बुधवार, 15 जनवरी 2025

तेरे बारे में अब सोचता भी नहीं.

 


ग़ज़ल

तेरे बारे में अब सोचता भी नहीं.

और ये भी है सच भूलता भी नहीं.


तेरी तस्वीर तो देखता हूँ मगर,

पहले की तरह अब चूमता भी नहीं.


काट लेता हूँ तनहाइयों का नरक,

बेवजह अब कहीँ घूमता भी नहीं.


हाले दिल तो बहुत हम सुनाते रहे,

ये अलग बात उसने सुना ही नहीं.


साथ छोड़ा है जिस दिन से तूने मेरा,

मैं जिया भी नहीं, मैं मरा भी नहीं.


गुम हुआ आजकल है वो है जाने कहाँ ?

बेवफ़ा का कहीँ भी पता ही नहीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया अहमदाबाद, गुजरात ता. 15/01/2025

 

रविवार, 12 जनवरी 2025

झील जैसी ये गहरी हैं आँखें तेरी.

 

ग़ज़ल

झील जैसी ये गहरी हैं आँखें तेरी.

बैगनी, बैगनी, कत्थई, कत्थई.


टकटकी बाँधकर यूं न देखो हमें,

डूब जायेंगे हम बात मानो मेरी.


होश अपने उड़े फ़ाख़्ता की तरह,

आसमां से लगा जैसे बिजली गिरी.


बातों बातों में ही ले गयी दिल मेरा,

वो जो सूरत थी इक सांवरी, सांवरी.


अब समन्दर भी मिलने को बेताब है,

और पता पूछती फिर रही है नदी.

 

 डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद. ता. 12/01/2025

 

 

मंगलवार, 7 जनवरी 2025

या तो आजाओ या फिर हमको बुलाकर देखो.


ग़ज़ल

या तो आजाओ या फिर हमको बुलाकर देखो.

आशिक़ी क्या है कभी दिल को लगाकर देखो.


तुम तो ज़ालिम हो तुम्हें दर्द का अहसास कहाँ,

रोज़  नश्तर  मेरे  सीने में  चुभाकर  देखो.


अपनी नज़रों में ही गिर जाओगे मानो मेरी,

आँख से आँख मेरी तुम जो मिलाकर देखो.


ज़हन में और भी उतरेगी ये ख़ुश्बू मेरी,

तुम मेरी चाहो तो तस्वीर जलाकर देखो.


सामने सबके तो करते हो अदेखी मेरी,

और फिर चुपके से नज़रों को चुराकर देखो.


सारी  रंगीनियां चेहरे कि ये उड़ जायेंगी.

तुम मेरी जान मुझे चाहो मिटाकर देखो.


हमने तो रख दिया कदमों में तेरे दिल अपना,

अब इसे मार दो ठोकर या उठाकर देखो.


डॉ. सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद, गुजरात ता.07/01/2025

 

रविवार, 5 जनवरी 2025

रात भर मेरा बिस्तर महकता रहा,

                                                                      ग़ज़ल

दिल की चौखट पे ज्यों उनकी आमद हुई.

रूह में  हो  गयी  रोशनी,  रोशनी.

 

रात भर मेरा बिस्तर महकता रहा,

ख़्वाब में कल वो आया था ज़ुहराजबी.

 

मुद्दतों से थे जिसके तलबगार हम,

बात उसने कही , बात हमने सुनी.

 

पूछिये मत कि कैसा था हुस्ने सबीह.

चंपई. चंपई, मरमरी, मरमरी.

 

टूट कर वो गले से मिला इस तरह,

ज्यों समावे समन्दर में कोई नदी.

 

एक से एक बढ़कर नवाज़िश तेरी,

 हो गया दिल तेरा आफ्रीं आफ़्रीं.


डॉ. सुभाष भदौरिया अहमदाबाद, गुजरात ता.05/01/2025

 

 

रविवार, 29 दिसंबर 2024

कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.

 ग़ज़ल

कब तलक तेरा रस्ता तकें तू बता.

आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा.


नब्ज़ थमने लगी, आँख मुदने लगी,

अब बुझा, अब बुझा, अब बुझा, अब बुझा.


आख़िरी वक़्त है आ के मिल ले गले,

मैं चला, मैं चला, मैं चला, मैं चला.


कितना मज्बूर मैं, कितना मग़रूर तू,

बेवफ़ा, बेवफ़ा, बेवफ़ा, बेवफ़ा .


नाम होटों पे जप, जप के ही वो तेरी,

मर गया, मर गया, मर गया, मर गया.


 लाश से अब लिपटकर के  रोता है वो,

ज़िन्दगी तुझको लाऊं कहाँ से बता.


देर आने में कर दी बहुत तूने अब,

अलविदा, अलविदा, अलविदा, अलविदा.


डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद गुजरात ता.29/12/2024

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

वो पत्थर दिल पिघलता ही नहीं है

 

                        ग़ज़ल

वो पत्थर दिल पिघलता ही नहीं है.

मेरा कुछ ज़ोर चलता ही नहीं है.


तकूं मैं राह सुब्होशाम उसकी,

वो इस रस्ते निकलता ही नहीं है.


मैं दिल को यूं तो बहलाये बहुत हूं,

ये उसके बिन बहलता ही नहीं है.


झरें हैं अश्रु बारोमास अपने,

यहाँ मौसम बदलता ही नहीं है.


संभालेगा मुझे क्या ख़ाक अब वो,

दुपट्टा जब संभलता ही नहीं है.


करो लाखों जतन पर कुछ न होगा,

दरख़्ते इश्क़ फलता ही नहीं है.


डॉ. सुभाष भदौरिया अहमदाबाद, गुजरात ता.28/12/2024

 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2024

चेहरे की चमक होटों की मुस्कान ले गया.

 

ग़ज़ल

चेहरे की चमक होटों की मुस्कान ले गया.

जीने के मेरे सारे वो अरमान ले गया.


सिगरिट, शराब, अश्क, तन्हाई व बेकली,

किन रास्तों पे मेरा महरबान ले गया.


अब मेज़बां के पास तो कुछ भी बचा नहीं,

दिल की तमाम हसरतें मेहमान ले गया.


अब लोग पूछते है बताओ तो कौन था ?

जो जिस्म छोड़कर के मेरी जान ले गया.


क्या क्या हुए हैं हादसे हमसे न पूछिये.

घर को ही लूट घर का ही दरबान ले गया.


उसने तो साथ छोड़ दिया बीच धार में,

साहिल तलक मुझे मेरा तूफ़ान ले गया.


डॉ. सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद ता.26/12/2024