बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

क्या हमारा है हाल मत पूछो.

ग़ज़ल
क्या हमारा है हाल मत पूछो.
हमसे ऐसे सवाल मत पूछो.

हमने थोड़ी जो ज़बां खोली तो,
फिर मचेगी बवाल मत पूछो.

आज इसके तो साथ कल उसके,
है सियासत छिनाल मत पूछो.

चंद टुकड़ों में,चंद टुकड़ों में,
मुल्क बेचें दलाल मत पूछो.

कीमतें आसमां को छूती हैं,
हमसे उनका कमाल मत पूछो.

हाथी घोड़े की चाल समझे हो.
तुम वज़ीरों की चाल मत पूछो.


मूँग छाती पे दल रहे दुश्मन,
है इसीका मलाल मत पूछो.

सच को चुनवा दिया दिवारों में,
झूट क्यों मालामाल मत पूछो.

अपने पाँवों में पड़ गये छाले,
गाल उनके गुलाल मत पूछो.


डॉ.सुभाष भदौरिया. ता.17-02-10

उपरोक्त ग़ज़ल को निम्न संदर्भ में देखें.
ता.14-11-09 को राज्य शिक्षा विभाग में हमें प्रिंसीपल का प्रमोशन मिलने के साथ तनखाह के लाले पड़ गये.जिस कोलेज में हुक्मरानों ने रखा है वह जून.2008में अस्तित्व में आयी है.तिजोरी का कार्ड इंडेक्स नंबर नहीं मिला है.तिजोरी अधिकारी गाँधीनगर की तफ्तीश ज़ारी कोलेज असली है या नकली. हमने रूबरू मिल कर तसल्ली दी भाई असली है. पर साहब क्यों माने थ्रू प्रोपर चेनल आओ.गोधरा तिजोरीवाले साहब रिपोर्ट भेजने में मुहूर्त देख रहे हैं.
14-11-09 से 31-12-09 तक तनखाह अहमदाबाद के सायंकालीन सरकारी गुजरात कोलेज से दो महीने बाद दी गयी थी.जनवरी के साथ फरवरी का महीना भी पूरा होने जा रहा है. अहमदाबाद में रहते बच्चे और पत्नी चिंतित क्या करें.जिनके पास राज्य शिक्षा विभाग की कमान है उन शिक्षा सचिव अडियाजी शिक्षा कमिश्नर श्रीमती जयन्ती रवी आई.ए.एस. आफीसर हैं उन्हें रूबरू मिलकर और मेल से दुख बताया तो उन्हें समझ में नहीं आया क्योंकि उनका घर तनखाह पर नहीं चलता. पर हमारे जैसे गरीबों का उसी पर गुज़ारा होता है ये उन्हें नही पता.नहीं तो पिछले तीन महीने से वे तमाशा नहीं देखते. राज्य के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्रमोदीजी के दरबार में फरियाद की है. देखें क्या होता है.
एक तरफ अहमदाबाद और गाँधीनगर में इंचार्ज प्रिंसीपल अपने जादू से किसी को आने नहीं देते उन्हें किसी महाशक्ति का वर्दान प्राप्त है. राज्य की कई सरकारी पुरानी कोलेजो में जगह खाली है पर उच्च शिक्षा विभाग को हमें सताने में अद्भुत आनंद आता है. अब वे हमें बांस पर चढ़ने पर मज़बूर कर रहे हैं तो हम क्या करें.
हमने तो राज्य शिक्षा विभाग से कहा है हमारे अहमदाबाद से 150 किमी. की जगह भले 400 किमी. करो पर भाई तनखाह समय पर मिले इसका इंतज़ाम करो. कहीं भी जंगल रेगिस्तान रखो पर तनखाह दिलवाओ मेरे भाग्य विधाताओ.
पर अभी किसी को फ़ुर्सत नहीं सभी स्वर्णिम स्वर्णिम गाने में लगे हैं और हमारी ऐसी तैसी हो रही है.
तनखाह न मिलने से हमने भोजन एक समय ही कर दिया है तो दूसरी तरफ हमारे मेहरबां ब्रेकफास्ट, लंच, डीनर के मज़े लूट रहे हैं. जय हो उच्च शिक्षा विभाग की एक तरफ हमारे साथ प्रमोशन पाने वाले सभी प्रिंसीपल नयी तनखाह 75 से 80 हजार लेकर मगन हैं दूसरी तरफ हमारा बकौले ग़ालिब हाल ये है कि-
अपनी किस्मत में ग़म गर इतने थे,
दिल भी या रब कई दिये होते.
जय जय गरवी गुजरात, जय गरवी गुजरात. ये ग़ज़ल एक मित्र के हालचाल पूछने के बाद कही है ताकि सब को अलग अलग हाल बताना ना पड़े.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज इसके तो साथ कल उसके,
    है सियासत छिनाल मत पूछो.

    हाथी घोड़े की चाल समझे हो.
    तुम वज़ीरों की चाल मत पूछो.

    बेहतरीन ग़ज़ल सुभाष जी. आपके कष्ट को जान दुःख हुआ...सच्ची और खरी बात करने वाले इंसान की आज की दुनिया में ऐसी ही दुर्गति होती है..लेकिन आप हौंसला रखें आखरी जीत आपकी ही होगी.
    नेफ्राज

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  2. If distance or place matters, God must be blamed for partiality.
    from Prof. Yogendra V. Rathod
    Lalan College Bhuj

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  3. Prof. Rathod distance or place are not matters.
    आपकी नज़र सरकार में रहकर धुँधलागयी है. साहब कई तो दृष्टि खो बैठे हैं तमाम परेशानियों के बावज़ूद हमारी नज़र अब भी आर पार देखने का सामर्थ्य रखती है और वही हमारी दुश्मन है.
    एक कवि के पंक्तियाँ हैं-
    अँधों का साथ हो जाय तो,
    तुम भी अँधे बनकर रास्ता ठेलो व्यंग्य मत बोलो.
    जो जितने ज्यादा अँधे होने का नाटक रहे हैं वे मज़े कर रहे हैं
    मरना तो हम नज़र वालों का है साहब.आप ईश्वर का नाहक दोष निकाल रहे हैं वो तो हमारे साथ है तभी तो अब तक सलामत हैं साहब.
    आप हमारे ब्लाग पर आये अच्छा लगा.
    આપ ગુજરાત ના છો અને સરકારમાં અધ્યાપક છો આવતા રહેજો સાહેબ.

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