शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

जान दे कर के शान रखते हैं.

ग़ज़ल
जान देकर के शान रखते है.
हम अजब आन बान रखते हैं .

शब्द-भेदी हैं हम को पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं .

दोस्तों पर तो जां छिड़कते हैं.
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

वैसे तो हम जमीं पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखते हैं.

जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.

महफिलों के अदब से वाकि़फ हैं,
हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं.

बात बच्चों की मान लेते हैं,
और बड़ों का भी ध्यान रखते हैं.
ग़लिबो-मीर के हैं हम वारिस,
अपने शेरों में जान रखते हैं.
उपरोक्त हमारी तस्वीर है,हमारे चाहने वाले खुश हों जलने वाले जलें आमीन.
-5-50AM

3 टिप्‍पणियां:

  1. 'वैसे तो हम ज़मीं पे रहते हैं
    आँख में आसमान रखते हैं।'
    बहुत सुन्दर। बहुत शानदार।
    बधाई।

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  2. mahfilon ke adaf se wakif hai,
    muh me ham bhi jaban rakhte hai..

    bahot khub bahot badhiya,,,badhai...

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  3. दोस्तों पर तो जां छिड़कते हैं.
    दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

    वैसे तो हम जमीं पे रहते हैं,
    आँख में आसमान रखते हैं.


    वाह वाह डाक्टर साहब आज तो आपने दिल लूट लिया ! डाक्टर लोग तो दिल की चीरफाड़ करते हैं आप तो लूट के ही चल दिए ! बहुत बधाई भाई आपको !

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