शुक्रवार, 28 मार्च 2014

बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.

ग़ज़ल
बेवफ़ा इस तरह बेवफ़ाई न कर.
यूँ सरेआम तू  जग हँसाई न कर.

दोस्त राहों में काँटे बिछाने लगे,
लोग कहते थे ज़्यादा भलाई न कर.

दिल की राहों में ज़ोख़म बहुत हैं सुनो
और ज़्यादा तू अब दिल-लगाई न कर


ख़ूँन रिसने दे ज़ख़्मों से मेरे यूँ ही,
दूसरों की मगर यूँ दवाई न कर.

क़त्ल कर शौक़ से हक़ दिया ये तुझे.
सामने दुश्मनों के बुराई न कर.

साथ आ न मेरे मुझको कुछ ग़म नहीं,
साथ औरों के तो आवा-जाई न कर .

डॉ. सुभाष भदौरिया ता.28-03-2014


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें