बुधवार, 13 जनवरी 2021

शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

                                                                            ग़ज़ल

 शहर से गाँव होते हुए बात अब,खेत और अपने खलिहान तक आ गयी.

ज़ुल्म  की कोई हद तो मुकम्मिल करो,  जिस्म से बात अब जान तक आ गयी .

 

मर गये मिट गये जो वतन के लिए, जिनके पुरखों ने दी थी शहादत यहां,

उँगलियां वो उठाते है औलाद पर, आंच अब अपने ईमान तक आ गयी.

 

स्याह रातों  में हम रोशनी के लिए, झोपड़ी भी जला बैठे अपनी यहाँ,

गाँव से फिर शहर, फिर शहर से सड़क, जां ये अब अपनी शमसान तक आ गयी.

 

अपनी तोपों के मुँह खोल दो तुम यहां,  हमको चिनवाओ दीवार में ग़म नहीं.

हक़ की ख़ातिर लड़े आखिरी सांस तक, जंग चौतरफा ऐलान तक आ गयी.

 

कितने मग़रूर तुम, कितने मज़्बूर हम, बेटे सरहद पे और बाप सड़कों पे हैं,

बेटियां दे रही हैं सहारा हमें,उनकी मां भी मैदान तक आ गयी.

 

आग की आँख में हैं बराबर सुनो, झोपड़ी हो महल हो  या मेअराज हों,

चौकियों की सुरक्षा से होते हुए दास्ता अब तो सुल्तान तक आ गयी.

 

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात. तारीख 13/01/2021

 

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