गुरुवार, 10 जून 2010

फिर शहर में नाचेंगे ख़ंज़र,फिर शहर में बरसेंगे शोले.



ग़ज़ल
पत्थर तो उछाले हो मुझ पे, सोचो तो तुम्हारा भी सर है.
घर मेरा जलाने से पहले, सोचो तो तुम्हारा भी घर है.

फिर शहर में नाचेंगे खंज़र, फिर शहर में बरसेंगे शोले,
आने को है मौसम ख़ास कोई, हर शख्श कांपता थर-थर है

क़ातिल भी वही मुंसिफ़ भी वही,इंसाफ़ हमारा क्या होगा,
हैं वश में दरिन्दे भी उसके, चहुँ ओर उसीका लश्कर है.

तुम मौत के डर से ही हरदम, सहते रहते ज़ालिम के सितम,
हर रोज़ के मरने से लोगो इक रोज़ का मरना बेहतर है

सूली पे चढ़ाओ लाख हमें ज़िन्दा जलवाओ शोलों में,
शैता से नहीं डरने वाले ,बस एक ख़ुदा का ही डर है.

ख़ामोश अगर जो हैं हम तो बुज़दिल न समझ लेना हमको,
आँखों में हमारे रक्श करे दुश्मन का हमेशा पैकर है.

जो चोर उचक्के थे पहले, अब ताज संभाले बैठे हैं,
जो जूझ रहा है मैदा में वो आज भटकता दर-दर है.

इस बार अहमदाबाद गया तो बस स्टेन्ड से उतरते हुए अपनी तरफ आने वाले हर शख्श पर कड़ी नज़र रखनी पड़ी . पिछले दिनों राज्य के अख़बार में आयी खबरों ने आगाह तो कर ही दिया था कि अहमदाबाद में फिर से नई हरकतें शुरू हो गयी हैं जिस तरह से सी.बी.आई. ने शोहराबदीन केश में अपनी काबलियत दिखाते हुए गुजरात राज्य के आला अफ्सर को कैद में धकेला, फिर उसके देखा देखी गुजरात राज्य की खुपिया पुलिस ने अपने ही राज्य के अन्य आला अफ़्सर को सलाखों के पीछे भेजा उससे गुजरात राज्य के पुलिस विभाग का मोरल ऐसा टूटा कि अहमदाबाद में पेशेवर दस्ते अपना कमाल दिखाने लगे, कई स्टेबिंग हुए हमलावरों में खाकी का डर गाइब हो गया है किसी अपराधी को गुजरात पुलिस थप्पड़ मारने से पहले अब सौ बार सोचने लगी है क्यों- ऐसे माहोल में कब क्या हो जाये कहा नहीं जा सकता. उपरोक्त ग़ज़ल इसी पसमंज़र की है.

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.10-6-10

9 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar gazel aur dukh hua ahmedabad ke halaat jan kar.

    aapki post kal 11/6/10 ke charcha munch k liye chun li gayi hai.

    http://charchamanch.blogspot.com
    abhar.

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  2. gazal to jordaar hai ...par baad ki baat kitni dukhad...kya in logo ko chhoot dena afat mol lena hai...kab sudhrenge...

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  3. हर रोज़ के मरने से लोगो इक रोज़ का मरना बेहतर है... achchhi rachna. Lekin ishwar kare ki aise halaat kabhi na ho...

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  4. गज़ल अपने आप में इतनी मुकम्मल और दुरुस्त है कि किसी दाद की मोहताज़ नहीं ... इतनी अच्छी गज़ल(भाव और शिल्प दोनों की नज़र से)ब्लॉग जगत में बहुत कम पढ़ने को मिली ... मै आपकी गज्ल्कारी का कायल हो गया... बहुत बहुत शुक्रिया

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  5. 'घर मेरा जलाने से पहले.....'
    'कातिल भी वही................'
    बहुत ख़ूब!

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  6. pur-dard ghazal. apne-apne garebaan mein jhaankne ko majboor kartee.

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  7. 1-अनामिकाजी आपने हमारी ग़ज़ल को चर्चा मंच के लिए चुना मश्कूर हूँ मोहतरमा आपकी नवाज़िश के लिए. रही चर्चा की बात तो वहां का मंज़र आपकी आगाह करने के कारण देखा.
    आपको बुरा न लगे तो एक बात कहें हमारी ग़ज़लों पर कुछ कहने के लिए कुछ सलाहीयत भी तो चाहिए जो ब्लाग की दुनियां के नक्काद हैं वे क्या जाने की ग़ज़ल कहने में कितनी तकलीफ झेलनी पड़ती है बच्चों से बिछुड़ना पड़ता है घर होते हुए भी बेघर हो जाना पड़ता है.
    वैसे ये इब्तिदा है अंज़ाम कुछ भी हो सकता है.
    हमारी नंज़र ही हमारी तकलीफ़ की वज़ह है हम जानते हैं.
    2- दिलीप जी आपका ब्लाग देखा भाई इस छोटी सी उम्र में इतना सच कहना खास कर किन्नरों के माध्यम से-

    वे अपनी पौरुषहीनता वे ताल ठोक कर मानते हैं
    और हम अपनी मानते नहीं जानते हैं.
    भाई मज़ा आ गया. इन कमान्डों से घिरे रहने वाले महापुरुषों का तो जबाब नहीं पाखाने में भी कमान्डो लगा रक्खे हैं.
    आफत तो मोल लिए उम्र हो गयी साहब न तो वे सुधरे न हम.
    रही चोट देने और लेने की बात तो उर्दू एक बेहतरीन शेर याद आ गया.
    ज़ख़्मों से बदन गुलज़ार सही, वे अपना शिकश्ता तीर गिनें,
    ख़ुद तरकश वाले कह देंगे ये बाज़ी किसने हारी है.

    3-पवनजी ईश्वर के हाथ में हालात न तो पहले थे न आज वे सब दिल्ली के हाथ और पाँव में रहते हैं आप हमारे रम्ज़ो को समझे नहीं जनाब काफी भोले हैं और ईश्वर- क्षीरसागर में अपनी शेषनाग की सैया पर अपनी पत्नीजी से पाँव दब दबा रहे होंगे और हम कब अहमदाबाद आ ते जाते शहीद हो जायें कुछ कहा नहीं जा सकता.
    4-पद्मसिंहजी आपके ब्लाग को देखा गद्य और पद्य दोनो पर नज़र डाली आपकी कलम की संज़ीदगी और नज़र से वाकिफ़ हुए.
    आपने भाव और शिल्प की बात कर हमें जो इज़्ज़त बख्शी उसके लिए हम आपके आभारी हैं.
    5-नीलेशजी आपको खंज़र का नाच सुंदर लगा या शोलों में जलते लोग या यतीम बच्चे की निरीह आँखें जो आग में झोंके जाने के बाद बच गया माँ बार परिवार का तो पता नहीं पर ज़िन्दगी का सफ़र अब उसे तन्हा ही काटना है. भाई वाह हमारे पाठक भी कमाल करते हैं जब हम किसी जोहराज़बी से मुख़ातिब हो रिवायती ग़ज़ल की बात करते हैं तब भी सुंदर और जब हम पुरदर्द ग़ज़ल की बात करें तो भी सुंदर.
    नीलेशजी बुरा मत मानना आप हमारे नियमित पाठक हैं हमारी ग़ल्तियों पर हमें टोकने का आपको पूरा इख्तियार है.

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  8. मंसूरअलीजी आदाब.ग़ज़ल के दर्द को तो महसूस किया आपने साथ ही अपने अपने गरीबां में झाकने की बात को औरों को भी जताया आपने.
    अल्लाह ये तौफ़ीक सब को दे आमीन.
    आपने हमारे ब्लाग पर आ के हमें नवाज़ा तो ऐसा लगा जैसे हमारे किसी बुज़र्गने हमारे सर पे हाथ रख दिया हो हमें एक अपना एक शेर याद आ गया.
    बच्चों को लगाओ सीने से पुरखों की दुआयें भी ले लो,
    क्या आज पता घर लौटेंगे घर से निकले जो घर वाले.
    इस दौर में बच्चों और बुज़र्गों की दुआयें ही सलामत रखे हुए है.

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