शनिवार, 24 मई 2008

मुझको उलझाके वो भी उलझेगा.

ये ग़ज़ल नीरज एवं राकेशजी जैसे कद्रदानों की नज़र है जिनकी कल लिखी गज़ल की टिप्पड़ियों ने आज मुझसे ये ग़ज़ल पोस्ट करवाली.
नेट के बेमुरव्वत पाठकों को क्या कहूं जिन्हें हसीन फुलझडियों में ही सबकुछ नज़र आता है भैरा के गिरते हैं कमबख्त उनकी पोस्टों पर हें हें बहुत अच्छा लिखती हैं आप.हमें एक बार
एक मित्रने सलाह दी थी कि तुम अपनी तस्वीर हटाकर किसी कमसिन ज़ुहरा जबीं की तस्वीर लगा दो फिर तुममें नयी बात नज़र आयेगी उनको.
पर फ़रेब हमारी फितरत में ही नहीं धोका खाना तो आता है धोका देने के इल्म से महरूम हैं अब तक.

ग़ज़ल
मामला इस तरह न सुलझेगा.
मुझको उलझा के वो भी उलझेगा.

नाज़ हमने उठाये हैं तेरे,
हम न होंगे तो कौन पूछेगा.

हम तो मारे गये वफ़ा करके,
बेवफ़ा को कहां ये सूझेगा.

दो-दो नावों पे पांव रखता है,
देखना ऐक दिन वो डूबेगा.

सर कलम भी करोगे तुम मेरा,
धड़ मेरा धड़ है वो भी जूझेगा.














3 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी24 मई 2008, 12:04:00 pm

    Bhadoria ji, aap marak likhte hai... daad to deni hi padegi...

    lekin aap ka gussa bahut tej hai, mujhe lagta hai isliye log aap se dar jaate hai

    thoda narazgi kam kariye sir

    aur kalam chalate rahiye

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  2. दो-दो नावों पे पांव रखता है,
    देखना ऐक दिन वो डूबेगा.

    सर कलम भी करोगे तुम मेरा,
    धड़ मेरा धड़ है वो भी जूझेगा.

    अच्छी रचना है सुभाष जी..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  3. जिन्हें हसीन फुलझडियों is tarah ki bhasha kaa prayog mahilaa kae liyae aap kab tak kartey rahey gaey?? mansiktaa apnii badley kyoki achchee gazal likhena hee jaruree nahin haen , aap ki maansiktaa vidrup haen

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