ग़ज़ल
शौक़ से आप ले लो ये गर्दन मेरी.
सर पर अर्जुन बिठाओ तुम्हें क्या पड़ी.
एकलव्यों से मत द्रोण से पूछिये .
चाल उसने फँसाने की क्या क्या चली.
रौशनी कुछ तो हो इन
अँधेरों में अब,
मैंने खुद ही जला ली मेरी
झोपड़ी .
चोट बाहर की होती तो सह
लेते हम,
जान ले लेती है चोट ये
भीतरी .
शर्म दिल्ली को आये भला
किस तरह,
जिसने कुर्षी की ख़ातिर
हया बेच दी.
चैन मर कर भी मुझको मिलेगा कहाँ,
रात दिन रोयेगी मेरी माँ बावरी.
डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात
ता.23-01-2016

बहुत दिन बाद दिखे...आनन्द आया..
जवाब देंहटाएंसरजी आप गरीबों की ख़बर ही कहां लेते हैं. मेरे शबाब के ढलने के बाद आये हैं. शुक्रिया जनाब.
जवाब देंहटाएंगजल में सत्य है सरजी ।
जवाब देंहटाएंबात में दम है।
जवाब देंहटाएंPriya Bhaduria ji, anayas hi internet par aapki rachnao se rubaru hua. Itna anand aaya ki kah nahi sakata.kripya sampark ka madhyam batayen. Dr. aksbhadoria@gmail.com
जवाब देंहटाएंधन्यवाद जी. My mail. Subhash_bhadauriasb@yahoo.com
जवाब देंहटाएं