र की वो तो कब की लगी हुई है तभी तो परिवार से दूर ज़लावतन एक गांव में सज़ा काट रहे हैं.
    दुश्मनों की ये इनायत ही तो तन्हाई में ग़ज़लें लिखवा रही है.
    हम तो अल्लाह से उनकी उम्रदराज़ की दुआ मांगते हैं.

    मिट्टी ये वतन की है खीचें है तेरी जानिब,
    आप भी तो उसी कशिश से खिचें चले आते हैं ख़ैर ख़बर लेते रहिओ श्रीमान.
    2- वंदना जी आप दूसरी बार हमारे ब्लाग पर आयी हैं.आप अपने लेखन में अत्यंत संवेदनात्मक वर्णन करती हैं.चित्रोपमता के साथ साथ आपकी अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता बरबस अपनी ओर खीचती है.
    हाल में आपने अपने ब्लाग पर बचपन की मधुरयादों की बड़ी प्यारी मंज़रकशी हैं की है.
    आपकी नवाज़िश हमारे अशआरों को और भी उरूज़ बख़्शेगी.
    आते जाते रहिए.

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  3. महफ़ूज़ रहेंगे क्या, घर मेरे पड़ोसी के,
    बारूद हमारे जो आँगन मे बिछायेंगे.

    waah..........kya baat kahi hai........shandar
    अपने न हुए अपने ग़ैरों की इनायत है,
    मरने पे मेरी अर्थी दुश्मन भी सजायेंगे.
    sabhi ek se badhkar ek ..........kya kahun........kin shabdon mein tarif karun.

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  4. वंदनाजी
    देर लगी आने में तुमको शुक्र फिर भी आये तो.
    आप बहुत ही संवेदनशील अछान्दस रचनायें लिख रहीं हैं.बयान ज़ारी रखिए और हमारी अंजुमन में आते जाते रहिए छन्द बद्धता कमाल भी रफ़्ता रफ़्ता आ ही जायेगा.आपकी ज़र्रानवाजी के लिए मश्कूर हूँ मोहतरमा.

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  5. वाह, वाह्। क्या गजल लिखी है। हमारी फोटू भी लगा दी। क्या जर्रानवाजी है।
    किस्मत की लकीरों के मोहताज नहीं हम,
    हम अपनी हथेली पे सूरज भी उगायेंगे


    पढ़कर आनन्द आ गया। इसे पढ़कर एक पसंदीदा कविता की लाइने याद आ गयीं:

    जो सुमन बीहड़ों में बन में खिलते हैं वे माली के मोहताज नहीं होते,
    जो दीप उम्र भर जलते हैं वे दीवाली के मोहताज नहीं होते।

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  6. आदरणीय अनूपजी आप बहुत ही पढ़ने लिखने वाले व्यक्ति हैं .जब आप आपने फोन पर बातों बातों में बताया कि आपने ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास बारहमासी पढ़े होने की बात की.
    मैने उनके नरकयात्रा पर एम.ए.में लुघुशोध प्रबंध लिखवाया था.मैंने मुद्राराक्षस के प्रपंच तंत्र पर शोघ कार्य कराया था आप उनको जानते हैं.हरिशंकर परसाई तो वर्षों तक एम.ए. की कक्षा में पढ़ाये आप इन तमाम मेरे पसन्ददीदा रचनाकारों का गहरा अध्ययन किये हुए हैं. आप अपनी व्यंग प्रधान शैली में बड़े ही सहज ढंग से गंभीर बात कह जाते हैं मैं आपकी कही बात को सहजता से नहीं लेता.आपको ग़ज़ल के अशआर पसन्द आ रहे हैं यह मेरे लिए किसी दौलत से कम नहीं.आते जाते रहिए और अपनी अमूल्य राय देते रहिए.
    उपरोक्त काव्य पंक्तियों में माली दीवाली के काफिया प्रास और मोहताज नहीं होते की रदीफ निरंतर आने वाला शब्द गुच्छ पर छन्द को किसी भी निश्चित छन्द का न होना कवि की अज्ञानता का सूचक है.अनूपजी ग़ज़ल में काफिया रदीफ तो लोग आसानी से मिलालेते हैं पर छन्द के नाम पर भारी अराजकता देखने को मिलती हैं.आप हमारी तमाम ग़ज़लों में छन्द का निर्वाह देखेंगे. गालियां भी छन्द बद्ध लिखने में हमें महारत हांसिल है.रहा आक्रामक भाषा के प्रयोग से साथ भाषा की मृदुलता के रंग भी पता है. अरे साहब कामायनी और उर्वशी जैसी महान रचनाओं को को वर्षों एम.ए. की कक्षा में पढ़ा है पढ़ाया है.
    बस कभी कभी ब्लाग जगत में यार लोगों लोटते देखता हूँ हमें भी लुटास छूटती है.
    इन दिनों आप जैसे सुज्ञ पाठकों की बदौलत सही चल रहे हैं. बाकी ब्लाग की दुनियां के नामी गिरामी गिरोहों की रचनाओं को आप भी जानते हैं और मैं भी कमबख्त कैसी ही ही वाली टिप्पणियां करते हैं. कविता की कटिया से मछली पकड़ने की कला कोई उनसे शीखे.
    हम अपनी बिरादरी के विपरीत मछली नहीं खाते शाकाहारी हैं पर कहीं नागिन नज़र आती है तो उसका दंश ज़रूर सहते हैं.आप स्वयं दिव्य दृष्टि रखते हैं हमारी बात समझेंगे

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  7. किस्मत की लकीरों के मोहताज नहीं हम,
    हम अपनी हथेली पे सूरज भी उगायेंगे.

    बेहद खुबसूरत शेर ...वैसे तो हर एक शेर लाजवाब है मगर इस शेर में जो हथेली पे सूरज उगाने की बात कही गयी है , वो नायब है अद्धुत है.....एक कशिश है...आभार..
    regards

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  8. सीमाजी आपका हमारे ब्लाग पर स्वागत है.माशाअल्लाह आपका ब्लाग है जादूनगरी लेपटोप का पोइन्टर भी गिरफ्त में आगया. क्या दिलकश तस्वीरें लगा रखी हैं.अँग्रेजी कविता storm in eyes.desert heart land.का जबाब नहीं.
    फीलिंग आपमें हैं अछान्दस रचनायें भी आपकी आकर्षित करती हैं एक मात्र कमी छन्द की अनविज्ञता है.
    आप छन्दों को सिद्ध कर लें.
    कम से कम एक पंचअक्षरीय 212 गुरु लघु गुरू के पंक्ति में चार गण.
    उर्दू में इसे फाइलुन चार आवृतियां समझे.
    आप मश्हूर गीत की लय यही है.
    छोड़दे सारिदुनि यांकिसी केलिए.
    काफिया रदीफ आप को सिद्ध है बस छन्द की कमी खलती है यह अगर हासिल करलें फिर आप कमाल करेंगी.
    कहीं गण न तोड़े.आपकी कविताओं में बस इसी कारण कभी टिप्पणी नहीं कर पाया.भीड़ की वाहवाही से बचें. आशा है आप बुरा नहीं मानेगी और अपनी अमूल्य राय देती रहेंगी.

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  9. अपने न हुए अपने ग़ैरों की इनायत है,
    मरने पे मेरी अर्थी दुश्मन भी सजायेंगे.


    बहुत बढ़िया लिखा है।

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