गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

बेहतर है मुझे लौटा देना ख़त मेरे जलाने से पहले.

ग़ज़ल
दिल से भी मिटाओ तो जाने, ये नक़्श मिटाने से पहले.
बेहतर है मुझे लौटा देना, ख़त मेरे जलाने से पहले .

तबियत भी है उखड़ी, उखड़ी मुखड़ा भी है फीका-फीका,
सरकार मेरे क्यों गुमसुम हैं अहवाल सुनाने से पहले.

घर वीरां करके कहते हैं, घर अपना बसा लेना तुम भी,
अपना सा समझते हैं सबको, ये राय बताने से पहले.

रोओगे कभी चुपके-चुपके जब ज़िक्र हमारा निकलेगा,
आँसू बनकर मैं बरसूँगा सावन के आने से पहले .

इक जगह से बाँधू सौ टूटें हालात भी कितने ज़ालिम हैं,
इक आग नई लग जाती है, इक आग बुझाने से पहले.

डॉ.सुभाष भदौरिया. ता.10-12-09

3 टिप्‍पणियां:

  1. बंधुवर,
    रोओगे कभी चुपके-चुपके जब ज़िक्र हमारा निकलेगा,
    आँसू बनकर मैं बरसूँगा सावन के आने से पहले
    शानदार

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  2. लौटा देना मेरे खत जलाने के बदले ....
    क्या किसी ने ये नही कहा होगा ...
    "कैसे जलाता मैं तेरी खुश्बू से लिपटे खत ".....!!

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  3. इक जगह से बाँधू सौ टूटें हालात भी कितने ज़ालिम हैं,
    इक आग नई लग जाती है, इक आग बुझाने से पहले.

    वाह...कमाल...कहर बरपा रहे हैं आप अपने इस नए रूप में...लाजवाब सुभाष जी...लाजवाब.
    नीरज

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