गुरुवार, 22 मई 2008

हमको मरवाते हरामी साले.











ये तस्वीरें 13मई २०० ८ जयपुर में हुए विस्फोटों की हैं जो बी।बी।सी।पर उपलब्ध हुई हैं। ये ग़ज़ल इसी पसमंजर की है.
ग़ज़ल
हमको मरवाते हरामी साले.
हैं अमीरों के ये हामी साले.

लाशें सड़कों पे बिछी हैं देखो,
चैन से सोते इमामी साले.

बैठे संसद में तमाशा देखें,
कितने बुज़दिल हैं ये नामी साले.

दोगलों की ही अदाकारी से,
शान से घूमें इनामी साले.

अपने वोटों की फिकर है इनको,
देते गुंडों को सलामी साले.

सच को शूली पे चढा देते हैं,
झूट की करते गुलामी साले.,

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.22-05-08 समय-10-40-AM.

























8 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल ठीक बात कही गयी है ग़ज़ल में.

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  2. तल्ख भाषा आपकी पीडा है जो समझी जा सकती है किंतु मोटी चमडी वालों पर गालियाँ भी बेअसर होती हैं...बदकिस्मती से हिन्दुस्तान का निजाम एसा ही है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  3. तल्ख भाषा आपकी पीडा है जो समझी जा सकती है किंतु मोटी चमडी वालों पर गालियाँ भी बेअसर होती हैं...बदकिस्मती से हिन्दुस्तान का निजाम एसा ही है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  4. तल्ख भाषा आपकी पीडा है जो समझी जा सकती है किंतु मोटी चमडी वालों पर गालियाँ भी बेअसर होती हैं...बदकिस्मती से हिन्दुस्तान का निजाम एसा ही है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  5. तल्ख भाषा आपकी पीडा है जो समझी जा सकती है किंतु मोटी चमडी वालों पर गालियाँ भी बेअसर होती हैं...बदकिस्मती से हिन्दुस्तान का निजाम एसा ही है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  6. तल्ख भाषा आपकी पीडा है जो समझी जा सकती है किंतु मोटी चमडी वालों पर गालियाँ भी बेअसर होती हैं...बदकिस्मती से हिन्दुस्तान का निजाम एसा ही है।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  7. ये सपाटबयानी ही इस रचना की खूबसूरती है

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