शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल्ली तो गयी अब की गुजरात संभालो अब.



ग़ज़ल

आईनों पे इस तरह कीचड़ ना उछालो अब.
दिल्ली तो गयी अब की, गुजरात सँभालो अब.

उड़ना ये हवाओं में, अब बंद करो साहब,
बाकी जो बची थोड़़ी, उसको ही बचालो अब.

अंबाणी, अदाणी की यारी ये डुबो देगी,
मज़्लूम व मुफ़्लिस की बेहतर है दुआ लो अब.

कोख़ो को यहां माँ की, इंडस्ट्री बतायें जो,
गुस्ताख़ ज़बानों को महफ़िल से निकालो अब.

डस लेंगे तुम्हें इक दिन कुछ होश करो अब भी,
आस्तीन के सांपों को यूँ घर में न पालो अब.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.14-02-2014

1 टिप्पणी:

  1. उड़ना ये हवाओं में, अब बंद करो साहब,
    बाकी जो बची थोड़़ी, उसको ही बचालो अब.

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